नई दिल्ली: जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से आने वाले उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ शुल्क (Import Tariff) लगाया, तब वैश्विक विश्लेषकों ने अनुमान लगाया था कि इससे भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्र- टेक्सटाइल, जेम्स-एंड-ज्वेलरी और समुद्री उत्पाद (Seafood) पर भारी असर पड़ेगा. लेकिन ताज़ा आंकड़े इस अनुमान को गलत साबित कर रहे हैं.
भारत ने अमेरिका पर निर्भरता घटाकर मध्य पूर्व, यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में अपने लिए नए बाजार खोज निकाले हैं. वाणिज्य मंत्रालय के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 के पहले नौ महीनों (जनवरी–सितंबर) में भारत के समुद्री उत्पाद, कपड़ा और आभूषण निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है.
अब बहु-क्षेत्रीय हुआ भारत का निर्यात
अमेरिकी टैरिफ नीति के बाद भारत ने अपने व्यापारिक रुख में बदलाव किया. पहले जहां भारत का लगभग 20–25% निर्यात अमेरिका पर निर्भर था, वहीं अब इसका एक बड़ा हिस्सा यूएई, वियतनाम, बेल्जियम, सऊदी अरब, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया और कनाडा जैसे देशों में जाने लगा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव भारत की व्यापार विविधीकरण रणनीति (Export Diversification Strategy) की सफलता को दिखाता है.
समुद्री उत्पाद: वियतनाम और बेल्जियम
भारत का समुद्री उत्पाद निर्यात 2025 में तेजी से बढ़ा है. जनवरी से सितंबर 2025 के बीच इस क्षेत्र में 15.6% वृद्धि दर्ज की गई, जो कुल 4.83 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया.
हालांकि अमेरिका अब भी सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है, जहां भारत ने 1.44 अरब डॉलर का निर्यात किया. लेकिन उल्लेखनीय बात यह रही कि वियतनाम में मांग 100.4%, बेल्जियम में 73%, और थाईलैंड में 54.4% तक बढ़ गई.
मलेशिया (64.2%), जापान (10.9%) और चीन (9.8%) में भी भारतीय समुद्री उत्पादों की खपत बढ़ी है. इस वृद्धि के पीछे मुख्य कारण माना जा रहा है- उच्च गुणवत्ता वाले झींगे (Shrimps), फिश फिले और स्क्विड जैसे उत्पादों की मांग में उछाल, तथा भारत की मरीन फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में तकनीकी सुधार.
कपड़ा उद्योग: अफ्रीका और लैटिन अमेरिका
भारत के टेक्सटाइल और गारमेंट सेक्टर ने भी 2025 में नई रफ्तार पकड़ी है. इस अवधि में 1.23% की वृद्धि के साथ निर्यात 28.05 अरब डॉलर तक पहुंच गया.
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में 8.6% की वृद्धि (लगभग 136.5 मिलियन डॉलर) दर्ज की गई, जिससे दुबई और शारजाह भारतीय कपड़ों का री-एक्सपोर्ट हब बन रहे हैं.
यूरोप में नीदरलैंड (11.8%), पोलैंड (24.1%), और स्पेन (9.1%) में मांग बढ़ी है. मिस्र (24.5%), पेरू, और नाइजीरिया जैसे अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देश भी भारतीय वस्त्रों के नए खरीदार बने हैं.
टेक्सटाइल निर्यात में यह उछाल भारतीय निर्माताओं की किफायती उत्पादन क्षमता, सस्टेनेबल फैब्रिक (पर्यावरण-अनुकूल कपड़े) और मेक इन इंडिया पहल से जुड़े प्रोत्साहनों का परिणाम है.
रत्न और आभूषण उद्योग ने भी पकड़ी रफ्तार
भारत की जेम्स और ज्वेलरी इंडस्ट्री, जो पारंपरिक रूप से अमेरिका और यूरोप पर निर्भर थी, अब नए बाजारों में भी तेजी से पैर जमा रही है.
2025 की पहली छमाही में इस क्षेत्र के निर्यात में 1.24% की वृद्धि दर्ज हुई, जो 22.73 अरब डॉलर तक पहुंच गया. यूएई ने भारतीय आभूषणों के लिए सबसे बड़ा बाजार बनाए रखा, जहां निर्यात में 37.7% (1.93 अरब डॉलर) की बढ़ोतरी हुई. दक्षिण कोरिया में इस साल मांग 134%, सऊदी अरब में 68%, और कनाडा में 41% तक बढ़ी है.
रिपोर्टों के मुताबिक, भारतीय कटी और पॉलिश की हुई हीरे, सोने के आभूषण, और लैब-ग्रोउन डायमंड्स (Lab-grown Diamonds) की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है. भारत अब ‘सप्लाई चेन रेजिलिएंस’ के तहत यूरोप और खाड़ी देशों को स्थायी सोर्सिंग पार्टनर के रूप में सेवा दे रहा है.
टैरिफ का भारत पर असर क्यों कम हुआ?
विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी टैरिफ के बावजूद भारत पर असर सीमित रहने के पीछे कई रणनीतिक कारण हैं —
खाड़ी और एशिया बन रहे नए व्यापारिक केंद्र
भारत की व्यापारिक रणनीति अब पारंपरिक पश्चिमी बाजारों से आगे बढ़कर खाड़ी देशों, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका पर केंद्रित हो रही है.
यूएई और सऊदी अरब भारतीय सोने और टेक्सटाइल उत्पादों के बड़े खरीदार बन चुके हैं.
वियतनाम और थाईलैंड समुद्री उत्पादों के लिए महत्वपूर्ण गंतव्य बन रहे हैं.
वहीं यूरोप के नीदरलैंड और बेल्जियम हीरे और समुद्री उत्पादों के लिए नए वितरण केंद्र बन चुके हैं.
भारतीय निर्यातकों का कहना है कि इन क्षेत्रों में “कम लॉजिस्टिक लागत, तेज भुगतान व्यवस्था और सांस्कृतिक समानता” के कारण व्यापार और बढ़ाने की संभावना है.
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