THE JC SHOW: Modi's Winning Stroke | इंतजार 9 अप्रैल का! देखें डॉ. जगदीश चंद्र का विश्लेषण

The JC Show: पांच राज्यों में चुनावी तारीख नजदीक आ रही है और ऐसे में चुनाव धीमे-धीमे निर्णायक मोड़ पर पहुंच रहा है. इस बार दावे भी बहुत हैं तो दांव भी बहुत बड़े हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ले बीजेपी के चाणक्य कहलाए जाने वाले अमित शाह ने मोर्चा संभाल लिया है.

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The JC Show: पांच राज्यों में चुनावी तारीख नजदीक आ रही है और ऐसे में चुनाव धीमे-धीमे निर्णायक मोड़ पर पहुंच रहा है. इस बार दावे भी बहुत हैं तो दांव भी बहुत बड़े हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ले बीजेपी के चाणक्य कहलाए जाने वाले अमित शाह ने मोर्चा संभाल लिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कह दिया कि जहां केंद्र में हैट्रिक लगाई है बीजेपी ने तो वहीं असम में भी हम हैट्रिक लगाने वाले हैं. दूसरी तरफ गृह मंत्री अमित शाह ने बंगाल का मोर्चा संभालते हुए दीदी के गढ़ में उन्हें हराने की पटकता तैयार कर दी है. ऐसे में तमाम चुनावी पार्टियों की तैयारी क्या है? क्या नॉर्थ के बाद अब साउथ में भी केसरिया लहराएगा? क्या दीदी के गढ़ को उखाड़ फेंकने में बीजेपी सक्षम होगी? असम में क्या बीजेपी लगाएगी हैट्रिक? आज इसी पर करेंगे विश्लेषण और हमारे साथ मौजूद हैं चुनावों से पहले अपनी सटीक भविष्यवाणियों के लिए जाने जाने वाले द मैन ऑफ प्रेडिक्शन भारत 24 के सीईओ और एडिटर इन चीफ और फर्स्ट इंडिया के सीएमडी और एडिटर इन चीफ डॉ जगदीश चंद्र..

सवाल: असम से हमने तस्वीरें देखी असम में चाय बागान में महिला चाय श्रमिकों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैसे चाय की पत्तियां चुनी और उन्हीं तस्वीरों के साथ आज के पहले सवाल की शुरुआत क्योंकि हमने आज का शीर्षक रखा है इंतजार 9 अप्रैल का Modi's Winning Stroke, आखिर इसके मायने क्या है?

जवाब: व्हाट ए पावरफुल नैरेटिव नरेंद्र मोदी की खासियत है कि हर चुनाव में एक ना एक ऐसा नैरेटिव बनाते हैं कि इलेक्शन स्लीप कर जाते हैं. इस चुनाव में इस नैरेटिव को चुना उन्होंने. चाय आसाम की आत्मा है. चाय चुनने वाली महिलाओं के साथ वार्तालाप करना, उनसे इंटैक्ट करना और फिर खुद चाय की पत्तियां चुनना विनिंग स्ट्रोक जो है इसे कहा जा सकता है. और उसके साथ ही उन्होंने एक और दिल को छूने वाली बात कही कि तुम्हें मालूम है मैं भी चाय वाला हूं. और वो चाय वाली थ्योरी जो है वो सुपरहिट थ्योरी है. तो कुल मिला के ये जो नैरेटिव बना इस चुनाव में ये गेम चेंजर प्रूव होगा. इसीलिए इसे कहा गया कि जो तस्वीर है ये जो नैरेटिव है ये नरेंद्र मोदी का विनिंग स्ट्रोक है. 

सवाल: प्रधानमंत्री मोदी का यह आसाम का चाय बागान कनेक्ट पब्लिक कनेक्ट देखकर एक घटना याद आती है. नोएडा की एक छोटी सी बच्ची ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों को चूम लिया था. आपको ऐसी कोई घटना याद आती है?

जवाब: हां, हुआ था. नोएडा के एक स्कूल के बच्चे रक्षाबंधन का दिन था. प्रधानमंत्री आवास में बच्चे जाते हैं राखी बांधने के लिए गई थी. तो बच्चे बड़े स्मार्ट होते हैं. छोटे-छोटे जो है एक बच्ची ने यह कहा कि मैं सला किस कर सकती हूं क्या? तो नरेंद्र मोदी थोड़ा सा शर्माया शाई फील किया कि ठीक है. तो बच्ची ने किस किया और आप देखिए ये फोटो जो है उसमें लगा फिर इसका जैकेट बना वायरल हुआ. तो ये जो उनका पब्लिक कनेक्शन है वो अद्भुत होता है. आप देखिए बच्ची उनको किस कर रही है और कितनी आत्मीयता से और इस प्रकार से क्या है कि देश में आज जो बच्चों जैसे किसी जमाने में चाचा नेहरू हुआ करते थे आज के जमाने में इस तरह से बच्चों के जो लोकप्रिय नेता है नरेंद्र मोदी एमर्ज हो रहे हैं और ये जो एक दृश्य है जो नेचुरल सिनेरियो है ये उसी की ओर अंकित करता है. तो कुल मिला के है कि ये घटना एक और पब्लिक कनेक्ट जो नरेंद्र मोदी का है उसकी ओर संकेत करती है. 

सवाल: जब भी प्रधानमंत्री मोदी की पब्लिक रैलीज होती हैं, रोड शो होता है वहां पर लोग घंटोंघंटों खड़े रहते हैं प्रधानमंत्री मोदी की एक झलक पाने के लिए. उनकी पर्सनालिटी में ऐसा क्या है जो उन्हें देखने के लिए लोग इतना बेताब नजर आते हैं?

जवाब: इसकी तो केस स्टडी करनी पड़ेगी वास्तव में. अद्भुत है, चमत्कार है, कुदरत की देन है. और यह सिनेरियो केवल भारत में नहीं है. यह पूरे संसार में है. आप देखिए जहां भी जाते हैं देश विदेश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री वो बेताब रहते हैं हाथ मिलाने के लिए, एयरपोर्ट पे रिसीव करने के लिए. तो ईश्वर की अद्भुत देन है उनको और भारत जैसे कहना है कि इंडिया इस लकी टू हैव सच अ प्राइम मिनिस्टर जिसकी पब्लिक पॉपुलरिटी इतनी जबरदस्त है. 

सवाल: इसी क्रम में केरला और पुडुचेरी में जो मोदी जी की रैलीज और रोड शोज़ हुई हैं उसमें हमने मैसिव पब्लिक टर्न आउट देखा है. उसको आप कैसे इंटरप्रेट करते हैं?

जवाब: अगेन इट स्पीक्स पॉपुलरिटी ऑफ़ द प्राइम मिनिस्टर पब्लिक कनेक्ट ऑफ नरेंद्र मोदी. और सचमुच हैरानी की बात है केरल जहां की बीजेपी का बेस बन रहा है धीरे-धीरे बना नहीं है प्रॉपर एक तरह से. वहां इतनी पॉपुलरिटी वहां के आम आदमी सड़क पे निकलते हैं तो आप देखिए कार कैड के दोनों तरफ जनता लाइन लगा के खड़ी होती है. पांडचेरी का तो शो ही अद्भुत था. लोग टूट के पड़ रहे थे. वहां पे जो है तो ये है उनका क्रेज है. एक तरह से देश है और देश के बाहर भी है. तो ये जो केरल और पांडचेरी में देखने को मिला ये उसी क्रेज का उसी पब्लिक कनेक्ट का एक और एक्सटेंशन था. दिस इज ऑल. 

सवाल: हर चुनाव की तरह इस इस चुनाव में भी गृह मंत्री अमित शाह एक कमांड में नजर आ रहे हैं. एक सेंटर रोल में नजर आ रहे हैं. आप इसे कैसे देखते हैं? 

जवाब: अब्सोलुटली ही इज अ बोर्न पर्सन हु एक्ट्स अंडर द लीडरशिप नरेंद्र मोदी एस ए सेंट्रल फोर्स एस अ सेंट्रल पर्सन आज देश का कोई भी चुनाव हो लोकसभा का हो राज्यों का चुनाव हो आपको मुख्य भूमिका में नरेंद्र मोदी एंड नेक्स्ट टू हिम आपको हमेशा नजर आएंगे आप देखिए 15 दिन तक बंगाल में रहने वाले हैं और चुनाव की जो बारीकियां हैं जो रणनीति बनाते हैं बैठ के रात को 4:00 बजे तक घर पे जो है वो अद्भुत है मतलब एक बहुत जबरदस्त स्ट्रेटजी चुनाव की उनकी बनती है ही फंक्शंस अंडर द डायरेक्ट सुपरविज़न ऑफ़ नरेंद्र मोदी. और विश्वास भरोसा और जो वेवलेंथ है वह अद्भुत है. आप देखते हैं दैट वे जो है तो ऐसा लगता है कभी-कभी कि देश की सारी जिम्मेदारियां या जो चुनाव जीतने की जो जिम्मेदारी है वो लगता है नरेंद्र मोदी और अमित शाह पे दिखाई देती है क्योंकि इतना ज्यादा काम करते हैं वो. तो उनकी लीडरशिप में इतना तालमेल है वो राम के हनुमान होते हुए भी नरेंद्र मोदी के प्रति इतने समर्पित हैं और उसी भाव से काम करते हैं. कुल मिला के हम ये कह सकते हैं कि देश का कोई भी चुनाव हो आफ्टर नरेंद्र मोदी यू कैन से अमित शाह इस अ सेंट्रल फोर्स व्हिच विंस द इक्शंस. 

सवाल: 4 अप्रैल को जेपी नड्डा ने केरलम के तिरुवनंतपुरम क्षेत्र खासतौर पर नया टिनकारा और कोल्लम जिले के चतनूर में जनसभा को संबोधित किया. पब्लिक का रिस्पांस वहां पर आपको कैसा रहा?

जवाब: अच्छा रिस्पांस था. रिस्पांस के पीछे देखो नरेंद्र मोदी की छाया दिखाई देती है. नड्डा खुद अपने आप में एक पॉपुलर लीडर हैं. पार्टी अध्यक्ष रहे छ साल तक और उनका कनेक्ट है वह भी ग्रास रूट लीडर हैं. तो इसका जो कनेक्ट है वो अच्छा था. कुल मिला के उन्होंने दो रैलीज वहां पे की. फिर आसाम में भी एक दो रैलीज उन्होंने की वहां पे. तो उनका वहां जाना और पब्लिक से कनेक्ट होना और साथ में खास बात क्या है कि एक सेंटर के नॉमिनी के रूप में भी हैं. वो पार्टी अध्यक्ष आज नहीं है. केंद्रीय मंत्री हैं. बट स्टिल एंजॉय द अ टोटल ट्रस्ट एंड कॉन्फिडेंस ऑफ़ द प्राइम मिनिस्टर. और ऐसा लगता है कि पार्टी के जो अंदरूनी विषय हैं जो मौजूदा अध्यक्ष हैं वो उनको लूप में रखते हैं. और जेपी नड्डा स्टिल कंटिन्यूस टू बी अ सेंट्रल फोर्स इन द इंटरनल ग्रुप इन द की टीम ऑफ़ प्राइम मिनिस्टर. तो वो वहां पे गए. अच्छा रिस्पांस था. कुल मिला के ही वाज़ ग्रीटेड बाय पीपल एंड गुड रिस्पांस टू ह विजिट. 

सवाल: पश्चिम बंगाल में बिहारी प्रवासियों की संख्या को देखते हुए पार्टी आलाकमान ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन को यहां पर खास जिम्मेदारी सौंपी है. इस मूव को आप कैसे देखते हैं?

जवाब: मूव अच्छा है. उनके लिए ट्रेनिंग का ग्राउंड है. एक प्रोबेशन पीरियड है इन अ वे जो आप कहिए. एक मौका आ गया चुनाव का. तो सारे देश में घूमने का मौका है. लोगों से कनेक्ट करने का मौका है. और कुल मिला के इन तीनों राज्यों में आसाम है, केरल है, बंगाल है. 20 से ज्यादा रैलीज और रोड शो इन्होंने कर लिए जाकर के जो है ना तो वो 24 घंटे 24 * 7 काम कर रहे हैं. और उनका ये सही था क्योंकि पश्चिम बंगाल में क्या है? बिहार के बहुत लोग हैं और बिहार के वोटर क्योंकि बिहार से आते हैं तो एक नेचुरल मोरल इनफ्लुएंस होता है लोगों का जो है तो इट अ गुड डिसिशन ऑफ़ पार्टी टू यूटिलाइज ह सर्विज स्पेशली इन केरला एंड वेस्ट बंगाल अदर देन आसाम एंड अदर प्लेसेस. 

सवाल: इन चारों ही राज्य जिसमें असम है, केरलम है, पश्चिम बंगाल है या फिर तमिलनाडु है. क्या आपको वाकई लगता है कि यहां क्षेत्रीय छत्रपों के चेहरे पर ही चुनाव लड़े जा रहे हैं? 

जवाब: जहां तक असम का सवाल है इन राज्यों में तो असम तो क्या सेंट्रल कमांड में है. नरेंद्र मोदी अमित शाह की कमांड में है. तो आप नहीं कह सकते क्षेत्रीय शत्र भी डिक्टेट कर रहे हैं. लेकिन हां चेहरा जो है विश्वा का है वहां पे और हेमंता का चेहरा जो है एक प्रकार से आप कह सकते हैं कि क्षेत्रीय शत्र माना जा सकता है. उनका चेहरा मुख्यमंत्री कद से थोड़ा बड़ा चेहरा हो गया था. उनका खुद का एक ब्रांड बना है. बाकी जो राज्य हैं आपका केरल है, पश्चिम बंगाल है, तमिलनाडु है तो निश्चित रूप से क्षेत्रीय क्षेत्रफ है. वहां के जो चीफ मिनिस्टरर्स हैं वो क्षेत्रीय शत्रप हैं और ये जो इलेक्शन है ये उनके लिए परीक्षा की घड़ी है. तो कुल मिला के कह सकते हैं कि ये चुनाव जो है बेसिकली क्षेत्रीय क्षत्रपों के सहारे ही लड़े जा रहे हैं. 

सवाल: आपकी निगाह में कौन-कौन सेक्टर्स हैं? वो कौन से फैक्टर्स हैं जो हेमंता विश्वा शर्मा को सीएम की कुर्सी तक लेकर जाएंगे?

जवाब: सबसे बड़ा फैक्टर तो यह है कि नरेंद्र मोदी का विश्वास दूसरा यह है कि फंक्शनल सपोर्ट बाय अमित [नाक से की जाने वाली आवाज़] शाह जो उनको डिस्टिंग्विश करता है एस कंपेयर टू अदर चीफ मिनिस्टरर्स फिर खुद के उनके गुण हैं वहां पे उन्होंने बहुत बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर क्रिएट किया है उसके साथ में क्या सोशल वेलफेयर स्कीम्स बहुत सी लाए हैं फिर उनका जो था मिया मुस्लिम वाला जो आप ध्रुवीकरण कह सकते हैं उसको या जो हिंदुत्व का जो कार्ड है वो बड़ा स्ट्रांग है वहां पर और अभी प्राइम मिनिस्टर गए थे तो कुल मिलाके 47000 करोड़ के प्रोजेक्ट उन्होंने आसाम को दिए हैं. तो पैकेज है अपने आप के अंदर. तो यह जो पैकेज है दिस माइट ब्रिंग हेमंता अगेन बैक टू पावर. 

सवाल: एक पॉलिटिशियन के रूप में आप चीफ मिनिस्टर हेमंता विश्वा शर्मा के करियरग्राफ को कैसे देखते हैं?

जवाब: करियरग्राफ उनका बहुत है. राइज एंड राइज ऑफ हेमंत बिश्वा और लोग ठीक कहते हैं एक तरह से. ही इज़ ओनली रिलायबल इलेक्ट्रल फोर्स इन आसाम. यू सी ही विंस असेंबली पोल्स. ही विंस लोकसभा पोल्स. ही मैनेजेस राज्यसभा सीट्स वि फॉल शॉट ऑफ एमएलए अर्थमेटिक एंड ऑल और कुल मिला के आप देखेंगे उनको जो है तो आसाम में उनकी जो लोकप्रियता है तो आप कह सकते हैं राइजिंग ग्राफ ऑफ हेमंता तो इसके कारण से उनका जो पॉलिटिकल करियर है वो बहुत अच्छा है ही डिलीवर टू कांग्रेस व्हेन ही वाज़ इन कांग्रेस नाउ ही इज़ डिलीवरिंग टू बीजेपी है ना ऑल इन वन एक तरह से और सबसे बड़ी बात क्या है इसमें कि कांग्रेस के बैकग्राउंड के बावजूद बीजेपी में इस तरह से रम गए हैं वो. ऐसा लगता है 50 साल से बीजेपी में थे वो. ये उनके करियर ग्राफ के खास है. फ्लेक्सिबिलिटी बहुत जबरदस्त है उनकी पर्सनालिटी में. 

सवाल: चुनाव के एन वक्त पर अभी हाल ही में कांग्रेस के जो कुछ बड़े नेता हैं जिसमें भूपेन बोरा हैं. प्रद्युत बोरदोई हैं. इनके समेत तीन विधायकों को बीजेपी में ज्वाइन करवाने का जो शर्मा का मास्टर मूव है. आप इसको कैसे देखते हैं?

