अफगानिस्तान में टांग अड़ाने की कोशिश कर रहा था तुर्किये, तालिबान ने निकाल दी हेकड़ी, ये बात कहकर दिखाया आईना

मुजाहिद ने यह स्पष्ट किया कि भले ही तालिबान अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है, लेकिन आंतरिक राजनीतिक ढांचे में कोई विदेशी निर्देश या दखल स्वीकार्य नहीं होगा.

taliban reject Turkey intervention Afghanistan
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मुस्लिम दुनिया की अगुवाई करने का सपना देख रहे तुर्किये को अफगानिस्तान के मुद्दे पर बड़ा झटका लगा है. अफगानिस्तान में ‘समावेशी सरकार’ की मांग को लेकर तुर्किये ने जब एक बार फिर से वैश्विक मुस्लिम नेतृत्व की ओर कदम बढ़ाने की कोशिश की, तो तालिबान ने उसकी कोशिशों को न सिर्फ खारिज किया, बल्कि उसे उसकी 'हद' में रहने की दो-टूक सलाह भी दे दी.

तुर्किये का ‘दखल’ और तालिबान की ‘डपट’

हाल ही में तुर्किये की अगुवाई में तुर्किक देशों के संगठन (OTS) ने अफगानिस्तान में जातीय विविधता को ध्यान में रखते हुए समावेशी सरकार की मांग रखी थी. इसके साथ ही तुर्किक समुदाय के लिए एक विशेष दर्जे या राज्य की मांग भी उठाई गई. यह मांग तुर्किये, अज़रबैजान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और उज्बेकिस्तान की ओर से संयुक्त रूप से आई थी. लेकिन तालिबान को यह रास नहीं आया. तालिबान प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने साफ कहा, “हम अपने घरेलू मामलों में किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेंगे. निर्णय अफगानों का होगा, न कि बाहरी ताकतों का.”

क्या सोच रहा है तालिबान?

मुजाहिद ने यह स्पष्ट किया कि भले ही तालिबान अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है, लेकिन आंतरिक राजनीतिक ढांचे में कोई विदेशी निर्देश या दखल स्वीकार्य नहीं होगा. उन्होंने यह भी दोहराया कि अफगान जमीन किसी देश के खिलाफ इस्तेमाल नहीं की जाएगी — एक तरह से यह संदेश भी था कि अफगानिस्तान अब किसी की ‘सामरिक बिसात’ नहीं बनने वाला.

तुर्किये का मुस्लिम देशों में दखल

तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन पहले भी मुस्लिम दुनिया में अपनी 'नेतृत्वकारी भूमिका' निभाने की कोशिश करते रहे हैं. उन्होंने भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान का समर्थन किया. फिलिस्तीन-इजराइल विवाद में खुलकर इजराइल का विरोध किया. अब अफगानिस्तान में 'समावेशिता' की बात कर खुद को फिर से मुस्लिम वर्ल्ड का मसीहा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन, इस बार तालिबान ने स्पष्ट शब्दों में बता दिया कि अफगानिस्तान किसी की प्रयोगशाला नहीं है. 

अंतरराष्ट्रीय दबावों पहले भी किया खारिज

यह कोई पहली बार नहीं है जब तालिबान ने किसी बाहरी शक्ति की बात को ठुकराया हो. इससे पहले भी महिलाओं की भागीदारी, शिक्षा, और मानवाधिकारों जैसे मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, और यूरोपीय देशों की अपीलों को ठुकरा चुका है.

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