सीजफायर पर मंडराया संकट! ट्रंप की धमकी पर ईरान का पलटवार, शर्तों को लेकर फिर बढ़ेगा तनाव?

America-Iran Tensions: मध्य पूर्व में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने के लिए जिस 14 सूत्रीय समझौते को उम्मीद की नई किरण माना जा रहा था, वही अब नए विवादों में घिरता दिखाई दे रहा है.

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America-Iran Tensions: मध्य पूर्व में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने के लिए जिस 14 सूत्रीय समझौते को उम्मीद की नई किरण माना जा रहा था, वही अब नए विवादों में घिरता दिखाई दे रहा है. युद्धविराम और बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए तैयार किए गए इस समझौते पर दोनों पक्षों की अलग-अलग व्याख्याओं ने स्थिति को जटिल बना दिया है. एक तरफ अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार सख्त रुख अपनाते हुए दबाव की राजनीति कर रहे हैं, तो दूसरी ओर ईरान भी अपने रणनीतिक हितों से पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहा. ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या बातचीत की यह कोशिश स्थायी शांति तक पहुंचेगी या फिर क्षेत्र एक बार फिर टकराव की राह पर बढ़ जाएगा.

बातचीत से धमकियों तक पहुंचा मामला

कुछ समय पहले तक डोनाल्ड ट्रंप का पूरा जोर ईरान को वार्ता की मेज तक लाने पर था. लेकिन हाल के बयानों में उनका रुख पहले से कहीं अधिक आक्रामक दिखाई दे रहा है. अब वे केवल बातचीत की बात नहीं कर रहे, बल्कि संभावित कार्रवाई और सख्त कदमों की चेतावनी भी दे रहे हैं.

विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की बयानबाजी का उद्देश्य ईरान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना हो सकता है, ताकि अंतिम समझौते में अमेरिका को अधिक लाभ मिल सके. हालांकि ऐसी रणनीति वार्ता को आसान बनाने के बजाय और अधिक जटिल भी बना सकती है.

होर्मुज जलडमरूमध्य बना नई खींचतान का केंद्र

विवाद का सबसे बड़ा कारण होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर दोनों देशों के अलग-अलग दावे हैं. ट्रंप का कहना है कि यह समुद्री मार्ग अब पूरी तरह सुरक्षित रहेगा और इसके संचालन में अमेरिकी प्रभाव प्रमुख रहेगा.

वहीं ईरान का दृष्टिकोण इससे अलग है. तेहरान का कहना है कि फिलहाल जलडमरूमध्य खुला है, लेकिन भविष्य में इसके संचालन और नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है. ईरान यह संकेत दे चुका है कि वह इस रणनीतिक क्षेत्र पर अपना प्रभाव पूरी तरह छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. यही वजह है कि जिस मुद्दे को अमेरिका लगभग सुलझा हुआ बता रहा है, वही फाइनल समझौते में सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है.

परमाणु निरीक्षण पर भी बढ़ा मतभेद

तनाव का दूसरा बड़ा कारण ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा हुआ है. हाल ही में ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को अपने परमाणु ठिकानों तक पहुंच देने के लिए तैयार हो गया है और इस प्रक्रिया में अमेरिकी अधिकारियों की भूमिका भी हो सकती है.

लेकिन ईरान ने इन दावों को तुरंत खारिज कर दिया. तेहरान की ओर से कहा गया कि ऐसी किसी बैठक या समझौते की पुष्टि नहीं हुई है. साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि परमाणु स्थलों तक निरीक्षकों की पहुंच को लेकर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है. ईरान का कहना है कि इस विषय पर निर्णय व्यापक समझौते के अंतिम चरण में ही संभव होगा.

तेहरान ने भी दिखाई सख्ती

ईरान के भीतर से आ रही रिपोर्टों के अनुसार, परमाणु ठिकानों के निरीक्षण को लेकर कुछ लचीलापन दिखाया जा सकता है, लेकिन यह पूरी तरह अंतिम समझौते की शर्तों पर निर्भर करेगा. यानी तेहरान फिलहाल अपने सभी विकल्प खुले रखना चाहता है.

इसके साथ ही ईरान ने अमेरिका को चेतावनी भी दी है कि यदि धमकियों और दबाव की राजनीति जारी रही तो वार्ता की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. ईरानी नेतृत्व का मानना है कि लगातार आक्रामक बयान विश्वास बहाली के प्रयासों को कमजोर कर रहे हैं.

क्या फिर बढ़ सकता है क्षेत्रीय तनाव?

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शांति प्रक्रिया की सफलता दोनों पक्षों के बीच भरोसे पर निर्भर करती है. लेकिन मौजूदा हालात में भरोसे की जगह आरोप-प्रत्यारोप और शक्ति प्रदर्शन अधिक दिखाई दे रहा है.

डोनाल्ड ट्रंप जहां खुद को मजबूत और निर्णायक नेता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं ईरान भी अपनी रणनीतिक स्थिति से समझौता करने के मूड में नहीं दिख रहा. ऐसे में यदि दोनों पक्ष अपने रुख में नरमी नहीं लाते, तो शांति समझौते की राह मुश्किल हो सकती है.

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