जवाब: अबब्सोलुटली उनके पार्ट पर एक मेजर पॉलिटिकल मूव था. ऑफ कोर्स इन कंसल्टेशन विद द सीनियर लीडरशिप ऑफ बीजेपी आप देखिए वहां के कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं. एक पावरफुल इन्फ्लुएंस है उनका वहां पे. दूसरे जो नेता उनके साथ में आए हैं वो कैबिनेट मिनिस्टर रह चुके हैं. वहां पर जो है इन दोनों का इन्फ्लुएंस है. और ये दोनों जब वहां पे आए तो तीन एमएलए भी इनके साथ-साथ वहां पे चले आए. कुल मिला के तो ये बड़ा टाइमली और 11थ आवर का मूव था. बेसिकली ये हेमंता का मूव था. जिसको पार्टी ने एंडोर्स किया होगा. दैट वे जो है इट इज़ गोइंग टू प्रूव वेरी यूज़फुल फॉर द रूलिंग पार्टी. दैट इज़ बीजेपी. 

सवाल: हेमंता की तरफ से वो अक्सर ऑन रिकॉर्ड ऑफ रिकॉर्ड ही कहते हैं कि मेरी तो दोनों पार्टी में उतनी ही पकड़ है. लेकिन सर माना तो यह भी जा रहा है. मैंने ऐसा सुना कि अभी तो और भी बहुत सारे कांग्रेसी थे जो आना चाहते थे. भाजपा में शामिल होना चाहते थे. लेकिन हाउसफुल का बोर्ड देखकर वापस लौट गए. आपको ऐसा लगता है?

जवाब: अब्सोलुटली करेक्ट. आई आल्सो हैव सिमिलर इनफेशन. कई लोग और कतार में थे. बिस्वा का जो साम दाम दंड भेद का जो फार्मूला है वह हर जगह काम करता है. दैट वे जो है लाइन में थे बट देयर वा नो वैकेंसी और काफी लेट हो गए थे. तो बस इन तीन के साथ ही हाउसफुल का बोर्ड लगा वहां पे. यू आर राइट. 

सवाल: इलेक्शन से ठीक पहले कांग्रेस छोड़कर बीजेपी जॉइ करने का जो ट्रेंड दिख रहा है आजकल उसके बारे में आपका क्या ख्याल है?

जवाब: हां ट्रेंड बिल्कुल है. एक खास तरीके से बड़े सुनियोजित ढंग से जो है लोग कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाते हैं. उसका पहला स्टेप यह होता है कि वो भाजपा का जो एजेंडा है आपके ये जो राष्ट्रवाद का एजेंडा है धर्म का एजेंडा है उसकी प्रशंसा करेंगे. पब्लिकली कोई स्टेटमेंट इशू करेंगे. फिर एक दिन चुपचाप बीजेपी जाके ज्वाइन करेंगे. वहां पे जो है लेटेस्ट केस भूपेंद्र बोरा का है. आसाम का जो है ये उन्होंने पहले तो ये बयान दिया कि ये पार्टी एक तरह से मुस्लिम पार्टी हो गई. मुस्लिम लीडर हैं पार्टी. कांग्रेस को वही लोग चला रहे हैं वहां पर जो है और कांग्रेस तुष्टीकरण की राजनीति कर रही है और थोड़े दिनों में चुपचाप जाके बीजेपी में ज्वाइन कर लिया उन्होंने वहां पे जो है तो ये फैक्ट है और इसीलिए कहा जाता है कि कांग्रेस के लोग जिसे कहना चाहिए कांग्रेस में रह के बीजेपी के लिए काम करते हैं क्या? यह है राहुल गांधी ने कहा था. और अभी जो यह घटना हुई दो बड़े नेता और तीन एमएलए गए वहां पे. और अभी जो कांग्रेस के चीफ मिनिस्टर कैंडिडेट हैं गौरव गोगाई जो है तो उन्होंने भी कहा इन दोनों के जाने पे. 

उन्होंने कहा मुझे मालूम है कि ये लोग पहले से ही भाजपा के चीफ मिनिस्टर के संपर्क में थे. मुझे कुछ पत्रकारों ने बताया कि आपकी पार्टी में क्या होने वाला है. तो बोले हमारा प्लान तो सीक्रेट था. इनको मालूम था मुझे मालूम था कि ये जो प्लान है ये बीजेपी की लीडरशिप को हेमंत कैसे मालूम था. इसका मतलब है कि ये लोग कांग्रेस में रहते हुए भी शुरू से ही भाजपा के लिए काम कर रहे थे. तो ये लेटेस्ट फैशन है कांग्रेस में. आप ये कहिए कि धीरे-धीरे वक्त और अवसर देख के जाना. और इसका कारण है लैक ऑफ लीडरशिप इन कांग्रेस. फेलर ऑफ राहुल गांधी आप जैसे कह सकते हैं तो यह सब हो रहा है और नॉट ओनली दिस बल्कि जो क्षेत्रीय पार्टियां हैं वह भी कुछ इस ढंग से काम करती है चुनाव के इस समय ऐसा लगता है कि डायरेक्टली इनडायरेक्टली ये बीजेपी को ही बेनिफिट कर रहे हैं. सो सक्सेस स्टोरी है बीजेपी की. अमित शाह की सक्सेस स्टोरी है जोड़तोड़ की जिसे कहते हैं और राजनीति में तो एवरीथिंग इज़ फेयर. तो ये बात आपकी सच है कि कांग्रेस के कई लोग कांग्रेस में रहते हुए ही भाजपा के लिए काम करते हैं. 

सवाल: गुवाहाटी में इस वक्त आम चर्चा है कि असम में एक तरीके से दो कांग्रेस चुनाव लड़ रही है. एक राहुल गांधी की और एक हेमंता विश्व शर्मा की. इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

जवाब: बिल्कुल ठीक कह रहे हैं आप. और उनका कांग्रेस प्रेम तो पुराना है ही. उसी संस्थान से आए हैं. और दूसरी बात क्या कांग्रेस के पावरफुल लीडर्स को अपनी पार्टी में लाना, पार्टी को मजबूत करना एक अच्छी बात है. पॉलिटिकली अगर आप देखते हैं वहां पे जो है तो ला रहे हैं, मजबूत कर रहे हैं. लेकिन हुआ यह कांग्रेस को ज्यादा लोग आ गए और टिकट मिल गए उनको. तो बीजेपी की जो ओरिजिनल लीडरशिप है जो कार्डर बेस जो लीडरशिप वर्कर्स हैं उनको टिकट नहीं मिला. तो वो लोग थोड़ा खिलाफ हो गए. उस तरह से तो उन्होंने आरोप लगाया कि यह दो कांग्रेस चला रहे हैं. एक अपनी कांग्रेस अह वह कांग्रेस जो है रियल कांग्रेस उसको रिमोट कंट्रोल से चला रहे हैं. और यहां पे अपनी कांग्रेस एक और जो है उसको खड़ा करके वो चला रहे हैं. तो दो प्रकार की कांग्रेस है चला रहे हैं. बट अल्टीमेटली दिस स्पीक्स ऑफ़ पॉलिटिकल मैन्योरिंग सक्सेस ऑफ़ हेमंता एट द एंड ऑफ़ द डे तो यही है इसके अंदर जो है. सो एवरीथिंग इज़ फेयर इन पॉलिटिक्स. 

सवाल: कुछ लोगों का यह कहना है कि शर्मा की मजबूत स्थिति होने के बावजूद भी यह जो उनका एक्स्ट्रा हिंदू फैक्टर है यह पार्टियों को नुकसान पहुंचा सकता है. आप क्या मानते हैं?

जवाब: इट्स अ सीरियस इशू. हालांकि सब लोग ये कह रहे हैं कि भाई वो कमांड में हैं. फ्रंट रनर हैं. टोटल होपफुल हैं फॉर ह टेन्योर. एवरीथिंग इज़ देयर. लेकिन कहीं ना कहीं पार्टी के अंदर भी इस बात का थोड़ा सा लेके सुगबगाहट है इस बात की है कि कहीं हेमंता जो हिंदुत्व कार्ड है ये मियां मुस्लिम कहते कहते कहीं एक्स्ट्रा तो इस कार्ड को नहीं चल गए कहीं एक्स्ट्रा माइल तो नहीं चल गए कहीं और इस बात को पार्टी ने भापा है और शायद इसीलिए अमित शाह वहां कैंप कर रहे हैं. थोड़ा बहुत डैमेज अगर लगता है लोगों को ऐसा है तो डैमेज कंट्रोल उसको कर रहे हैं. लेकिन एक बात कहीं ना कहीं आती है. इसलिए एक अखबार ने बड़ा अच्छा लिखा है. उन्होंने लिखा है फॉर मेंटेनिंग हज़ ओन इमेज जो है ही रिवम्स आसाम बीजेपी थ्रू कांग्रेस डिफेक्शंस एक तरह से तो एट द एंड ऑफ़ तो ये कह सकते हैं कि हेमंता इज़ इमर्जिंग एज अ ऑल पार्टी मैन हम विद अ बीजेपी टिकट विद अ बीजेपी चीफ मिनिस्टर पोस्ट. सो दिस इज़ फाइन. 

सवाल: कुछ लोगों का यह कहना है कि असम में हिमंता बिस्वा सरमा का जो शासन है वो राहुल गांधी की गलती का ही परिणाम है. क्या आपको लगता है कि ऐसा सच में है? और क्या आपको यह भी लगता है कि इस घटना से कांग्रेस ने कोई सबक सीखा होगा?

जवाब: इट इज़ एन ओल्ड स्टोरी बट फ़क्चुअली करेक्ट. और यह खुद क्योंकि हेमंता ने कहा कांग्रेस छोड़ते समय तो यकीन करना पड़ता है. वो जो स्टोरी है कि मिलने उनसे गए तो राहुल गांधी अपने कुत्ते को बिस्कुट खिला रहे थे. उसी में बिजी थे और इसको टाइम नहीं दिया मिलने. एक एक लोकथा है चली आ रही है. और खुद हेमंता ने बात कही तो क्रेडिबल हो जाती है कि खुद कंसर्न आदमी इस बात को कह रहा है. और सबक तो कहां सीखते हैं लोग. इसीलिए मैं पहले भी कई बार कह चुका हूं कि मेरी मां भी कहती थी कि आदमी की आदतें हैं ना सिर के साथ ही जाती हैं. बड़ा मुश्किल होता है उसको इंप्रूव करना. आप देखिए वो टीएमसी की टीएमसी में चली गई. सुष्मिता जो है वो वहां पे चली गई जो है. दूसरे थे जगदंबिका पाल जो है वो भी इसी तरह से मतलब ह्यूमुलेशन के कारण से सीधे अमित शाह के घर चले गए. उन्होंने पार्टी जॉइन कर ली. तीसरा अब ये कांग्रेस के दो लीडर हैं. आप देख रहे हैं. ये चले गए वहां पे. तो सबक सीखना तो बहुत मुश्किल है. देखिए बात ये है कि जब तक राहुल गांधी की एक्सेस नहीं होगी वर्कर्स को जब तक राहुल गांधी जी से कहना चाहिए कंसिस्टेंसी नहीं होगी उनके काम में जब तक राहुल गांधी एआईसीसी में बोर्ड नहीं लगा देंगे राहुल गांधी मिलने का समय तीन से पांच तब तक ये घटनाएं होती रहेंगी. कोई पार्टी सबक नहीं सीखती है. धीरे-धीरे लुढ़ते-लुढ़ते समय निकल जाता है. दो राज्यों में हार जाती है. एक राज्य में जीत जाती है. तो हाईकमान यही समझता है कि हम जिंदा है. आलाकमान है. लेकिन आलाकमान फिर एक राज्य का होता है. और ये कांग्रेस साथ में हो रहा है. दैट वे जो है तो इट्स वेरी डिफिकल्ट टू से और रादर जैसे कहना चाहिए कि मतलब सेड टू से कि लीडरशिप हैज़ नॉट लर्न एनी लेसंस फ्रॉम ऑल दीज़ इंसिडेंट. स्पेशली हेमंता इंसिडेंट. 

सवाल: सर असम में सीटों का परिसमन हुआ. उसके बाद जो मुस्लिम बाहुल सीटें हैं उनकी संख्या 39 से 22 रह गई. चुनाव परिणामों में इसका कोई असर पड़ेगा क्या?

जवाब: इट लुक्स दैट बीजेपी इज़ अ नेचुरल बेनिफिशरी. बाकी चुनाव है, संभावनाओं का खेल है, गणित का खेल है. कह नहीं सकते. अगर नाम कटे हैं तो 70% बेनिफिट किसको है? 30% नुकसान किसको है? ये उसमें एग्जैक्टली नहीं कहा जा सकता. लेकिन यह बात निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि यह जो परिसीमन है आपका डीलिमिटेशन है इट इज डेफिनेटली एक्स फैक्टर व्हिच विल शो इट्स इंपैक्ट ऑन फोर्थ मे व्हेन द रिजल्ट्स विल कम. दूसरी एक महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस तरह से रंजन चौधरी के खिलाफ में ओवैसी और वहां पे हुमायूं कबीर ने जो गठबंधन किया है वहां पे इसी प्रकार का एक गठबंधन आसाम में हुआ वो अजमल और ओवैसी के बीच में पर ये नया गठबंधन जो है यह कांग्रेस के लिए एक चिंता का विषय है क्योंकि ज्यादातर मुस्लिम बहुल इलाकों में यह गठबंधन काम करेगा. 

सवाल: आखिर क्यों असम, केरला और पुडुचेरी में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का एक्टिव रोल नहीं दिखा. 

जवाब: यह तो एग्जैक्टली नहीं कह सकते. अब काफी भूल सुधार उन्होंने किया है. बाकी उनका मेन फोकस राहुल गांधी का केरला में रहा. उनको उम्मीद है कि हमारी सरकार आने वाली है और खुद वहां रहे हैं. एमपी रहे हैं. सारा जो है तो वहां तो उन्होंने 19-20 रैलीज और यात्राएं और रोड शो वगैरह किए. तो पूरी तरह जो है वहां पे जिसे कहना चाहिए रमे हुए हैं वो. अब आज मैंने देखा है कि आसाम में तीन दिन के लिए जा रहे हैं. इससे पहले आसाम दो दिन गए थे. प्रियंका गांधी भी केरल गई थी दो-तीन दफा. और प्रियंका गांधी के बारे में खास बात है कि आसाम के इंचार्ज हैं और केवल दो बार गई हैं. इसलिए सवाल उठा है इसके अंदर है कि क्या कांग्रेस की जो यंग लीडरशिप है प्रियंका राहुल जो है क्या ये सीरियस नहीं है क्या इस चुनाव के प्रति? तो प्रियंका से तो अपेक्षा की जाती है जो आपके वहां की इंचार्ज हैं उस राज्य की. तो दो चार 10 दिन आप जाएंगे 10 रैली में जाएंगे कुछ समय आप वहां रहेंगे वो नहीं रह रहे हैं इसलिए कांग्रेस में ये सुबुगाहट है कि राहुल और प्रियंका जो है ये प्रॉपर्ली सभी राज्यों में इंटरेस्ट नहीं ले रहे हैं दिस इज द बैकग्राउंड. 

सवाल: आखिरकार कांग्रेस के लिए असम का ये चुनाव जीतना इतना इंपॉर्टेंट क्यों है? 

जवाब: देखो चुनाव तो इंपॉर्टेंट होता है और सबसे बड़ी बात है किसी एक राज्य में कांग्रेस जीत जाए में जीत जाए केरल में जीत जाए तो इसे कहना चाहिए ना दिल्ली में जिसे कहना चाहिए ना उसको संजीवनी मिलती है जिसे आप आम आदमी भाषा में कहते हैं दिल्ली में आपकी दुकान मजबूत होती है और आसाम तो इसलिए कि पहले 55 साल तक कांग्रेस ने शासन किया. अब 10 साल से बीजेपी रूल कर रही है वहां पे. फिर क्या है? आसाम का चीफ मिनिस्टर है ना ही इज़ नॉट ओनली द चीफ मिनिस्टर आसाम. बाय प्रोसी ही इज़ द चीफ मिनिस्टर ऑफ़ सिक्स अदर नॉर्थ ईस्ट स्टेट्स आल्सो. उसका इन्फ्लुएंस होता है वहां पे जो है. और तीसरा बात ये है कि इनको उम्मीद लगती है इस बार. कई फैक्टर्स हैं. कांग्रेस को ऐसा लगता है कि हम शायद आसाम जीत सकते हैं. व्हिच मे बी रोंग लेकिन उनका अपना अनुमान है कि हम जीत सकते हैं. इसलिए आसाम पे फोकस कर रहे हैं कुल मिला के. लेकिन फोकस क्या करेंगे? आपके बड़े-बड़े नेता आपको छोड़ के जा रहे हैं. उनको आप रोक नहीं पा रहे हैं. तो कैसे जीतेंगे? खैर, दैट विल बी नोन ऑन फोर्थ मे ओनली. 

