पाकिस्तान और अफगानिस्तान के तालिबान शासन के बीच बीते कुछ समय से चल रहा तनाव अब खुले टकराव और सैन्य झड़पों में बदल चुका है. खासकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) द्वारा की जा रही घुसपैठ और हमलों से पाकिस्तान बुरी तरह प्रभावित है. इसी क्रम में दोनों देशों के प्रतिनिधि 17 अक्टूबर को कतर की राजधानी दोहा में एक महत्वपूर्ण बैठक में आमने-सामने आ रहे हैं.
इस बैठक का उद्देश्य हालिया सीमा संघर्ष के बाद तनाव को कम करना, युद्धविराम को स्थायी बनाना, और आंतरिक सुरक्षा चिंताओं पर चर्चा करना है. यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब पाकिस्तान की सेना और सुरक्षा एजेंसियां लगातार TTP के हमलों से जूझ रही हैं, और अफगानिस्तान में छिपे उग्रवादी तत्वों को लेकर उसकी चिंता बढ़ती जा रही है.
दोहा में क्यों हो रही है यह बैठक?
दोहा लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और अफगान मुद्दों को लेकर एक अहम केंद्र बना हुआ है. इसी शहर में अफगान तालिबान और अमेरिका के बीच शांति समझौता हुआ था. अब यही स्थान पाकिस्तान और तालिबान के बीच तनाव कम करने के लिए चुना गया है.
बैठक में शामिल हो सकते हैं:
इस बैठक के पीछे तीसरे पक्ष की मध्यस्थता मानी जा रही है, जो यह संकेत देता है कि इस्लामाबाद और काबुल के रिश्ते कितने निचले स्तर पर पहुंच चुके हैं.
युद्धविराम के बाद बातचीत की जरूरत क्यों?
हाल ही में पाकिस्तान और तालिबान सैनिकों के बीच सीमा पर गोलीबारी हुई थी, जो लगभग 48 घंटे तक चली. यह झड़प इतनी गंभीर थी कि दोनों देशों की सेनाओं को सीमा चौकियों से हटकर युद्धविराम की घोषणा करनी पड़ी.
यह झड़प मुख्यतः TTP की बढ़ती गतिविधियों को लेकर थी, जिसे पाकिस्तान के अधिकारी अफगान धरती से संचालित मानते हैं. जबकि अफगान तालिबान इस बात से इनकार करते हैं कि वे TTP को पनाह दे रहे हैं.
पाकिस्तान की मुख्य चिंताएं क्या हैं?
TTP का आतंक: पाकिस्तान का आरोप है कि तालिबान शासन अफगानिस्तान में छिपे टीटीपी आतंकियों को न केवल शरण दे रहा है, बल्कि उनकी गतिविधियों को नजरअंदाज कर रहा है.
सीमा पार हमले: खासकर खैबर-पख्तूनख्वा और वजीरिस्तान जैसे इलाकों में लगातार हो रहे हमले पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों को परेशान कर रहे हैं.
तालिबान से ठोस कार्रवाई की मांग: पाकिस्तान चाहता है कि अफगान तालिबान TTP के खिलाफ सख्त कदम उठाए, उन्हें अफगान भूमि से निष्कासित करे या उन्हें काबू में लाए.
अफगान तालिबान की रणनीति
तालिबान सरकार इस बैठक को एक कूटनीतिक अवसर की तरह देख रही है. अफगानिस्तान की तालिबान सरकार अभी तक किसी भी देश द्वारा औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है. वह पाकिस्तान जैसी क्षेत्रीय शक्ति से राजनयिक स्वीकृति हासिल करने की दिशा में प्रयासरत है.
मुल्ला याकूब और उनका प्रतिनिधिमंडल इस बैठक का उपयोग अपनी राजनीतिक वैधता और संप्रभुता को स्थापित करने के लिए कर सकते हैं. उनका मकसद पाकिस्तान को यह दिखाना भी है कि तालिबान अब एक पूर्ण और स्वायत्त सरकार है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता.
बैठक में संभावित मुद्दे-
1. युद्धविराम का विस्तार
हाल ही में लागू किए गए युद्धविराम को स्थायी रूप देने पर चर्चा की उम्मीद है. पाकिस्तान चाहता है कि सीमा पार से गोलीबारी और घुसपैठ बंद हो.
2. TTP पर कार्रवाई की मांग
पाकिस्तान इस मंच का उपयोग अफगान तालिबान पर दबाव बनाने के लिए करेगा कि वह अपने क्षेत्र में छिपे टीटीपी के ठिकानों को खत्म करे.
3. आतंकवाद-रोधी सहयोग
पाकिस्तान किसी समझौते के तहत तालिबान सरकार से यह आश्वासन चाहता है कि वह आतंकवादी संगठनों को अपनी जमीन से ऑपरेट नहीं करने देगा.
4. कूटनीतिक मान्यता का दबाव
बदले में तालिबान इस बातचीत का उपयोग पाकिस्तान से अपनी अंतरराष्ट्रीय मान्यता की स्वीकृति के लिए कर सकता है.
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