सवाल: क्या कांग्रेस के गौरव गोगोई चीफ मिनिस्टर के पद के उम्मीदवार के रूप में सामना कर सकेंगे सीएम बिस्वा का? 

जवाब: देखो एज अ पार्टी तो बड़ा मुश्किल लग रहा है इस समय तो इस समय तो ऐसा लग रहा है कि बिस्वा की कांग्रेस पे एज है एक तरह से बाकी एग्जैक्टली तो हम इलेक्शन कमीशन के गाइडलाइन से नहीं कह पाएंगे लेकिन ऐसा लगता है कि एज है एक तरह से एज अ पार्टी जो है और एज एन इंडिविजुअल तो क्या है दोनों की इमेज इंटैक्ट है मतलब ही इज़ आल्सो अ विनिंग कैंडिडेट एंड दिस अदर कांग्रेस कैंडिडेट इट इज़ आल्सो ए विनिंग कैंडिडेट ये अपनी पॉपुलर हैं कांग्रेस में और वहां अपना चुनाव जीतेंगे बट ही कांट नॉट मैच हेमंता हेमंता इज़ अ पैकेज नॉट ओनली वन इंडिविजुअल दिस मैन इज़ ओनली वन इंडिविजुअल दैट वे जो है तो देयर इज़ नो मैच देयर इज़ नो कंपैरिजन बिटवीन द टू. 

सवाल: हेमंता विश्व शर्मा और गौरव गोगोई इन दोनों ने एक दूसरे के पत्नियों की क्रमश जो अभी हाल ही में पाकिस्तान और साथ ही दुबई कनेक्शन को लेकर आरोपप्रत्यारोप लगाए हैं. इस पर आप कुछ कहना चाहेंगे? 

जवाब: अब देखो पब्लिक लाइफ में आप होते हो ना तो रिस्क आपको उठाना पड़ता है कि लोग आपके गड़े मुर्दे उखाड़ के खड़े हो जाते हैं. पहले यह गोगई के परिवार के साथ हुआ तो जबकि हेमंता ने आरोप लगाया कि उनकी पत्नी का पाकिस्तानी कनेक्शन है. बार-बार वहां जाती आती है. बेसिकली मतलब पाकिस्तानी कनेक्शन है एक तरह से. और उसके जवाब में पवन खेड़ा कुछ निकाल रहा है. कांग्रेस वाले जो है और उन्होंने कल ये कह दिया कि नॉट ओनली गोगाई वाइफ. हेमंता की वाइफ हैं. इनका भी जो है मुस्लिम राष्ट्रों से कनेक्शन है. इनके तीन पासपोर्ट हैं. दो पासपोर्ट मुस्लिम राष्ट्रों के हैं. इनका खुद का अमेरिका और दुबई में व्यापार है जो इन्होंने छिपाया है. इलेक्शन के एफिडेट में बताया नहीं है. तो एक अनंडिंग वॉर जो है ना एक इस तरह का जो है ना बिलो द बेल्ट जिसे कहते हैं वो चालू हो गया है. और अब आज मैंने पढ़ा कि हेमंता की वाइफ जो है वो 100 करोड़ का दावा टर्मिनल डिफेशन करने जा रही है. अह पवन खेड़ा कांग्रेस पे दैट. अब ये तो चलता रहेगा. दैट विल हैव लेकिन अनफॉर्चूनेट है कि फैमिली मेंबर्स को चुनाव में घसीटा जा रहा है. ऐसा वे यह नहीं होना चाहिए. आप सीएम टू सीएम रहिए, वह रहिए. आप उतरते हैं तो फिर एक बार कीचड़ वाली बात है. दैट विल पहले उन्होंने किया उन्होंने कर दिया. इस तरह का जो है ऐन चुनाव के वक्त भी ऐसी चीजों का बाहर आना कहीं ना कहीं थोड़ा डैमेज होता है. उसका तो केस पुराना हो गया. 3 महीने पुरानी बात यह नई नहीं बात है. चुनाव सिर पे है. आप देखिए पोलिंग होना है 9 तारीख को. नहीं हो तो अच्छा है. बट यू कांट स्टॉप पीपल इन पॉलिटिक्स. वो जिसे कहते हैं कि उचित अनुचित का कोई अर्थ नहीं होता. इसमें उन्होंने कर दिया है. लेकिन हेमंतता क्या है? उसको बोली फेस कर रहे हैं. उन्होंने कहा मैं दावा करूंगा जो है वो दावा करेंगे. 

सवाल: असम के लोकप्रिय गायक जुबिन गर्ग जिनकी मौत हो जाती है 19 सितंबर 2025 में उनकी मौत का सच क्या है? और साथ ही एक सवाल यह भी है कि दोनों ही पॉलिटिकल पार्टी चाहे बीजेपी हो चाहे कांग्रेस. इसे एक पॉलिटिकल इशू क्यों बना रहे हैं?

जवाब: अनफॉर्चूनेट है. लोकप्रिय गायक थे. बेचारा चला गया. सिंगापुर गए थे. आजकल इवेंट्स होते हैं. कंसर्ट्स होते हैं. आप देखते हैं. एक कंसर्ट में गए थे. नॉर्थ ईस्ट इंडिया फेस्टिवल में जो है एक महंत करके हैं. कंसल्ट करते हैं इस तरह के सारे जो हैं वहां पे और ऐसा कहते हैं वो शायद मुख्यमंत्री क्लोज हैं. किसी के क्लोज हैं. दैट्स नॉटेंट किसके क्लोज हैं. लेकिन ये लोग वहां पे गए. उनकी डेथ हो गई. एक लोग काथा यह है कि शायद वो पानी में डूबने से हुई. किसी तरह से जो है ये और इसके बाद में फिर सिंगापुर पुलिस ने जांच की सिंगापुर की घटना सिंगापुर के होटल की उन्होंने कहा नहीं इसमें ऐसा कोई षड्यंत्र नहीं और क्लीन चिट दी उन्होंने कहा नेचुरल डेथ थी यह लेकिन वापस जब आए यहां गुवाहाटी में तो मुख्यमंत्री का आकलन ये था कि नहीं ये मर्डर है एक तरह क्रिमिनल कास्परेसी है तो सात व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया वो जेल चले गए सात लोग जो है तो एक तरह से जहां तक हेमंता का आसाम सरकार का सवाल है भाजपा का सवाल है तो केस उनकी तरफ से तो बंद हो चुका है लेकिनकि कांग्रेस ने मुद्दा उठा दिया कि हम न्याय दिलाएंगे 100 दिन के अंदर और उनकी जो पांच गारंटियां हैं अदर देन हेल्थ एजुकेशन पेंशन वुमेन एंपावरमेंट एंड सो ऑन उसमें उन्होंने कहा एक गारंटी यह है कि हम न्याय दिलाएंगे तो चीफ मिनिस्टर को कहना पड़ा कि आप तो 100 दिन में करेंगे मैं आपको 30 दिन में न्याय दिलाऊंगा पूरा इसका सच क्या है वो पता लगाएंगे लेकिन अब वो तो हो चुका सात आदमी अंदर जा चुके केस बन गया है और चलेगा तो पॉलिटिकल बेनिफिट तो जो थोड़ा बहुत कोई हो सकता है अगर तो पहले हिमता ले चुके हैं और सात लोग अरेस्ट हो चुके हैं. 

सवाल: आखिर क्या है इस बार आसाम के इलेक्शंस में बीजेपी के चुनावी मुद्दे? 

जवाब: चुनावी मुद्दे तो देखो बेसिकली तो यही है कि एक तो वो है कि यूसीसी समान आचार संहिता एक तरह से सबके लिए कानून बराबर हिंदू मुस्लिम सबके लिए बराबर इसका मतलब यह है कि वहां अब मुस्लिम लोग जो हैं चार-चार शादियां नहीं कर सकेंगे. जैसे एक हिंदुत्व है और मजबूत होगा. दैट वे सेुलर कार्ड अगर आप देखते हैं वहां पे जो है दूसरा अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए जो है वो एक बड़ा मुद्दा है. अमित शाह ने कहा है कि जो अवैध घुसपैठ है इससे जो सुरक्षा है आसाम की और जो आसाम की पहचान है वो खराब हुई है. इसको हम ठीक करेंगे और तीसरा फिर डेवलपमेंट की बातें हैं. तो बेसिकली तो यही मुद्दे हैं कि समान आचार संहिता नागरिक संहिता जिसे हम कहते हैं और दूसरा अवैध घुसपैठ को रोकना और फिर डेवलपमेंट के प्रोजेक्ट्स का वादा है. 

सवाल: असम में हिमंता बिस्वा सरमा ने जाति माटी बेटी का संकल्प लिया इसका मतदाताओं पर आने वाले चुनावों में किस तरीके का इंपैक्ट पड़ेगा?

जवाब: हमारी नस्ल हमारी जमीन हमारा आधार ये उसका रूपांतरण है जो उन्होंने कहा है इसका मतलब है सारे इलेक्शन को वो लोकल कनेक्ट देना चाहते हैं आसाम की संस्कृति से जोड़ना चाहते तो हेमंता जो है एक तरह से टिपिकल आसाम का चेहरा भी हैं चीफ मिनिस्टर के साथ-साथ उसी को वो शो करना चाहते हैं कि हम जो धरती से जुड़े हुए हैं यहां पे जो है ममता जो अस्मिता का कार्ड खेलती है बंगाल के अंदर यहां अस्मिता का कार्ड है संस्कृति का जो कार्ड है वो यहां ममता आसाम में खेलते हैं. फिर वो कह रहे हैं एक्ट ईस्ट पॉलिसी है हमारी उसके तहत भी हमें इसको प्रमोट करना है. सो एक अच्छा पॉपुलर स्लोगन है चुनाव के अंदर जो लोगों के दिल को छूता है. जैसे ममता के वहां कहते थे माटी मानुष वहां पे बंगाल में चलता था. इसी तरह का ये इन्होंने किया है. इसमें इज़ फाइन फॉर देर पॉलिटिकल स्ट्रेटजी. 

सवाल: इसी प्रकार से कांग्रेस हिमंता बिस्वा सरमा के ऊपर और कौन-कौन से आरोप लगा के चुनाव में उतर रही है?

जवाब: कांग्रेस ने अब तक एक नया आरोप ये लगा दिया कि सरकार सबसे ज्यादा भ्रष्ट है. राहुल गांधी ने कल कह दिया कि वहां के चीफ मिनिस्टर सबसे ज्यादा भ्रष्ट मुख्यमंत्री हैं. हर एक के लिए कहते हैं. उनके लिए भी उन्होंने कह दिया. फिर वो कहते हैं वहां पे जो है कि एक बड़े पैमाने पे जो ट्रोल का रैकेट है वो चलता है. अवैध खनन होता है. ड्रग्स का रैकेट है. तो बेसिकली इस तरह के आर्थिक अपराधों से जुड़े हुए आरोप उनके ये हैं कि सरकार एक आर्थिक अपराध को प्रमोट करती है और बैक डोर से उसका संचालन करती है. सो ये एक आरोप है इसमें. 

सवाल: आपको क्या लगता है असम चुनाव में इस बार युवा मतदाताओं का कितना अहम रोल रहने वाला है?

जवाब: यूथ वोटर्स आर गोइंग टू प्ले डिसाइसिव रोल 9 तारीख को जो पोल है उसमें डिसाइसिव रोल होगा 18 से 19 वर्ष के लोग हैं वहां पे अभी 15 मार्च को एक सर्वे रिपोर्ट आई थी तो उसमें उन्होंने कहा है कि 72.83 लाख वोटर्स बिलोंग टू दिस कैटेगरी मतलब नौजवान जो है वोटर्स वहां पे यह हैं. इससे पहले जो गणना हुई थी उसमें 69 था तो 4 लाख यंग वोटर्स और बढ़ गए हैं. देखा जाए दैट वे जो है तो निश्चित तौर पे जो चुनाव हो रहा है इसमें यूथ का एक इंपॉर्टेंट रोल रहेगा और यूथ आप जानते हैं बेसिकली इट्स इंस्पायर्ड बाय नरेंद्र मोदी सो फार तो यही देखने को मिला है. 
सवाल: पश्चिम बंगाल और असम दोनों जगह मारवाड़ी और राजस्थानी वोटर्स बहुत ज्यादा संख्या में हैं. आपको क्या लगता है कि वोटर्स किस तरफ जाएंगे? 

जवाब: नॉर्मली तो क्या होता है रूलिंग पार्टी के साथ जाते हैं. बंगाल में थोड़ा सा डिफरेंस हो सकता है. इस बात के अंदर जो है ममता का भी कनेक्ट मारवाड़ियों से उतना ही है जितना कि भाजपा के लोगों का है. एक सेक्टर में ओवरऑल बीजेपी मे बी लीडिंग जिसे कह सकते हो आप उसका पता तो 4 तारीख को ही लगेगा. लेकिन एक कनेक्ट है. तो ब्रॉडली मैं कहता हूं बहुमत जो है रूलिंग पार्टी के साथ रहता है प्रवासी लोगों का प्रवासी राजस्थानियों का. तो ऐसा लगता है कि [नाक से की जाने वाली आवाज़] वो जो बेनिफिट है इसका प्रवासी राजस्थान में वोट का वो रूलिंग पार्टी को इन राज्यों में मिलने वाला है. जैसे आसाम है. आसाम में बड़ा स्ट्रांग कार्ड है मारवाड़ियों का. ज्यादातर देखा चीफ मिनिस्टर के साथ खड़े होते हैं. वहां पे जो है और यहां पे जोक का मैंने बताया ना आपसे 50-50 टाइप है वहां पे जो है लेकिन मेजॉरिटी में अगर आप देखेंगे आई थिंक तो जो प्रवासी राजस्थानी हैं बाहर उनका ज्यादा बड़ा हिस्सा जो है ना वो भाजपा की तरफ ऐसा लगता है कि हो सकता है ऐसा दैट वे जो है मतलब ये कहा जा सकता है और इन वोट्स को लाने करने के लिए जो है बड़ी राजस्थान से बड़े लोग गए हैं. 16 मेंबर गए हुए हैं. 

राजेंद्र राठौर को इनका इंचार्ज बनाया हुआ है. वैसे भूपेंद्र यादव जो खुद इंचार्ज हैं पूरे बंगाल के भाजपा के इलेक्शन के वो राजस्थान से हैं. दैट इज़ सुनील बंसल राजस्थान से वो गए हुए हैं. तो राजस्थान से क्या एक काफी पावरफुल जो एक है ग्रुप है लोगों का इन्हीं वोट्स को मैनेज करने के लिए स्ट्रेटेजिकली वहां गया हुआ है. आपके भूपेंद्र यादव के साथ-साथ में हैं. गजेंद्र सिंह शेखावत को भी जिम्मेदारी दी गई है. वो काफी पॉपुलर लीडर हैं मारवाड़ के जोधपुर और सब जगह. वैसे तो क्या पूरे राजस्थान ही घूमते हैं वो तो. ही वन ऑफ़ द मोस्ट ट्रेवल्ड मिनिस्टर अक्रॉस द कंट्री जिसे कहना चाहिए. आज सिक्किम में कल सीकर में फिर वहां से चूरू निकलेंगे. चूरू से निकल फिर कानपुर पहुंच जाएंगे. वहां से अयोध्या पहुंच जाएंगे. अनबिलीवेबल दैट विल है. अभी फिलहाल उनको वहां लगाया हुआ है. बंगाल के अंदर जो है तो बंगाल में गांवगांव घूम रहे हैं. उनका भी अच्छा कनेक्ट है. तो कुल मिला के है कि राजस्थानी वोटर्स जो है मुझे लगता है ये बंगाल में और आसाम वगैरह में है. रूलिंग पार्टी माइट हैव एन एज. रूलिंग पार्टी मींस बीजेपी इधर आसाम में और वहां पे बराबर का सा हो सकता है बराबर आपका बंगाल में लेकिन बंगाल में क्योंकि हमारा जो एनफोर्समेंट है यहां जो गया है राजस्थान से जो गया है वो काफी बड़ा है इसलिए हो सकता है कि बंगाल में भी बीजेपी माइट हैव ए अपर हैंड एस फ एस राजस्थानी वोटर्स आर कंसर्न लेट्स सी ऑन फोर्थ. 

सवाल: केरला में प्रधानमंत्री मोदी का एक अलग अंदाज दिखा धोती पहने ड्रम बजाया उनके इस ग्रास रूट कनेक्ट और लोकल कनेक्ट को आप कैसे देखते हैं? 

जवाब: वही इज अ बोर्न ग्रास रूट लीडर हां उनमें जितनी प्रतिभाएं हैं, जितनी विलक्षणता है, वो कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते उसके प्रदर्शन करने का या मन की बात पूरी करने का. जैसे कहते हैं ना मन की आवाज होती है करो. तो देखा वो होते हैं ना ही इज़ ऑल इन वन. मैंने आपसे कहा ना ही इज़ अ पॉलिटिशियन. पहले देखिए चाय वाला की बात आती है. कोई सोच सकता है कि एक आदमी चाय बेचता हो वो संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री बनेगा. ग्लोबल लीडर बनेगा. और प्रधानमंत्री कौन सा? 20 साल वाला. आप समझ रहे है ना ये? तो गॉड गिफ्ट है. सारी विधाएं हैं उनके व्यक्तित्व में. तो ड्रम देखा तो ड्रम बजाने लग गए. वहां पे जो है अच्छा लगता है. लोकल कनेक्ट होता है इससे. 

सवाल: आपको क्या लगता है केरलम में फिर से रिपीट होगी एलडीएफ की विजय सरकार या सत्ता में आएगी कांग्रेस लेड यूडीएफ? 

जवाब: देखो ये तो आमतौर पे तो वहां पहले तो वहां क्या रहा है कि दो ही पार्टी यह रहती है वो रहती है. अब क्या हो गया इस बार क्या बीजेपी एक थर्ड अल्टरनेटिव के रूप में वहां पे सामने आ रही है और बीजेपी क्या है कि अब कोई किंग मेकर या वो उसके रोल में नहीं है. बीजेपी खुद ये चाह रही है कि हम एक स्वतंत्र इंडिपेंडेंट फोर्स के रूप में सामने वहां पे आए. दैट वे वो ये कह रहे हैं. आपका सवाल थोड़ा डिफरेंट था इससे. आपका सवाल था इन दो में से कौन आने वाला है. जी. तो अब देखिए वैसे तो क्या होता है जैसे राजस्थान में रिपीट होते थे अल्टरनेट एक बार कांग्रेस एक बार बीजेपी तो वहां भी ये होता था एलडीएफ और यूडीएफ जो है लेकिन पिछली बार उस परंपरा को तोड़ा हो सकता है भजन लाल इस बार राजस्थान में उस परंपरा को तोड़ दें यू नेवर नो एक तरह से जो है तो उस परंपरा को तोड़ा और 10 साल रह गई आपकी एलडीएफ जो है ये तो इंकार तो आप नहीं कर सकते उससे लेकिन अगर कुल मिला के सारे सिचुएशन को अगर आज देखें तो हम ये कह सकते हैं विदाउट गोइंग वेरी स्पेसिफिक कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा ये ऐसा बाय एंड लार्ज हम ये कह सकते हैं इसके कि जो एलडीएफ जो है उसके मुकाबले में यूडीएफ जो है इट हैज़ स्लाइटली मोर चांसेस टू कम टू पावर ऐसा लगता है. एंड देन लेट्स सी ऑन फोर्थ जब हम केरल की बात करते हैं तो स्वाभाविक तौर पर उसे केरलम ही कहा जाता है. और बोलचाल की भाषा में क्या है ना कि केरल को केरलम कहने में बोलने में थोड़ा समय लगेगा. लेकिन एक अच्छा नामकरण हुआ है और केरल के लोग इससे खुश हैं नए नामकरण से. 

सवाल: प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि अब एलडीएफ सरकार के पतन का काउंटडाउन शुरू हो चुका है. आपको भी सर ऐसा लगता है?

जवाब: हां वो तो उन्होंने कहा ही है क्योंकि भाजपा का एक तो बात ये है ना कि हम तो पावर में थोड़ा टाइम लगेगा आने में अभी केरला में बीजेपी इंप्रूव कर सकती है अपने वोट्स को. अभी पावर में आने की स्थिति में नहीं है. मतलब वो हो सकती है गेम चेंजर आप कह सकते हो या वो किंग मेकर हो सकती है. कुछ 15 20 सीट आप ले आए वहां पे तो अलग बात है. लेकिन अब वो पावर में नहीं है. तो वो ये चाहते हैं कि कांग्रेस तो कम से कम नहीं आए ना. हम भाजपा का बेसिक यह है. तो उसी ध्यान से उन्होंने भी कहा है कि इसका काउंट डाउन शुरू हो गया है. और दूसरा उनका यह भी है जनता तंग आ चुकी है. और अमित शाह ने तो कहा ना कि हम सरकार बनाने जा रहे हैं केरल में. क्योंकि दोनों पार्टियों को लोगों ने नकार दिया है. नरेंद्र मोदी की बात में भी दम है. वो ये कहते हैं विंड ऑफ चेंज आने वाला है वहां पे जो है. और अब जो है ना हम एक थर्ड पार्टी के रूप में थर्ड फोर्स के रूप में नहीं जाएंगे वहां पे. हम खुद अपनी एक सार्वभौम सत्ता स्वतंत्र भूमिका लेके जाएंगे. वहां अपने आप को मजबूत करना चाहते हैं तो अच्छी शुरुआत है. आज 15 से शुरुआत है मान लो कल को 25 से होगी. एक चुनाव बाद 50 से होगी. सो दिस इज़ ऑल. 

सवाल: केरलम की मौजूदा राजनीति में तीन प्रमुख चेहरे हैं. सतीश विजयन और राजीव चंद्रशेखर. सर इनको लेकर आप क्या कहेंगे? और दूसरा ये कि बीजेपी के उम्मीदवार और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर क्या चुनाव जीत पाएंगे? 

जवाब: उम्मीदवार तीनों स्ट्रांग हैं. अपने-अपने हिसाब से विजय तो चीफ मिनिस्टर हैं. वेरी डिसाइसिव एंड स्ट्रांग एडमिनिस्ट्रेटर रूथलेस एडमिनिस्ट्रेटर और एक बाय एंड लार्ज इंटीग्रिटी है. बेटी का ईडी का केस चल दैट इज़ डिफरेंट. लेकिन बाय एंड लार्ज उन पे सीधे-सीधे भ्रष्टाचार के आरोप नहीं है. एक ठीक है. उनकी गवर्नेंस है, गुड गवर्नेंस है, एंड है, डेवलपमेंट है, स्कीम्स है, इंफ्रास्ट्रक्चर है वो ठीक है. आदमी वहां पे जो है. दूसरे आपके जो हैं ये विपक्ष के अब कांग्रेस के लीडर हैं. ये भी एक मुख्यमंत्री के दावेदार हैं. दैट वे सीनियर लीडर हैं. और इनका यह कहना रहता है कि अंदर से सीपीएम और बीजेपी मिले हुए हैं. दोनों इनका आरोप रहता है. सीक्रेट अंडरस्टैंडिंग है. बट ही इज़ अ मैन टू वॉच ये जो सतीश है वहां पे और तीसरा जो आपने कहा राजेश चंद्र इस अ वेरी रिलायबल फेस इन केरला. आप देखिए वहां की भाजपा यूनिट के इंचार्ज हैं. पहले बरसों तक एमपी रहे अब इंचार्ज हैं. खुद चुनाव लड़ रहे हैं. पिछला चुनाव हार गए थे शशि रूप से 16 17000 वोटों से त्रंदन से. अब की बार कंपेरेटिवली सेफ है. हालांकि उनके सामने जो उम्मीदवार है वो एलडीएफ का है. शिक्षा मंत्री है वहां पे. तो कह नहीं सकते लेकिन फिर भी ऐसा लगता है ओवरऑल जो बीजेपी का सिनेरियो है देश में और वह निर्विवाद चेहरा हैं पॉपुलर चेहरा है तो मेरा आकलन ये है कि वो इस बार चुनाव जीत रहे हैं. 

सवाल: पिछले कुछ समय से केरलम के मुख्यमंत्री, राहुल गांधी और तेलंगाना के बीच टग ऑफ वॉर चल रहा है इसको आप कैसे देखते हैं? 

जवाब: नॉर्मली ऐसा होता नहीं है हम दिस केरला चीफ मिनिस्टर इज़ अ वेरी डिसेंट एंड डिग्निफाइड पर्सन हम पता नहीं कैसे इसमें आ गए वो तो उन्होंने ये कह दिया कि भ कांग्रेस इज़ बीजेपी बी टीम एंड राहुल हैज़ नो मैच्योरिटी एट ऑल. और तीसरा राहुल के व्यवहार के कारण से है जो Key इशूज़ हैं, Key कंटेस्ट है उनमें जो अपोजिशन की यूनिटी है वो कमजोर हुई है. तो राहुल ने पलट के वार किया. उन्होंने कहा कि भाई मैं समझ सकता हूं आपके फ्रस्ट्रेशन को. आपके बच्चों को खतरा है. मीनिंग बाय के ईडी में केस चल रहा है बेटी का. तो आप बच्चों के प्यार में उनकी से आप सरकार से डर रहे हैं और आप जो है उस सही ढंग से हमला नहीं कर रहे हैं. उन पे जो है इसके बाद में फिर तेलंगाना के चीफ मिनिस्टर ने कह दिया कि हमने विकास और गवर्नेंस में बहुत अच्छे काम किए हैं डेवलपमेंट में एडमिनिस्ट्रेशन में. केरला को हमसे सीखना चाहिए. अनकॉल्ड फॉर तेलंगाना चीफ मिनिस्टर अपना काम करो भाई. तो इन्होंने फिर पलट के कहा हमें किसी सीखने की जरूरत नहीं है. हम तो सेल्फ सफिशिएंट हैं. इंडिपेंडेंट हैं. द अनफॉर्चूनेट टग ऑफ वार बिटवीन द पीपल. सो बट द पार्ट ऑफ पॉलिटिक्स यू कांट हेल्प इट. 

सवाल: नरेंद्र मोदी ने कहा कि दिल्ली में दोस्ती और राज्य में कुश्ती का नाटक करते हैं.  ये किसकी तरफ इशारा था?

जवाब: ये स्टायर है नरेंद्र मोदी का. वो स्मार्टली बोलते हैं बात को. अपनी बात को इशारोंशारों में कहते हैं. हां. उनका इशारा लेफ्ट की ओर था कि दिल्ली में तो लेफ्ट और कांग्रेस के साथ बैठते हैं. एक साथ चुनाव लड़ते हैं कई जगह. हम और यहां घर में आके फिर आप मतलब उसका ढोंग करते हैं कि हम अराइवल हैं और एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं. तो उन्होंने कहा वन शुड बी ट्रांसपेरेंट और जैसे कहना चाहिए हिपोक्रेट नहीं होना चाहिए. नरेंद्र मोदी का कहना ये है इशारा लेफ्ट की ओर था उनका. 

सवाल: अगर केरला में इस बार कांग्रेस की सरकार बनती है तो मुख्यमंत्री के संभावित उम्मीदवार कौन-कौन हो सकते हैं?

जवाब: कांग्रेस यही तो खास बात है ना, सरकार बनी नहीं और मुख्यमंत्री पद की दौड़ पहले से चालू हो गई. तब उसने भाजपा तो है नहीं कि सेंट्रल कमांड से एक आया नाम और उसकी शपथ हो गई वहां पे जो है अब ये कि वो लड़ते हैं अब इससे क्या होता है कि अब तीन नाम आ गए बाजार में केसी वेणुगोपाल का आ गया ये सतीश का आ गया रमेश चेथला का आ गया तो अब तीनों नेचुरली एनश्योर करेंगे इनमें से कोई नहीं बने एक दूसरे को काटेंगे आमतौर पे होता है ऐसा अल्टीमेटली कांग्रेस विल हेट इट जैसे कहना चाहिए भाई तो कैसी हैं अब केसी लोकसभा में है वैसे तो यहां पे जो है लोकसभा के एमपी हैं अभी लेकिन राहुल के करीब हैं और यह माना जाता है कि अगर वहां सरकार बनी तो राहुल गांधी के उम्मीदवार जो है केसी होंगे तो केसी ने अपना व्यवहार आचरण बदल लिया है इन दिनों ये मानते हैं कि मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं या क्या है हजार लोग उनके साथ रहे और क्योंकि चुनाव तो लड़ ही रहे हैं दैट वे जो है तो घर जा रहे हैं डिसिडेंट्स को मना रहे हैं और जिन लोगों से मतभेद था उनसे मतभेद अपना दूर कर रहे हैं तो केसी इज़ वन ऑफ़ द पर्सन जिसे कहते हैं. उसके बाद में ये सतीश है फिर वो रमेश चैतलय है. तो फिर अल्टीमेटली डिपेंड ये करेगा पहले सरकार तो बने और मैंने पहले भी कहा है ना कि मुख्यमंत्री बनना भाग्य पे निर्भर करता है. भाग्य रेखा में होना चाहिए. तो लेट्स सी व्हाट हैपेंस ऑन फोर्थ. अब केसी की जब हम बात करते हैं तो एक दूसरा पहलू ये भी है कि यहां क्योंकि केसी का पूरा प्रभुत्व है राहुल गांधी पे आईसीसी वगैरह में. तो कुछ लोग ये भी चाह रहे हैं कि ठीक है यार ईश्वर से दुआ करो केसी यहां से चले जाए केरल मुख्यमंत्री बन जाए तो कम से कम से कम यहां ओपन ग्राउंड मिले राहुल गांधी के नजदीक आने का प्ले करने का यासी पे कंट्रोल करने का. तो लेट्स सी हर आदमी के अपनी-अपनी आकांक्षाएं अपने-अपने अनुमान है जिसे कहते हैं. बट एट द एंड ऑफ द डे एक्सपेक्टेशंस आर द ट्रेजडी ऑफ़ लाइफ. सो लेट्स सी. 

सवाल: खुद राहुल गांधी ने ये संकेत दिए हैं कि केरलम की अगली मुख्यमंत्री एक महिला होगी. तो सर क्या वाकई में ऐसा हो सकता है?

जवाब: हो सकता है. अब राहुल गांधी कह रहे हैं और सरकार अगर बनती है तो डिपेंड ये करेगा कांग्रेस की कितनी सीटें हैं? यूडीएफ की कितनी सीटें हैं. कांग्रेस लेड गवर्नमेंट है ना. कांग्रेस इज़ नॉट अलोन. तो राहुल गांधी अकेले का डिक्टेट चले, अकेले का मैंडेट चले ये श्योर नहीं है. बाकी हैरानी की बात तो लोग जानने में ही लग गए हैं राहुल गांधी के इस बयान के बाद में कि वो महिला कौन है? केरल में ऐसी कौन सी महिला है? अब लोग तलाश करने लग गए हैं उसको उस कनेक्ट को जो है ये कौन महिला है? बहुत से लोग तो वैसे अप्रोच करेंगे राहुल गांधी के नजदीक जाना है. चलो एक होता है राजनीति में कि भाई इनको पकड़ो. दैट वे जो है अभी कुछ नहीं कहा जा सकता. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि फिर वही बात कि कांग्रेस के जो प्रतिष्ठित चेहरे हैं मुख्यमंत्री बनने के लिए उनकी जगह फिर एक नया चेहरा अनुभवहीन चेहरा चाहे महिला क्यों ना हो. आई एम नॉट अगेंस्ट वुमेन एंपावरमेंट. ठीक है ना?
लेकिन ये पॉलिटिकल रेफरेंस में बात हो रही है. तो कोई बड़ी बात नहीं कि राहुल गांधी फिर वहां के वेणुगोपाल जैसा एक प्रयोग वहां भी करते हैं. उस तरह से जो योग्य हो सकते हैं. कॉम्पिटेंट हो सकते हैं. लेकिन ग्रास रूट पे क्राउड कूलर नहीं है. पब्लिक कनेक्ट नहीं है जिनका. सो इट इज़ इंटरेस्टिंग टू वॉच. 

सवाल: एक बड़ा महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या जीवन की आखिरी पारी खेल रहे हैं विजयन और क्या इस चुनाव में वो हार भी सकते हैं?

जवाब: देखो राजनीति संभावनाओं का खेल है. यू नेवर नो अपेरेंटली तो ऐसा नहीं लगता है कि व्यक्तिगत तौर पे चुनाव हारेंगे वो ऐसा लगता नहीं है. जी बट यू नेवर नो 10 साल हो गए हैं. एंटी इनकंबेंसी होती है. फिर कुछ लोग ये भी देखते हैं 80 साल के तो हो गए. अब तीसरी बार क्या मुख्यमंत्री बनेंगे? तो लोग पीछे हट जाते हैं. और फिर मैंने कहा ना आपसे लक और डेस्टिनी का एक एक फैक्टर है. उसमें जो है लेकिन यह है कि अगर वो हार गए चुनाव इसका दूसरा आस्पेक्ट है वो बड़ा इंपॉर्टेंट है. वो है कि इट विल द एंड ऑफ़ लेफ्ट पार्टीज इन द कंट्री. पहले त्रिपुरा में हुआ फिर बंगाल में हुआ. अब यहां पे आखिरी पिलर जो है लेफ्ट का वो गिर जाएगा, टूट जाएगा जैसे है. तो अमित शाह ने कहा है आप देखिए. उन्होंने कहा है कि अगर ये हार गए ये जो है तो पूरे देश से लेफ्ट का सफाया होगा. जिसके कांग्रेस के लिए कहते हैं वो कि भाई पूरे देश से कांग्रेस का सफाया होगा. बेसिकली उसमें यह है जो राहुल गांधी ने कहा है और जो मैं कह रहा हूं आपसे सभी लोग कह रहे हैं कि अगर ये चुनाव हार गए तो इस हार के साथ में ही जो लेफ्ट का चैप्टर है इंडिया से बंद हो जाएगा या आखिरी लेफ्ट का होगा क्योंकि त्रिपुरा और बंगाल में पहले बंद हो चुका है. तो एक पॉलिटिकली कहा जाए जिससे एक एक अनफॉर्चूनेट इंसिडेंट होगा. पूरी की पूरी पॉलिटिकल पार्टी जो है वी मे डिफर विद लेफ्ट और सो मेनी रीज़ बट एज अ पॉलिटिकल पार्टी इट विल बी वाइड ऑफ इट विल बी रिमूव्ड फ्रॉम द पॉलिटिकल सिनेरियो ऑफ़ द कंट्री और महत्वपूर्ण बात ये है कि अगर विजय चुनाव हारते हैं तो लेफ्ट पार्टी का तो अस्तित्व समाप्त होगा ही और ये और ज्यादा ट्रैजिक होगा क्योंकि पहली जो लेफ्ट की गवर्नमेंट है कंट्री वो केरला में ही बनी थी आप देखिए पहली सरकार यहां बनी और आखिरी पतन भी केरला से हुआ. 

सवाल: आपको क्या लगता है कि पिछले कुछ समय में केरलम सरकार और मुख्यमंत्री का जो रुख है मोदी सरकार या पीएम मोदी की तरफ कुछ नरम हुआ है. ऐसा आपको लगा?

जवाब: हां बिल्कुल लगता है. और इज़ अ वाइज़ ऑन द पार्ट ऑफ़ चीफ मिनिस्टर. एक बात तो ये है ना कि फेडरल सिस्टम है. फेडरल सिस्टम डज नॉट अलाउ टू बी बागी. जिसे कहना चाहूंगा डिफाइंड ऑलवेज कि प्राइम मिनिस्टर आए तो आप एयरपोर्ट पे लेने नहीं जाओ. आप चिट्ठी का जवाब नहीं दो. पहुंचो नहीं. दिस इज़ नॉट डन. राइट. फेडरल का मतलब यह थोड़ी है. फेडरल का मतलब नहीं कि पूरी डिसेंसिव डिग्निटी के साथ जो है आपको अपनी जो रिलेशनशिप है वो आपको मेंटेन करनी है. अभी प्राइम मिनिस्टर गए थे कुछ दिनों पहले वहां पे त्रिवेंद्रम जो है तो खुद वो गुलदस्ता लेकर के चीफ मिनिस्टर पहुंचे वहां पे एयरपोर्ट पे रिसीव किया उन्होंने. अच्छा लगा. हालांकि पॉलिटिकल एनिमी ये कहते हैं कि भ क्योंकि बेटी का ईडी का केस है तो दे आर ट्राइंग टू मेक डेली सॉफ्ट ऑन देयर इश्यूज. लेकिन यह बात सच है कि उनके जो व्यवहार और रुख है थोड़ा सा लचीला हुआ है और यह एक विज़डम है पॉलिटिकल विज़डम है और इसमें यह भी एक बात कहना चाहिए ना एट द एंड ऑफ़ द डे अगर कहा जाए कि भ बाय पीस एट ऑल कॉस्ट इट इज़ नेवर एक्सपेंसिव और दूसरा ये कहते हैं इसके अंदर जो है कि वी मे एग्री टू डिसए्री बट डायलॉग शुड कंटिन्यू इन ऑल सरकमस्ट्ससेस तो केरला के मुख्यमंत्री इसको फॉलो कर रहे हैं नाइस एंड डिसेंट डिप्लोमेसी. 

सवाल: केरलम सरकार और केंद्र सरकार के बीच जो केंद्रीय सहायता को लेकर टकराव रहा है तो क्या उसका भी कोई प्रभाव इस चुनाव पर? 

जवाब: अब तो लेट हो गई बातें वो तो केंद्र के खिलाफ वाली बात थी लेकिन अब लड़ाई तो केरल में केंद्र के खिलाफ नहीं है एक तरह से लड़ाई तो उनकी कांग्रेस लेड यूडीएफ से है सिंग गवर्नमेंट की तो उसमें कहीं बात आती नहीं है जनता का थोड़ा सा समर्थन आप ले सकते हैं लेकिन अब क्या है कि बिकॉज़ चीफ मिनिस्टर है मेड फेंसेस विद द प्राइम मिनिस्टर एंड द सेंट्रल गवर्नमेंट उसका महत्व नहीं रहा उसमें इशू क्या हुआ था कि एक हर सरकार के अंदर लोन लेने का जो है एक एक लिमिट होती है, एक सीलिंग होती है सेंट्रल शेयर की जो है तो उनका कहना यह था कि हमारे प्राकृतिक आपदा का जो फंड है हमारा वो रुक गया है और सरकार जो है जो फाइनेंसियल फेडरलिज्म है उसकी पालना नहीं कर रही. पैसे हमें नहीं मिल रहे हैं. हमारे एलोकेशन में और हमारे रिलीज के अंदर जो है ना वो वो डिले हो रहा है और प्राकृतिक आपदा का जो फंड है वो हमें रिलीज़ नहीं हो रहा है. तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया. केंद्र सरकार ने भी काफी पैसा उसमें रिलीज़ किया. बट इट्स एन ओल्ड स्टोरी व्हिच हैज़ नाउ आई थिंक नो मच इंपैक्ट ऑन द करंट पोल्स. 

सवाल: आखिर केरलम चुनाव में बीजेपी की क्या उम्मीदें हैं और क्या इस बार उनका वोट शेयर बढ़ेगा?

जवाब: सबसे बड़ी उम्मीद तो ये है कि वो अपने आप को एक थर्ड फोर्स के रूप में अल्टरनेटिव रूप में एस्टैब्लिश करना चाहते हैं. शुरू में तो सोचते थे जब चुनाव चालू हुआ था कि हम जो है ना 15 20 सीट ले के आ जाएं. 20-25 सीट लेके आ जाएं. ठीक है, इंडिपेंडेंट लोग कहते हैं कि 8 10 12 सीट आने वाली है. लेकिन उनका ऐसा लगता था कि हम सीट ले के आ जाएंगे. लेकिन धीरे-धीरे जो केरल में रिस्पांस मिला प्राइम मिनिस्टर को रैली में अमित शाह को जो रिस्पांस मिला जेपी नड्डा को रिस्पांस मिला तो उसमें उनका मानस इस तरह का और वो जो पार्टी के प्रेसिडेंट हैं उन्होंने भी बहुत किया दैट वे जो है 2025 मैंने कहा जगह गए वो जो रिस्पांस मिला तो बीजेपी का माइंड चेंज हो गया. अब बीजेपी जो है ना एक थर्ड फोर्स के रूप में काम नहीं करना चाहती वहां पे. बीजेपी कहती है आज नहीं तो कल हम हमारा दिन आएगा. तो शुरू से ऐसा करो कि हम अपने आप को एक इंडिपेंडेंट मजबूत फ़ के रूप में डेवलप करें वहां पे. उसके रूप में प्रेजेंट करें. दैट विल है तो वह बीजेपी चाह रही है अल्टरनेटिव हम अपने आप करें और रही बात वोट शेयर की निश्चित बढ़ेगा पिछले चुनाव में 12 12% था इस बार निश्चित बढ़ेगा पिछली बार एक भी एमएलए नहीं था इस बार उम्मीद कर रहे हैं अभी खाता तो खुलेगा पक्का और 12:15 से खुलता है 2025 से खुलता है दिस इज़ टू बी सीन अलग बात है लेकिन वोट शेयर बढ़ेगा दिस इज़ सर्टेन. 
सवाल: आपको क्या लगता है कि केरल की जनता एलडीएफ यूडीएफ के रोटेशन को तोड़कर मोदी के विकास मॉडल को मौका देने के मूड में है? 

जवाब: बीजेपी ऐसा सोचती है जनता ने मन बनाया कि नहीं अभी समय के साथ होगा और जनता एकदम से नहीं कर सकती ना मेजर चेंज ये तो बिल्कुल एक वो हो गया ना यू टर्न वाली बात हो गई जनता के पार्ट पे जनता इन्फ्लुएंस है नरेंद्र मोदी से अमित शाह की लीडरशिप से और इसीलिए वोट शेयर बढ़ रहा है आपका वहां पे जो है लेकिन इसमें समय लगेगा एकदम से हम नहीं कह सकते कि ऐसा हो जाएगा. 

सवाल: केरलम में विजय सरकार के खिलाफ कांग्रेस लेड यूडीएफ की चार्जशीट क्या है? 

जवाब: उनकी चार्जशीट बेसिकली ये है कि एक तो गोल्ड स्मगलिंग की चार्जशीट रही है उनके गोल्ड स्मगलिंग होता है. साबलीमाला मंदिर इसमें हीरे चोरी हो गए. उसका आज तक पता नहीं चला. एक रेल का प्रोजेक्ट है. पेंशन में डिले है. इस तरह के डे टू डे जो है उस तरह के एलगेशन है. तो क्या बेसिक इस तरह का नहीं है. बाकी तो क्या 10 साल हो गए हैं. तो एंटी एसोसिएशन फैक्टर होता है. तो कोई बेसिक ऐसा कोई एकमात्र कोई बड़ा ऐसा स्कैंडल या बड़ा इशू नहीं है. और बाकी वो तो कहते हैं कि भ आपकी बेटी भी पकड़ी गई. इसने मोरल ग्राउंड से आपको इस्तीफा देना चाहिए करना चाहिए. बातें तो बाकी मोटे तौर पे वही तीन चार मुद्दे हैं जिन पे वो कर रहे हैं. 

सवाल: केरल में बीजेपी का चुनावी एजेंडा क्या है?

जवाब: केरल में बीजेपी का चुनावी एजेंडा मैंने कहा ना उनका तो एक ही एजेंडा है कि हमें अगले 10 साल में 5 साल में ये केन प्रकीर्ण यहां पे लीडिंग फोर्स बनना है. उनको आसार दिखाई देते हैं वहां बनने के. और बेसिकली देखो ना केरल भी हिंदू संस्कृति धर्म मंदिरों का स्थान रहा. ब्राह्मणवाद का स्थान रहा है. बीजेपी को उसमें भाग्य दिखाई दे रहा है. भविष्य दिखाई दे रहा है. तो उनका मेन एजेंडा है ना वह इस तरह का है. बाकी तो छोटे-मोटे इलेक्शन में आरोप प्रत्यारोप आपके आश्वासन होते हैं. चुनावी घोषणापत्र होते हैं. वेलफेयर स्कीम्स होती हैं. आप हेल्थ स्कीम्स की बात करते हैं. एजुकेशन की बात करते हैं. फ्री बिजली पानी की बात कहते हैं. वो तो अलग है. लेकिन लार्जर जो मुद्दा है वह यह है कि हमें धीरे-धीरे प्लान ढंग से वहां घुसना है और अल्टीमेटली 5 10 साल में केरल को कैप्चर करना है. दिस इज द प्रिंसिपल एजेंडा. 

सवाल: केरलम चुनाव में शशि थरूर का क्या रोल देख रहे हैं आप?

जवाब: अभी तो कोई ज्यादा रोल नहीं है. सबसे बड़ी बात ये है कि वापस आ गए हैं. एक तरह से बीच में भागी हो गए थे. मोर और लेस राहुल गांधी से मीटिंग हुई. राहुल बोट हिम तो शांति हो गई है. कम से कम अपोज नहीं कर रहे हैं. कोई इस तरह के इरिलेवेंट बयान नहीं दे रहे हैं. और चुनाव वो लड़ नहीं रहे हैं. चुनाव प्रचार कर रहे हैं. अभी चुनाव प्रचार करने गए थे कल परसों. तो अनफॉर्चुनेटली उन पे हमला कर दिया. कुछ लोगों ने वहां पे. अब हमला किसने किया? यह तो निश्चित तौर पे नहीं कहा जा सकता. लेकिन उनके गन मैन पर हमला हुआ. चोटवोट आई. पुलिस ने एक आदमी को गिरफ्तार कर लिया. तो दिस स्मॉल इवेंट लेकिन बेसिकली यह है कि ही इज़ नाउ नो मोर ए फोर्स एट द मोमेंट. वो भागी थे वॉइस ऑफ़ डिसेंट थे. अब राहुल गांधी ने मैनेज कर लिया टू दैट एक्सटेंट कि पब्लिकली चुनाव के मौके पे और वो ऐसे बयान नहीं दे जो कि डैमेज हो जिससे कांग्रेस. 

सवाल: केरलम चुनाव में एफसीआर यानी कि फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट के प्रस्तावित संशोधन को लेकर जो कंट्रोवर्सी क्रिएट हुई है उसका डैमेज कंट्रोल बीजेपी कैसे करेगी?

जवाब: डैमेज का कंट्रोल कर रहे हैं. बट स्लाइटली द डैमेज ऑलरेडी डन. अनफॉर्चूनेट टाइम पर यह मुद्दा उठाया जिसने उठाया. अब भारत सरकार तो क्या ना देखो रिफॉर्म करती रहती है. फाइनेंसियल रिफॉर्म्स करती रहती है. दिस वन ऑफ़ द फाइनेंसियल रिफॉर्म कि फॉरेन से जो कंट्रीब्यूशन आता है उस रेगुलर मॉनिटरिंग होना चाहिए. सिस्टमेटिक तरीके से चले और कानून बना नहीं है. कानून बनना है. अभी तो जो है वो पहले उसका प्रचार हो गया वहां पे. तो बैकफुट पे आना पड़ा पार्टी को. ये कहना पड़ा कि अभी हमने इसको टाल दिया है. इमीडिएटली कुछ नहीं कर रहे और ये आपके खिलाफ नहीं है. ईसाइयों को बुलाया, पादरियों को बुलाया, समझाया वहां पे जो है बेसिकली चर्च वगैरह जो है ना वहां थोड़ा सा नेगेटिविटी का माहौल बना है और कांग्रेस इसको एनकश कर रही है. वहां पे है तो डैमेज तो थोड़ा बहुत हुआ है. लेकिन कोई ऐसा कोई बहुत बड़ा पॉइंट नहीं है. और मैंने आपसे कहा ना केरल में वैसे भी क्या ना बीजेपी का एक है लेकिन कोई बहुत मेजर रिस्क नहीं है उसके सामने. भाई बीजेपी इस नॉट गोइंग टू फॉर्म द गवर्नमेंट. बीजेपी इस गोइंग टू ग्रो नंबर ऑफ सीट्स एंड वोट शेयर बेसिकली तो ठीक है थोड़ा बहुत कोई नेगेटिविटी होगी तो हो जाएगी भाई गवर्नमेंट ने उसको कर लिया डैमेज कंट्रोल ये कह के कि फिलहाल हमने टाल दिया फिर आपसे बात करके इसको देखेंगे. 

सवाल: केरलम में वर्तमान कांग्रेस के 13 में से 9 सांसद मांग रहे थे विधानसभा टिकट आप इस सिनेरियो को कैसे देखते हैं?  

जवाब: अब सत्ता का मोह तो होता ही देखो अब दिल्ली में तो सरकार है नहीं कांग्रेस की तो बैठे हुए हैं खाली सरकारी मकान के साथ और क्या सरकार में काम भी नहीं होते दिल्ली में. नेचुरली अपोजिशन की गवर्नमेंट है, बीजेपी गवर्नमेंट है. तो मन में है कि चलो सरकार बनने वाली है. चलो ठीक है. लेट्स आवर ओन पाई इन द गवर्नमेंट. तो कोशिश थी. कई लोग तो मान गए. दो एमपी ऐसे थे नहीं माने. अंत तक नहीं माने. तो सुधाकरण वहां के पीसीसी चीफ वहां के रहे हुए हैं. उन्होंने कहा मैं तो पार्टी छोड़ दूंगा अगर चुनाव नहीं लड़ने दोगे तो. राहुल गांधी ने समझाया अल्टीमेटली राहुल सक्सीडेड इन मनाओ हिम जो है एक दूसरे और थे. उनको भी फिर मना लिया. तो उन्होंने तो विड्रॉ कर लिया और सुधाकरण को एक जिम्मेदारी दे दी कि तुम इन तीन जिलों के इंच चार्ज और चुनाव लड़ाओ तुम लड़ो मत जो है ये तो टाइमिंग मान के चलो कल को राज आएगा तो राज में अपना कोई ना कोई शेयर हो जाएगा कहीं चेयरमैन बन जाएंगे कुछ और बन जाएंगे लेकिन बहरहाल उस संकट को राहुल गांधी ने टाल दिया और मैं तो हैरान हूं कि वो वो टल गया मतलब राहुल गांधी इस लिमिटेड पॉलिटिकल सक्सेस इन केरला के उसने इस एक इशू था जो है कंट्रोवरर्शियल उसको उन्होंने मैनेज किया तो स्लाइटली अनयूजुअल फॉर हिम लेकिन हुआ. 

सवाल: इस वक्त छह से ज्यादा खाड़ी देशों में युद्ध के हालात बने हुए हैं और इस युद्ध की वजह से बड़ी संख्या में लोग केरल में वापस लौट कर आ रहे हैं. अब इन देशों से आने वाले रेमिटेंस और भारत में इनके रोजगार को लेकर क्या होगा?

जवाब: इज़ अ वेरी वेरीरी सीरियस इशू व्हिच विल अट्रैक्ट द अटेंशन ऑफ द न्यू गवर्नमेंट इन केरला इमीडिएटली एंड इवन तमिलनाडु आल्सो दैट वे देखा जाए तो भाई वैसे तो क्या है कि खाड़ी देशों में भारत के 90 लाख से एक करोड़ के लोग आसपास लोग हैं जो रहते हैं बिज़नेस करते हैं. मतलब सर्विज करते हैं बेसिकली इनवॉल्वड हैं. उसमें जो है टेक्निकल लोग भी हैं और दूसरे लोग मजदूर लोग भी हैं वहां पे. अब आप देखिए दुबई और इन देशों में केरला का सवाल है तो कम से कम 25 30 लाख उस 90 में से इनके भी होंगे वहां पे जो है तो अब सवाल ये है कि खाड़ी युद्ध अगर सीरियस हुआ और लोग भाग के यहां पे आ गए तो अरबों रुपए का जो रेमिटेंस आता है रेमिटेंस इकॉनमी कहते हैं केरला की इकॉनॉमी को रेमिटेंस इकॉनमी कहते हैं. वो डिस्टर्ब हो जाएगी वहां पे है. फिर लोग आएंगे क्या करेंगे? उनको रोजगार दिलाना गलत समस्या है. तो बस ये है कि यू मस्ट कीप योर फिंगर्स क्रॉस कि शांति हो जाए. भगवान ट्रंप को सद्बुद्धि दे. झगड़ा खत्म हो जाए और ये खाड़ी देशों के लोग जो वहां है वही रह. खुद भी खुश रह और भारत में भी अरबों रुपए अपने परिवार वालों को भेजते रह. तो हम केवल दुआ कर सकते हैं. 

सवाल: सर क्या कोलकाता में इस बार 4 मई को फहराएगा भगवा?

जवाब: अब देखो इलेक्शन कमीशन की गाइडलाइन नहीं होती तो मैं आपको बता देता. लेकिन लेकिन हम ब्रोली आप ये कह सकते हैं भाई नेक टू नेक तो है दैट बीजेपी कॉन्फिडेंट है क्योंकि आप ये देखिए कि प्रधानमंत्री गए थे अभी तो सभा में उन्होंने खुद नहीं कहा कि बंगाल में भाजपा के पक्ष में जबरदस्त माहौल है और लोगों ने टीएमसी को नकार दिया है अमित शाह भी लगभग यही बात कह रहे हैं और यह सच है कि भाजपा के लिए बंगाल में सरकार बनाने का कोई अंतिम अवसर है तो यही है क्योंकि बीजेपीक के एंट्री पॉइंट पे जो चेक पोस्ट होती है ना जब जाते हैं गाड़ी रोक लेते हैं वहां शहर में घुसने से पहले तो भाजपालक के चेक पोस्ट पे खड़ी है एंट्री पॉइंट पे खड़ी है इसमें संदेह नहीं है अब बस थोड़ा सा इधर से उधर कुछ भी हो सकता है आप कह नहीं सकते लेकिन ये है कि भाई अगर उनको कभी सरकार उनकी बननी है बंगाल के अंदर तो आज वो सरकार बनाने के सबसे निकट है ये कहा जा सकता है दैट इज है और फिर ममता का पूजा पाठ और उसका देवी शक्ति कह नहीं सकते लेकिन ब्रॉडली तो हम ये कह सकते हैं कि बीजेपी जो है ना उसके एंट्री पॉइंट पेक के आज खड़ी है. दैट वे तो बाकी चार को फिर आप देखेंगे भगवान जय. 

सवाल: सर पश्चिम बंगाल के हालात से निराश होकर प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव की घोषणा से पहले एक रैली में कहा था कि अगर ऐसे ही हालात रहे तो पश्चिम बंगाल में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएगा. प्रधानमंत्री मोदी की इस अपील का पश्चिम बंगाल के मतदाताओं पर क्या भावनात्मक असर पड़ेगा?

जवाब: जबरदस्त असर पड़ा होगा. पहले भी था प्राइम मिनिस्टर है मेड इट वेरी क्लियर दिस टाइम और कल फिर उन्होंने कहा है एक खास मजहब के लोग जो हैं वो आपको रहने नहीं देंगे ठीक से अगर ऐसा हुआ तो वो इन अ वे कि अगर बांग्लादेशी हावी हो गए इस तरह के तो वहां के जो हिंदू हैं बांग्ला के वो अल्पसंख्यक हो जाएंगे. यह दिस इश मोर देन इलेक्शन कैंपेन. यह राष्ट्र की सुरक्षा से, राष्ट्र की अस्मिता से और वहां की जो पॉलिटिकल जग्राफी है उससे जुड़ा मुद्दा है कि अगर ऐसा हो गया इन अ वे तो वो तो फिर मुस्लिम स्टेट होगी ना मोर और लेस देखा जाए तो. 

सवाल: राजनीति संभावनाओं का खेल है. अभी पूछा गया कि भगवा फहराएगा क्या बंगाल में? तो मेरा ऑन द अदर साइड ऑफ़ द कॉइन एक आपसे सवाल है कि फर्ज करते हैं ऐसा कुछ होता है कि इस बार फिर ममता दीदी भाजपा को रोक देती हैं और फिर से चौथी बार सरकार बना लेती हैं. तो आप बंगाल का कल कैसा देखते हैं?

जवाब: यू कांट चेंज द डेस्टिनी. भाग्य. कल यही मैंने एक आदमी से डिस्कशन हो रहा था एक पत्रकार से. तो मैंने पूछा कि भाई वो क्या आसार हैं? तो उसने कहा इस बार तो सरकार है ना बीजेपी की बन जाएगी वहां पर जो है तो हमने कहा चलो एक पल के लिए जो सवाल आपका वही हमने उससे पूछा कि ऐसा हुआ तो क्या होगा तो उसने अपना सिर पकड़ लिया यू बैठ गया करके मैंने कहा क्या हुआ ये जो है तो उसने कहा साहब फिर तो फिर तो कुछ है ही नहीं कुछ है से क्या मतलब उसने अगले 5 साल में तो वो जो 33% मुसलमान है वहां पे बांग्लादेश और आ जाएंगे सारे तो बराबर हो जाएंगे बिल्कुल तो फिर क्या है फिर तो दूसरा देश हो जाएगा यहां पे तो जो तो बड़ी वो शोक मुद्रा में आ गया. उस बात को करते-करते जो है तो आप जो कह रहे हैं नहीं कि क्या होगा तो दो बातें तो क्लियर दिख रही है सामने. एक तो अवैध घुसपैठ के मुद्दे का समाधान नहीं होगा. बंगादेशियों का आना जाना जारी रह सकता है. मात्रा कम हो सकती है. मान लो केंद्र के दबाव से या केंद्र के इंटरवेंशन या एजेंसी का जो रिमोट कंट्रोल होता है उससे वचेंसी कम रह सकती हैं. दूसरा यह होगा कि विकास कार्य बड़े पैमाने पे केंद्र के नहीं हो पाएंगे क्योंकि केंद्र और राज्य सरकार में टकराव इनबिल्ट है जो आगे भी एक्सटेंड होता रहेगा आगे. तो आप जिस तरह का एक विकास की बात आप सोचते हैं कि बड़ी-बड़ी योजनाएं करेंगे वो नहीं होगा. दैट वे जो है तो अब कहा नहीं जा सकता लेकिन आपने एक संभावना बताई है तो संभावना देखो राजनीतिक संभावनाओं का खेल है लेकिन इस बार न जाने क्यों लग रहा है सभी लोग ये कह रहे हैं कि बीजेपीक के एंट्री पॉइंट पे खड़ी है सो लेट्स सी फिर तो. 

सवाल: सर एक चीज और जो लंबे समय से चर्चित है बंगाल को लेकर कि ओवैसी ने हुमायूं कबीर के साथ जो अलायंस किया है वो किसका वोट काटेगा सर और वो किसको फायदा देगा? 

जवाब: बेसिकली तो इट विल एडवर्सली अफेक्ट मुमताज मुस्लिम वोट बैंक एक तो ये है. दूसरा इसकी चपेट में अधीर रंजन चौधरी आ गए हैं. उनके खिलाफ भी मोर्चा बना लिया इन लोगों ने तो उसको थोड़ा बहुत इफेक्ट पड़ेगा. लेकिन बेसिकली तो मानना चाहिए कि मुस्लिम जो वोट बैंक है ममता का वो मतलब इससे डैमेज होगा. ऐसा माना जाता है. दैट वे लेकिन कभी-कभी क्या होता है मुस्लिम वोट बैंक या हिंदू वोट बैंक कोई भी वो देख लेते हैं सामने वाले में कितना दम है. उनको लगता है कि वोट वेस्ट है इसको वोट्स देना तो फिर देते नहीं वोट उसको. फिर ममता को ही देंगे आगे जाकर के वहां जो है. लेकिन अपेरेंटली जो देखा जाए ममता मे बी अ लूजर विद दिस डेवलपमेंट. अब यह जो है यह मुस्लिम लीडर हैं वहां के जो है और साम दाम दंड भेद में है रिसोर्सफुल है. अभी एनडीपीसी एक्ट का कोई केसवेस भी ममता ने बनाया 10 करोड़ का कोई बना है वो पार्टी छोड़ के आ गए नई पार्टी बना ली उन्होंने ममता परेशान है. फिर क्या है जिसे कहते हैं ना कि एक और नेगेटिव डेवलपमेंट ओवैसी जो है वह जुड़ गए उनके साथ और 202 सीटों पर उन्होंने कैंडिडेट खड़े कर दिए जो है अब पता नहीं रिमोट कंट्रोल पे कौन चला रहा है उन दोनों को इट इज वेरी इंटरेस्टिंग टू इन्वेस्टिगेट जो है ये लेकिन ऐसा लगता है कि उसका नुकसान टीएमसी को होना चाहिए कितना होता है नहीं कह सकते लेकिन जो डायरेक्शन है वो नेगेटिव है ऐसा लगता है बाबरी मस्जिद मैं एक नई बनाऊंगा यहां पे अपने गांव में यही जो कबीर जो है ये और बनाने लग गए वहां लोग कोर्ट में चले गए हाई कोर्ट में उन्होंने कहा हम दखल नहीं देंगे सुप्रीम कोर्ट ने कहा नहीं हम इसमें दखल नहीं देंगे और मस्जिद अलग बन रही है तो मतलब क्या है कि मुस्लिम वोट बैंक को डिवाइड करने का पूरा एफर्ट किया है इन दोनों ने ओवैसी प्लस इसने रिमोट कंट्रोल चाहे कहीं भी हो लेकिन फेस वैल्यू भी यही है और वो कितना कारगर होता है ये चार को मालूम पड़ेगा लेकिन कुछ ना कुछ नुकसान इस पे डिबेट हो सकती है नुकसान कितना है लेकिन कुछ ना कुछ नुकसान ममता के वोट बैंक मुस्लिम वोट बैंक को होगा यह तय. 

सवाल: चुनाव आयोग की एसआईआर एक्सरसाइज की वजह से करीब 66 लाख या उससे अधिक लोगों के नाम कटे हैं. अब चुनाव में इसका फायदा बीजेपी को होगा या टीएमसी को?

जवाब: यू कांट से अभी तो इंप्रेशन ये है कि जो लोग कटे हैं ज्यादातर बांग्लादेशी थे, घुसपैठिए थे. इस तरह के लोग थे जो ममता का वोट बैंक था. ऐसा इंप्रेशन है. बाकी तो आंकड़े किसी के सगे नहीं होते चुनाव में. चुनाव आंकड़ों का खेल होता है कि वहां पर क्या किस तरह से होता है. दैट वे जो है लेकिन अब यह है कि 22 65 लाख तो आपने कह दिया है ही. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि छ तारीख तक आप जो है अपने क्लेम दे सकते हो और ट्रिब्यूनल में जाके भी आप एडिशनल डॉक्यूमेंट वगैरह है. पर कितने लोग दे पाएंगे? कितने लोग नहीं दे पाएंगे. ये डेमोक्रेसी का एक दूसरा पहलू है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने थोड़ा हार्ड बनाया है लोगों को. उन्होंने ऑब्जरवेशन दिया है कि एक बार एसआईआर से अगर नाम कट गया इसका मतलब ये नहीं कि हमेशा नाम कटा रहेगा. नाम कटा हुआ नाम फिर भी जुड़ सकता है. लेकिन अपेरेंटली ऐसा लगता है फेलर द स्टेट गवर्नमेंट है. ज्यादातर राज्यों में ऐसा काम करने का पूरी जो जिम्मेदारी है राज्य सरकार की है. इलेक्शन कमीशन का तो असिस्टिंग रोल है. दैट वे जो है तो वहां पे नहीं हुआ. लेकिन उसका अब जो गलती है वो राज्य सरकार की है. थोड़ी बहुत आयोग की रही होगी और लिटिगेशन की कई लिटिगेशन एक कारण रहा होगा. बट एट द एंड ऑफ़ द डे ये एक सच है कि कई लाख लोग है ना वोट देने से सर वंचित रह जाएंगे. 

सवाल: पश्चिम बंगाल में कब तक यह माना जाए कि एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी और जिस संभावना का आपने जिक्र किया वो अभी भी कंटिन्यू है कि क्या वाकई में लाखों लोग अपने वोटर राइट से वंचित रह जाएंगे? 

जवाब: कब पूरी होगी ये तो अभी निश्चित तौर पे नहीं कहा जा सकता कि अब जुडिशियल ऑफिसर्स लग गए हैं प्रोसेस और थोड़ा सा लंबा हो गए हैं. एक तो होता है ना कि एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर किसी केस को डिसाइड करता है. एक होता है जुडिशरी मजिस्ट्रेट बैठ के डिसाइड करता है. मजिस्ट्रेट का प्रोसीड थोड़ा ज्यादा लंबा होता है. ज्यादा प्रोसीजरल होता है और लंबा हो गया. प्लस ट्रिब्यूनल में लोग जाएंगे. एडिशनल डॉक्यूमेंट पेश करेंगे. ट्रिब्यूनल में कितना समय लगेगा तो कह नहीं सकते हैं. बट रिजल्ट एट द एंड ऑफ़ द ये जो आप कह रही हैं कि लोग वोट देने से वंचित रह जाएंगे. अब सवाल ये है कि जिम्मेदारी कौन? तो अब नन इन द सेंस कि भ राज्य सरकार को दोषी मान लो. थोड़ा लोगों को मान लो. लोगों ने इतनी रुचि नहीं. लोग घबरा गए. कहीं ये भी होता है कौन से डॉक्यूमेंट है. काहे का झगड़ा पड़ा है. छोड़ो इस झगड़े हमें वोट ही नहीं देना. यह भी एक टेंडेंसी लोगों के दिमाग में आ जाती है. लेकिन एट द एंड ऑफ द डे इशू थोड़ा सा लार्जर हो गया कि एसआईआर से चुनाव आयोग से आगे चला गया इशू. इशू के इन सब के कारण से लोग वंचित रह गए. तो अब यही है इसका कि ऐसा काम करो अगले चुनाव में वंचित नहीं रह जाए. तो जो एसआर का आपने कहा ना कब तक पूरा होगा. अब 23 राज्यों में जो थर्ड चरण होना था वो चुनाव आयोग को करना था अप्रैल से. उन्होंने पोस्टपोंड कर दिया है. कहा कि नेशनल सेंसेस चल रहा है जो 16थ नेशनल सेंसेस है. प्लस क्या मैन पावर का शॉर्टेज है और फिर ये झगड़े हैं बंगाल वगैरह के तो इलेक्शन कमीशन भी इंस्पाइट ऑफ़ देर बेस्ट एफर्ट्स बेस्ट परफॉर्मेंस कभी वो भी डीमोरलाइज होते हैं कि अरे क्या है खत्म ही नहीं हो रहा मामला तो थोड़ा लंबा हो गया तो निश्चित तौर पे नहीं कहा जा सकता ये कि एसआर का काम पूरा जाके कब होगा लेकिन एक अच्छा प्रयास है एक बार बुरा लगता है लेकिन ये तो फैक्ट है ना जिसके पास कागज पत्र सबूत है वही वोट दे इसमें तो कोई बात ही नहीं है दैट इन प्रिंसिपल तो इट इज़ अ गुड एफर्ट जो है अब कब पूरा होगा लेट लेट्स सी. 

सवाल: पश्चिम बंगाल में मालदा जिले में ही एसआईआर का काम कर रहे सात जुडिशियल ऑफिसर्स को 9 घंटे तक बंधक बनाकर रखा गया. सर इस पूरे घटनाक्रम को आप कैसे देखते हैं?

जवाब: वेरी अनफॉर्चूनेट वेरी डेयरिंग कंप्लीट ब्रेकडाउन ऑफ़ लॉ एंड ऑर्डर मशीनरी इन मालदा डिस्ट्रिक्ट. इसलिए चीफ जस्टिस ने चिट्ठी लिखी. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को. उन्होंने अच्छा किया. सुमोटो उसका कॉग्निस लिया और बड़े शार्प कमेंट दिए कि इट्स अ कंप्लीट ब्रेकडाउन लॉ एंड ऑर्डर मशीनरी इन मालदा डिस्ट्रिक्ट और चीफ सेक्रेटरी डीजीपी और वहां के जो कलेक्टर हैं मालदा के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट उनको 6 तारीख को सुप्रीम कोर्ट में पेश होने के लिए कहा गया उनको तो सुप्रीम कोर्ट हैज़ कम टू द रेस्क्यू ऑफ़ द पीपल. लेकिन आप देखिए ना जो नरेंद्र मोदी ने कल कहा है कि घटना जो है ना यह बिहार के बाद में यह दूसरा महाजंगल राज है बंगाल में जो उसकी ओर संकेत करती है. ममता ने हाथ झाड़ लिए. कहा कि अब तो चुनाव आयोग का शासन है. मेरा तो शासन ही नहीं है. मेरी क्या जिम्मेदारी है? लेकिन अब जानने वाले तो जानते हैं ना. कि आप कुर्सी पर नहीं है लेकिन मोरल इनफ्लुएंस तो रहता है और जो बैकग्राउंड है वहां बंगाल में जो कुछ सारा हो रहा है दैट वे जो है तो यह बड़ी सीरियस स्थिति है तो अब देखिए सुप्रीम कोर्ट इसको कैसे हैंडल करता है और इस ट्रेजडी का एक दूसरा पार्ट और देखिए वो आप ये देखिए कि जो अफसर आते ही जब ये घोषणा हुई चुनाव की तो ममता के जो अफसर करीब कहे जाते थे इंक्लूडिंग लेडी चीफ सेक्रेटरी करीब कहे जाते थे ब्यूरोक्रेसी में कोई किसी करीब नहीं होता हालात सत्ता समय के साथ-साथ चलते हैं लेकिन फिर भी एक इंप्रेशन होता है कि हमारे करीब हैं तो जो करीब के लोग थे सारे हटा दिए. 25-50 एसपी हट गए, कलेक्टर हट गए और लोग हट गए. सारे वहां पे जो है उनके लिए हटना शुभ रहा. उल्टा हो गया. तो अब क्या हुआ कि जो नए लगाए थे जिनको मतलब आप कह दो कि चुनाव आयोग ने लगाया था या कहीं ना कहीं बीजेपी के लोकल लीडर्स की सिफारिश हो सकती है दो चार लोगों के लिए कि यार इनको भी देख लेना. प्रैक्टिकल लाइफ है. वो लोग लगे होंगे जाके. या चुनाव आयोग की पसंद के लोग थे वो. वो उल्टा फंस गए. ये घटना हो गई. वो रोक नहीं पाए उसको. सुप्रीम कोर्ट ने टांग दिया उठा के और एक्शन होगा उसके अंदर जो है तो क्या ट्रेजडी है कि जिन अफसरों को अपना समझ के लगाया गया था वह सिस्टम के शिकार हो गए. 

सवाल: पश्चिम बंगाल में ही सीबी आनंद बोस की जगह एक पूर्व आईपीएस अधिकारी आर एन रवि को राज्यपाल नियुक्त किया गया है. सर आपको लगता है कि आने वाले चुनावों में इससे कोई प्रभाव पड़ेगा?

जवाब: वैसे तो क्या है कि गवर्नर्स एंड ब्यूरोक्रेट्स हैव वेरी लिमिटेड रोल इन इलेक्शंस. एक्सेप्ट बंगाल जैसा हो जाए. बिल्कुल ही आप वह करने या बिहार में पहले होता था कि वोट ही नहीं डालने दो या अपने ठप्पा लगा के डलवा दो बात अलग है. बाकी नेताओं को भ्रम रहता है कि अपने अफसर रहेंगे फील्ड में तो चुनाव जीतेंगे. चुनाव जनता ही जीताती है. जनता ही चुनाव हराती है दैट वे. इनका थोड़ा सा यह है कि ममता को डील करने के लिए टफ एडमिनिस्ट्रेटर चाहिए. जो गवर्नर थे ऐसा लगा होगा कि वो सॉफ्ट हो गए हैं थोड़ा या कोई आदमी निराश भी हो जाता है. का माहौल एक अलग तरह का है. गवर्नर भी सोचता है यार कब तक झगड़ा करेंगे क्या होगा? जो भी कारण रहा होगा ऐसा मे बी एडमिनिस्ट्रेटिव इनफिशिएंसी मे बी कोई पॉलिटिकल रीज़न होगा उन्होंने उसको वहां से उठाके यहां लगा दिया स्ट्रांग आदमी है दैट वे जो है तो ऐसी आशा की जाती है कि प्योरली एडमिनिस्ट्रेटिव ग्राउंड्स पे ही लगाया गया है कि ममता को हैंडल करने के लिए एक स्ट्रांग आदमी चाहिए और केंद्र को लगा होगा कि जो मौजूदा गवर्नर थे उनकी तुलना में ज्यादा स्ट्रांग अफसर है क्योंकि वहां इन्होंने स्टालिन के साथ में लोहा लिया था वहां पे झुके नहीं थे और हैंडल किया था उसको तो शायद यही एक कारण रहा होगा बीइंग अ टफ एडमिनिस्ट्रेटर एंड लॉजिकल पर्सन गवर्नमेंट मस्ट हैव बोट इन एटलक राजभवन. 

सवाल: सर मालदा में लॉ एंड ऑर्डर मशीनरी के ये जो कंप्लीट ब्रेकडाउन की तस्वीरें हमने देखी क्या इसके बाद यह माने कि इसके मद्देनजर वहां पर राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है?

जवाब: होना तो यही चाहिए एट द एंड ऑफ़ द डे तो फिर क्या है? अब पहले वो जो घटना हो गई थी जो ममता दीदी कंप्यूटर ही उठा के ले गई थी वहां से. अब उनकी शिकायत हो सकती है. ईडी वाले ज्यादती कर रहे हैं या यह कर रहे हैं बायस हैं. पूर्वाग्रह में हैं. वह एक अलग इशू है. लेकिन एज ए लॉ ऑफ़ द लैंड तो आप ऐसा नहीं कर सकते ना कि जांच चल रही हो और पुलिस उस पे सीज करने वाली उस कंप्यूटर को आप खुद ही उसको सीने से लगा के चल दे वहां से. वो ठीक है उनको इलेक्शन में मैंने सुना इलेक्शन में उनको बेनिफिट हुआ इसका कि बहुत सारे व्यापारी और बिजनेसमैन जो ईडी के खिलाफ रहते हैं कई दफा ईडी कारवाई करती है अब जो किसी चोरी पे टैक्स पे कारवाई करती है तो वो लोग खिलाफ होते हैं तो ऐसा भी कहते हैं कि उनका समर्थन भी उनको ममता को मिला है वो तो एक डिफरेंट इशू है वो तो ईडी का एक अलग इशू है उस पे अपन नहीं जा रहे हैं अभी इसके अंदर जो है लेकिन उनको ऐसा लगा तो वो भी उस समय ऐसा हो गया था कि उठा के ले आई थी वहां से तो उसी दिन राष्ट्रपति शासन लगाने के हालात थे देखा जाए तो ईडी वाले बेचारे सारे रोते रह गए आखिर अफसर ही तो हैं वो कांट कमट विद पॉलिटिकल फोर्स पॉलिटिकल पावर कितना आप उनको सीआरपीएफ दे दो सीएसएफ का कवर दे दो एक लिमिट है अफसरों के काम करने की हम उनको गुनाह थोड़ी कि ईडी में लग गए चांस की बात है आज वो आईपीएस हैं किसी डिस्ट्रिक्ट में होते तो राज कर रहे होते हैं वहां पे अब ईडी में भी राज करते हैं लेकिन ऐसे फंस जाते हैं कभी-कभी ऐसे मामले के अंदर जो है और बाकी ये है कि ईडी में जो लोग लगते हैं बहुत ही कॉम्पिटेंट और बड़ी उसके बाद लगते हैं छंटनी स्क्रूटनी के बाद लगते हैं उनका सारा रिकॉर्ड देखा जाता है इंटीग्रिटी देखी जाती है और आम धारणा यही है ना कि ईडी ज्यादा इफेक्टिव काम करती है. 

केसेस लोग ईडी को सौंप देती हैं सरकारें. इनकम टैक्स वाले सौंप देते हैं ना केस को. एक भरोसा होता है कि यार दे विल गो टू द डेप्थ एंड दे आर वेरी कॉम्पिटेंट पीपल. एनी हाउ तो उससे उनका मोराल डाउन हुआ. जी. ईडी वालों का और पुलिस फोर्सेस का वहां जो है लेकिन राष्ट्रीय शासन नहीं लगा. वो एक एप्रोप्रियट था. अब तो बिल्कुल ही क्लियर हो गया ये ये वाला जो है लेकिन वही सवाल है ना पॉलिटिकल रिस्क है बीजेपी को लगता है कि राष्ट्रीय शासन लगा देंगे तो ममता हीरो हो जाएगी होगी कि नहीं अलग बात है एक पॉलिटिकल डाउट आता है पॉलिटिकल एडवाइजर्स विल नेवर एडवाइस टू पुट द स्टेट अंडर 356 या शासन वहां पे इसको लगा दें तो अब ये बड़ी मतलब विचित्र स्थिति है. उसको आप राज शासन आप लगा नहीं सकते. सुप्रीम कोर्ट का मन करे तो वो भी कह सकता है कि अब उन्होंने तो कह दिया ना कि कंप्लीट ब्रेकडाउन ऑफ लॉ एंड ऑर्डर मशीनरी इन मालदा इसका मतलब क्या होता है? 356 राष्ट्रपति शासन उनका ऑब्जरवेशन तो आ गया. कल को अगर अमित शाह नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय शासन लगा देते हैं हम तो सुप्रीम कोर्ट से कोई रिलीफ नहीं मिलेगा. तो उनका ऑब्जरवेशन क्लियर है कि इट्स अ ब्रेक डाउन. लेकिन इसका फैसला कौन करे और चुनाव सिर पे है तो इसमें पोलिंग है वहां पे जो है तो अब लगता है ये घटना भी ऐसी रहेगी तो राष्ट्रीय शासन तो लगेगा मुझे ऐसा लगता नहीं है. 

सवाल: भाजपा ममता दीदी के इस प्रचार से बहुत ज्यादा परेशान है कि अगर बीजेपी सरकार में आती है तो मांस मछली खाना बंद हो जाएगा. आखिर बीजेपी इसका डैमेज कंट्रोल कैसे करेगी?

जवाब: डैमेज कंट्रोल क्या करो? ममता की इन बातों के सामने सिर पकड़ के बैठ जाओ. अब कितना खतरनाक नैरेटिव बना के लाई है वह. हम् एकदम से बीजेपी लोकल बीजेपी बैकफुट पे आ गई. वर्कर बेचारे बैकफुट पे आ गए एकदम से. कितना टर्ची माहौल है. अब शक्ति की पूजा होती है बंगाल के अंदर. आप देखिए तो वहां पे क्या होता है कि मछली उसका पार्ट है. चाहे हिंदू हो, चाहे आप मुस्लिम हो, वेज हो, नॉनवेज हो, कुछ भी उसका पार्ट होता है. और उसने ऐसा माहौल बना दिया कि सरकार आएगी तो मांस और मछली के बिक्री पे उपयोग पे प्रतिबंध लगा देगी. सरकार स्टेट को वेजिटेरियन स्टेट डिक्लेअर कर देगी. क्या कल्पना की उड़ान भरी है. हैं? लेकिन बहुत से अनपढ़ लोग होते हैं. एक मास होता है लोगों का. मान जाते हैं. एक प्रॉब्लम क्रिएट कर दी उसने भाजपा के इलेक्शन कैंपेन के लिए. तो भाजपा को बैकफुट पे आई दो चार दिन. फिर पलट के एक्शन तो लेना ही था. रेसोंड करना था आपको. तो उन्होंने क्या किया कि एक आदमी ने वहां पे एक 5 किलो की मछली हाथ में ले ली और प्रचार करने निकल गया. 

अब प्रचार करने जाते हैं तो मछलियां साथ-साथ बांटते जा रहे हैं दिखाने के लिए. मछली विरोधी नहीं है. और एक वहां मिनिस्टर हैं बंगाल के. तो उन्होंने कह दिया कि अगला मुख्यमंत्री जो है अगर भाजपा का आता है वहां तो नॉन वेजिटेरियन होगा टू दैट एक्सटेंट बात चली गई वहां पे जो है तो इसमें कोई शक नहीं है कि बहुत ही शरारतपूर्ण ये प्रचार था या इलेक्शन में तो ऐसे ही होता है ना शतम प्रचार था जिस पे बीजेपी को एक बार थोड़ा बैकफुट पे आना पड़ा और डैमेज तो देखो ऐसा है कि जिन्होंने वोट देना है ना बीजेपी को वो तो मन बना के 5 साल से ही बैठे हुए हैं बंगाल में खास करके कि यार वोट देना है वह तो इससे प्रभावित नहीं होंगे लेकिन फिर भी थोड़े बहुत लोग गांव की महिलाएं कुछ और इस बातों में थोड़ा बहुत आ सकते हैं. बहुत डैमेजिंग था यह यह स्टेटमेंट जो है इस तरह का दूसरा स्टेटमेंट मैंने सुना. ममता दीदी ने दे दिया. उन्होंने कहा है कि सारी औरतों से मैं अपील करती हूं कि कोई अनजान आदमी अगर आपसे बैंक अकाउंट की डिटेल मांगे तो मत देना. ये केंद्र के एजेंट हैं या भाजपा के एजेंट हैं ये. क्योंकि लक्ष्मी भंडार जो योजना है महिला एंपावरमेंट उसमें मैंने जो पैसा डाला हुआ है वह सारा निकाल लेंगे उसमें से. अब क्या करूं अब? प्रचार हो जाता है, हो जाता है. दैट इज़ है. तो ऐसी-ऐसी प्रचार, ऐसी-ऐसी बातें चल रही हैं. अनसुनी कहानियां होती है ना जो तो बंगाल में ऐसी अनसुनी कहानियां आती हैं कि मछली बंद कर देंगे. जो महिला योजना है उसमें जो है वो पैसा शिफ्ट हो जाएगा. सो दिस इज ऑल. 

सवाल: ममता के निर्वाचन क्षेत्र भवानीपुर से उन्हें टक्कर देने वाले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष शुभेंदु अधिकारी की जीत की क्या संभावनाएं देखते हैं आप?

जवाब: जीत तो जाएंगे ऐसा लगता है लेकिन वही वाली बात है ना जीत जाने के अंदर. सामने ममता है. ऐसा भी हो सकता है कि वह जीत जाए और ममता चुनाव हार जाए. रूल आउट नहीं कर सकते. ममता अगर सरकार भी बना ले कई द ऐसा भी होता है आप खुद हार जाते हो एट टाइम्स जो है तो बड़ा जटिल सवाल है उस तरह से और क्या है कि बीजेपी का मनोबल भारी है कि एक बार वो हरा चुके हैं ममता को नंदी्राम में पहले जो है तो बीजेपी ने कैंडिडेट तो बहुत मजबूत निकाला है और जैसे कहना चाहिए कि घर के ही लोग थे उनके उनके साथ ही थे पहले तो ये जो है शुभेंदु अधिकारी दैट वे जो है तो बड़ा जटिल सवाल है अनुमान लगाना मुश्किल है कि क्या जीत के उनकी क्या संभाव संभावनाएं हैं. लेकिन राजनीति में कुछ भी हो सकता है. मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं इसका डेफिनेट जवाब क्या आपको दूं. तो मैं आपको यह कह सकता हूं कि नथिंग इज रूल्ड आउट. ये है अपेरेंटली जो मैंने आपसे कहा था कि भाजपा कोलकाता के एंट्री पॉइंट पे खड़ी है. अगर वही सिद्धांत हैं तो फिर ये जीतेंगे. ये नहीं जीतेंगे तो कौन जीतेगा?

फिर वहां पे कि स्ट्रांग कैंडिडेट हैं. तो लेट्स सी इवन आई हैव गॉन कंफ्यूज्ड. इस सारे घटनाक्रम का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सुेंदु अधिकारी जो है इस बार दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं. रिस्क नहीं ले रहे. उनकी आत्मा जानती है पिछला चुनाव जो है उन्होंने 1900 वोटों से जीता था. कैसे जीता सा ममता से जो है तो इस बार क्या है कि वो दो सीटों से लड़ रहे हैं ताकि अगर हार भी जाए वहां से तो दूसरी सीट से जीत जाए. क्योंकि भाजपा मानती है अगर उनका मुख्यमंत्री बना तो यह व्यक्ति उनका मुख्यमंत्री होगा. अगर सरकार वहां पे बनी तो उसको रिस्क नहीं करना चाहते जो है और उसका मनोबल बनाए रखने के लिए यह है कि दो सीट से लड़ा दो इसको. दो सीट से लड़ रहे हैं. तो यह जो संभावना है कि दो सीट से लड़ रहे हैं तो ममता की जीत की संभावनाएं बढ़ जाती है थोड़ा सा. वोटर भी देखता है एक तरह से कि यार वहां से जीत जाएगा. कोई बात नहीं यहां दीदी को जीता दो वो वहां से जीत जाएगा. यू नेवर नो. 

सवाल: सर आपके विचार में बंगाल में जो ये चुनाव हो रहा है उसमें बीजेपी वर्सेस ममता दीदी के बीच जो बेसिक चुनावी दर्शन शास्त्र का फर्क क्या देखते हैं आप?  

जवाब: बेसिक फर्क ये है कि बीजेपी जो चुनाव है दो आईडियोलॉजीस पे लड़ रही है. एक तो धर्म और एक राष्ट्रभक्ति. बेसिकली राष्ट्र प्रेम इस पे लड़ रही है और वो जो है ममता जो है वो बंगाल के अस्मिता का जो कार्ड है उसका वो और सांस्कृतिक पहचान वहां की जैसे मछली का उन्होंने शामिल किया कि हमारी सांस्कृतिक पहचान है. तो बेसिक डिफरेंस दोनों का ये है आइडियोलॉजिकल डिफरेंस इन दोनों के बीच में ये है कि वो तो धर्म और राष्ट्रवाद पे लड़ रहे हैं. यह बंगाल की अस्मिता की और बंगाल की संस्कृति की पहचान है. उस पे लड़ रही है. एक और महत्वपूर्ण घटना बंगाल चुनाव की पूर्व संध्या पे होने वाली है. एक तरह से 16 17 तारीख को विशेष सत्र लोकसभा का होने के आसार हैं. संसद का सत्र होने के आसार हैं महिला आरक्षण बिल को लेकर के. तो ऐसी संभावना है कि महिला आरक्षण बिल का जो टाइमिंग है और जिस तरह से बिल पास होगा एक बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन होगा. वुमेन वोटर्स में 33% आरक्षण की बात है. तो इसका जो लाभ है इन चुनाव में भाजपा को मिलेगा. ऐसा लोगों का मानना है. लेकिन एक प्रयास अच्छा है. चुनाव के बहाने ही से ही अगर महिलाओं को 33% आरक्षण मिलता है और वो कल्पना जो है बरसों की वो मूर्त रूप लेती है तो ये एक सुखद समाचार है. 

सवाल: राहुल गांधी का यह फैसला लेना कि वो अकेले चुनाव लड़ेंगे. उसको आप कैसे देखते हैं?

जवाब: अब देखो वैसा है कि इसके अलावा विकल्प भी नहीं था. ममता दीदी सपोर्ट नहीं कर रही. ममता दीदी कोई ऑफर नहीं कर रही आने के लिए. और लास्ट टाइम भी कहा था 2.94% वोट आया था. एक भी सीट नहीं मिली थी. जी और ममता दीदी खुद ही मानती है कि राहुल मतलब वो ऐसा मानती है मेरे ख्याल से जैसे अखिलेश यादव मानते हैं शायद कि भाई एक स्पेंड फोर्स है मतलब लायबिलिटी है कि एक धारणा बनी है ना कई कई राज्यों में इस तरह की यार कांग्रेस साथ लेंगे तो उल्टा हमारी लायबिलिटी हो जाती है दैट वे जो है तो ममता ने मनोहार नहीं की होगी जैसे कहना चाहिए उसने मनोहार नहीं की होगी और राहुल गांधी का तो एटीट्यूड है ही दैट वे कि ठीक है जब उधर से प्रॉपर ऑफर नहीं है सीट शेयरिंग नहीं है बात नहीं है तो क्यों करें दैट वे तो अकेले लड़ने का फैसला है तो फैसला तो कोई सुखद नहीं है दैट वे जो अकेले रह जाएंगे आप 2.4% ममता को नुकसान होगा थोड़ा 3% वोट जो भी है यह भी जुड़ जाता वहां पे दैट वाज़ है तो कांग्रेस प्रैक्टिकली हैज़ नो फ्यूचर इन बंगाल एट दिस मोमेंट राइट. 

सवाल: कांग्रेस ने एक बार फिर से पांच बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके लेकिन 2024 में लोकसभा का चुनाव हार चुके अधिरंजन चौधरी को विधानसभा का टिकट दिया है. क्या ममता दीदी इस बार उन्हें जीतने देंगी?

जवाब: डाउटफुल है. जैसा अभी तक देखा मैंने कि वो ममता दीदी सोच लेती हैं, सोच लेती हैं एक तरह से. तो, वह पहले तो यह हुआ था कि वह क्योंकि कांग्रेस लीडर हैं और वह नहीं चाहती हैं कांग्रेस मजबूत हो उस इलाके में जो है तो पांच बार वह एमपी कांग्रेस से पहले रह चुके हैं. छठी बार पिछली बार चुनाव हार गए. और उनको हराने के लिए ममता दीदी है ना युसुफ रात का क्रिकेट क्रिकेटर है. उसको लाई वहां पे सामने और 85,000 वोट से हार गया. रंजन जो है ये तो ऐसे रहा तो इस बार राहुल गांधी ने टिकट दिया कि चलो लड़ो. पिछली बार तो क्या उसके निर्वाचन क्षेत्र में बैठ गई थी. ममता जाकर हरा के आई उसको वहां से जिद जो है तो इस बार उसको डर है कि ममता फिर नहीं बैठ जाए कि फिर आने नहीं लग जाए मुझे जो है लेकिन ममता इसमें परेशान है घिरी हुई है कई मामलों में हो सकता है रंजन की तरफ ध्यान नहीं आए लेकिन रंजन की दूसरी चुनौती ये है ना कि वो ओबासी और हुमायूं कबीर का उनका गठबंधन हो गया दैट वे मुस्लिम है वो डैमेज करेंगे कोई ना कोई लेकिन फिर भी कुल मिला के ऐसा लगता है कि उसकी रेपुटेशन अच्छी है तो शायद वो जी जाएगा ऐसा लगता है लेट्स सी. 

सवाल: सर कुछ लोगों का मानना यह है कि इस बार का पश्चिम बंगाल का चुनाव सबसे ज्यादा हिंसक चुनाव होगा. आपका आकलन क्या कहता है?

जवाब: लगता तो ऐसे लेकिन मुझे व्यक्तिगत रूप से ऐसा नहीं लगता. इंडिया में कहते हैं ना सब यहां डंडा इलाज है. पुलिस हम सेना सेना की जरूरत नहीं. सेंट्रल फोर्सेस चुनाव आयोग को इसका अंदेशा था. तो उन्होंने 500 सेंट्रल फोर्स की कंपनियां मांगी है हम और यह कहा है कि पोस्टपोल वायलेंस का हमें अंदेशा है तो यह कंपनियां टिल फदर ऑर्डर्स वहीं रहेंगी. ओके और इतना डिप्लॉयमेंट होगा तो लगता नहीं है. लेकिन एक संभावना है ममता अगर चुनाव हार जाती है तो थोड़ी सी हिंसा दो चार दिन हो सकती है. नॉर्मली ऐसा होता है. लेकिन पुलिस का अंजाम काफी है और अमित शाह है फिर सामने जो है तो मुझे नहीं लगता बड़े पैमाने पे हिंसा वहां हो पाएगी.

सवाल: पश्चिम बंगाल में आरएसएस भी काफी एक्टिव है. 

जवाब: ऑफकोर्स आरएसएस तो भाजपा की आत्मा है ही. पैतृक संगठन है. 86,000 बूथ है वहां पे. तो एक साल से उन्होंने 86,000 अपने जो है मोहल्ला बैठकें कर ली है लोगों को. हर जगह प्रचारक लगा हुआ है. मोहल्ला बैठक में आदमी सामने होता है. पीछे प्रचारक खड़ा है वहां पे. तो आरएसएस का मैसिव रोल है इस बार वहां पे जो है तो लेट्स सी इसका 4 तारीख के रिजल्ट में क्या प्रभाव दिखाई देता है. लेकिन आरएसएस इस कंप्लीटली इनवॉल्वड इन वेस्ट बंगाल इलेक्शंस. 

सवाल: 2019 का जब चुनाव होता है तो उस दौरान में बीजेपी को 100 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिलती है. लेकिन उसी के 2 साल बाद सिर्फ 77 सीट पर सिमट जाती है. ऐसा क्यों?

जवाब: हो जाता है राजनीति में. कास्परेसी सरकमस्ट्ससेस 77 ही नहीं रहे. अब तो कहते हैं शायद 64 समथिंग ऐसे कुछ रह गए हैं. कुछ उपचुनाव हो गए. कुछ दल बदल के चले गए लोग इधर-उधर. दैट वे हो गया. लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है. एक तो ये ममता के लोग इसमें क्लेम करते हैं कि हमने पहले दावा किया था कि 100 से आगे नहीं जाने देंगे. तो 77 पे रह गए. वो तो खाली एक ऐसे ही जैसे कहते हैं ना अपन लोकल भाषा में फंड मारने वाली बात है. खाली ऐसे ही कि ठीक है. ये जो है उसका असर नहीं है. लेकिन दूसरा पहलू ये भी है कि 2016 में बीजेपी तीन सीट पे थी. उससे पहले के चुनाव पे इस बार 77 पे थी. जी. तो तुलना हम 100 77 100 = 77 करें वीजा या कि हम थ्री वीजा 77 करें. सो दिस इज़ एनकरेजिंग फॉर बीजेपी. 

सवाल: ममता बनर्जी ने आह्वान किया है महिला मतदाताओं से कि अगर आप जाते हैं वोट करने और उस क्यू में आपको जो केंद्र सुरक्षा बल है ज्यादा आपकी जांच पड़ताल करे तो आप लोग झाड़ू उठा लेना. फिर इसका क्या मतलब है? 

जवाब: इसका मतलब यह है कि एक एक आम औरत की भाषा है जैसे गली मोहल्ले में अपन कहते हैं दैट वे जो है कि कोई औरत आती है कहते हैं कोई औरत तेरे को छेड़े घर तो तू झाड़ू उठा लेना डंडा उठा लेना अपने जैसे बात है तो अभी प्रचार चल रहा है वहां पे कि जितनी मुस्लिम महिलाएं तो बुर्का भी उतार के बताना पड़ेगा ऐसा कुछ प्रचार चल रहा है इस तरह का सेंट्रल फोर्सेस कहेंगी बुर्का उतार के अंदर आओ या कुछ और चेक करेंगी तो कोई कई तो लोग इसमें नहीं कौन झगड़े में पड़े और वहां पे जाएंगी वोट डालने तो ममता दीदी उनको एक मतलब उकसा रही है एक तरह से कहना चाहिए इंस्पायर या यू कह रही है ऐसा कोई हो वहां पे तो औरतों का आम तौर पे ये माना जाता है ना कि झाड़ू है और एक बेलन है ऐसा कहा जाता है हथियार आजकल तो दूसरे हथियार आ गए हैं ना जिम वाले उसको छोड़ दो पुरानी बात कह रहा हूं जो है दैट कराटे आ गया और पता नहीं क्या-क्या आ गया है जो है तो कहा जाता है उसने कहा झाड़ू उठा लेना मतलब ये कि झाड़ू मार देना उठाने से और क्या होता है उठा के उसको लहराना थोड़ी है दैट तो अच्छा नहीं लगता इट डजंट सूट द स्टेटस ऑफ अ चीफ मिनिस्टर तो कह दिया उन्होंने जो है लेकिन अब यह बातें एक इशू तो है कि सेंट्रल फोर्सेस तो फरिश्त तो करेंगी आपको जब वोट डालने आप जाओगे वहां पे जो है तो कितने लोग हो सकता है उससे पीछे चले जाए नहीं चले जाएं बट लॉ ऑफ़ द लैंड हैज़ टू टेक इट्स कोर्स यू कांट हेल्प इट राइट. 

सवाल: क्या असम की तरह पुडुचेरी में भी एनडीए सरकार की पुनरावृति होगी अगर होगी तो नया मुख्यमंत्री कौन होगा? 

जवाब: मुख्यमंत्री रंगास्वामी चल रहे हैं मुझे लगता है मौजूदा हालात में तो वही रहेंगे कुछ ऐसा चेंज का है नहीं और पुनरावृति भी लगभग श्योर सी लग रही है अभी मतलब कोई कारण नहीं है ऐसा कि वहां सरकार नहीं बने फिर क्या जोड़तोड़ होता है सरकार में जो है और जोड़तोड़ में तो यू कांट मैच दिल्ली लीडरशिप जो है तो अकॉर्डिंग टू ऑल इंडिकेशंस जो है एनडीए इस गोइंग टू रिपीट इन ऐसा लगता है दैट वे जो है ना कि भ ऐसे आसार हैं जो है वही मैंने कहा इलेक्शन कमीशन गाइडलाइंस आए बात है ना कि ऐसा लगता है कि ऐसे आसार हैं कि दे आर अहेड. 

सवाल: जो 3 अप्रैल को प्रधानमंत्री  का पुडुचेरी में जो इतना जबरदस्त रोड शो हुआ तो मतलब मतलब एनडीए की सरकार वापसी कर रही है. आपको ऐसा लगता है इस शो से तो ऐसा ही लगता है. इस शो से ऐसा लगता है दैट वे कि आप देखिए पुडुचेरी प्राइम मिनिस्टर बार-बार तो जाते नहीं वहां पे जो है कुल मिला के शायद दो-तीन बार गए हैं. तो अब तो उन्होंने ये भी कह दिया कि बंगाल में मैं रोज तीन सभाएं करूंगा. आज से तीन सभाएं कर रहे हैं. जबरदस्त अमित शाह पहले ही कर रहे थे वो कैंप डाले हुए थे 15 दिन के लिए. वो जा रहे हैं. तो वो सर्टेन लगती है. वो रोड शो इतना जबरदस्त हुआ. इतने लोग उसमें थे टूट के पड़ रहे थे वहां पे. तो ये इंडिकेशन होते हैं कि सत्ता वापसी के किसी के जो है तो ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी का जो करिश्मा है जो चार्म है उनका जो है इट विल ब्रिंग बैक दिस गवर्नमेंट टू पावर ऐसा लगता है. 

जवाब: यहां पर विकास की अपार संभावना है और उसी को देखते हुए पीएम मोदी ने उसे टूरिस्ट हब के तौर पर एस्टैब्लिश करने की बात कही है. आप इस विज़न को कैसे देखते हैं?
उन्होंने दो बातें कही है. उन्होंने तो फार्मूला दिया है बेस्ट के नाम से. बिजनेस एजुकेशन और स्पिरिचुअल और टूरिज्म और वाकई में पांडचेरी टूरिस्ट टूरिस्ट बहुत जाता है आजकल आप देखिए दैट वे और क्या है आसान है चेन्नई गए और वहां से आगे निकल गए दो घंटे जो भी रास्ता वहां से जो है तो अपार संभावना है फिर उन्होंने कहा कि डबल इंजन सरकार है यहां की फिर अभी गए थे तो बहुत बड़ा पैकेज जो है पांडचेरी के लिए बनाया है तो वो सही है कि टूरिज्म की अपार संभावनाएं हैं. एक अच्छी स्टेट है. शासन ठीक चल रहा है. गुड गवर्नेंस चल रही है. तो इज़ राइट इन सेइंग कि ये टूरिज्म हब के रूप में और ज्यादा बड़ा सेंटर डेवलप हो सकता है.

सवाल: पुडुचेरी में कांग्रेस और डीएमके का अलायंस ऑलमोस्ट टूटते-टूटते बचा है. इसका क्या कारण है?

जवाब: ऐसे ही रहता है इनडिसाइसिव लीडरशिप इन दिल्ली. एंड वक्त पे फैसले करते नहीं है. लोग फैसलों का इंतजार करते रहते हैं स्टेट कैपिटल्स में. फिर बात टूटने लगती है. अलार्म होता है तो फिर कोई फैसला आता है. तो यही इसमें हुआ होगा. ऐसा मेरा अनुमान है. 30 सीटें हैं. फिर डिसाइड हो गया. 16 पे कांग्रेस लड़ेगी, 14 पे डीएमके लड़ेगा. अल्टीमेटली हो गया बाकी बेसिकली वही रहा होगा इनसेसिवनेस एट द लेवल ऑफ़ टॉप लीडरशिप इन दिल्ली लेकिन बच गए हो गया समझौता. 

सवाल: आज की तारीख में चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी के सामने चुनौतियां आप क्या देखते हैं और बीजेपी के विस्तार की कितनी संभावनाएं?

जवाब: सबसे बड़ी बात यह है कि अगर अपन इसको इस ढंग से देखें कि चुनौतियां क्या है तो चुनौती तो एक ही है कि जो नॉन फ्रेंडली टेरिटरी है केरल है, बंगाल है, तमिलनाडु उसमें कितना मेंटर हो पाते हैं. पार्टियां कितना विस्तार कर पाते हैं? सबसे चुनौती यही है. फ्रेंडली टेरिटरी है आसाम उसकी बात नहीं हो रही है या पांडचेरी की बात नहीं हो रही है. बात यह हो रही है कि जो नॉन फ्रेंडली जो टेरिटरी है उनमें कितना घुस पाते हैं, कितना पेनिट्रेट कर पाते हैं, कितने अपने एक्सेस कर पाते हैं और कितना विस्तार कर पाते हैं. ये चुनौती सबसे बड़ी है. 

सवाल: इन चार राज्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की चुनाव जीतने की रणनीति क्या है?

जवाब: नंबर वन उसमें यह है कि होल्ड आसाम. आसाम में सरकार बना के रखो. ठीक है? विन वेस्ट बंगाल बंगाल में विक्ट्री करो और साउथ में एक्सपंड करो. दैट मींस केरला एंड तमिलनाडु. हम यही है उनका प्रिंसिपल. ये स्ट्रेटजी है और यही गाइडलाइन है. 

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