T Dome Air Defence System: ताइवान ने अपनी सुरक्षा रणनीति को नए स्तर पर ले जाते हुए एक महत्वाकांक्षी और आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम बनाने की घोषणा की है, जिसका नाम T-Dome रखा गया है. यह सिस्टम दुश्मन की ओर से आने वाली मिसाइल और रॉकेट हमलों को हवा में ही नष्ट करने की क्षमता रखेगा. इसकी तुलना इज़रायल के प्रसिद्ध Iron Dome सिस्टम से की जा रही है, जिसने बीते वर्षों में हजारों रॉकेट्स को इंटरसेप्ट कर इज़रायल को हमलों से बचाया है.
ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने देश के नेशनल डे समारोह में इस प्रोजेक्ट की औपचारिक घोषणा की. उन्होंने कहा कि देश अब एक मल्टी-लेयर एयर डिफेंस सिस्टम तैयार करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ेगा, जो चीन की ओर से संभावित मिसाइल या हवाई हमले को रोकने में सक्षम होगा.
“T-Dome” क्या है?
T-Dome एक मल्टी-लेयर एयर डिफेंस वॉल होगी, जिसे ताइवान अपनी ज़मीन, समुद्र और हवाई सीमाओं की सुरक्षा के लिए विकसित कर रहा है. इसका उद्देश्य एक ऐसा इंटीग्रेटेड डिटेक्शन और इंटरसेप्शन नेटवर्क तैयार करना है, जो दुश्मन के विभिन्न दिशाओं से आने वाले हमलों को पहचान कर, उन्हें उड़ान में ही रोक सके.
राष्ट्रपति लाई ने अपने भाषण में कहा, “हम T-Dome को तेजी से विकसित करेंगे ताकि एक ऐसा मजबूत एयर डिफेंस नेटवर्क बन सके, जिसमें उन्नत सेंसर और हाई-एक्युरेसी इंटरसेप्टर्स की ताकत हो. हमारा लक्ष्य है, दुश्मन को ताइवान की सीमाओं को पार करने का साहस भी न हो.”
GDP का बड़ा हिस्सा अब डिफेंस में जाएगा
रक्षा रणनीति को मज़बूत करने के लिए ताइवान ने अपने सालाना रक्षा खर्च में बढ़ोतरी करने का फैसला लिया है. अभी यह देश के GDP का लगभग 3% है, जिसे साल 2030 तक 5% तक ले जाने की योजना है.
नई योजनाओं में खासतौर पर हाई-टेक टेक्नोलॉजी, AI आधारित निगरानी प्रणाली, और स्मार्ट इंटरसेप्शन सिस्टम पर निवेश किया जाएगा. यह सब मिलकर एक स्मार्ट डिफेंस नेटवर्क बनाएंगे जो पारंपरिक और आधुनिक युद्ध दोनों से मुकाबले में सक्षम होगा.
इज़रायल के Iron Dome जैसा सिस्टम
T-Dome को दुनिया में पहले से मौजूद सबसे सफल एयर डिफेंस सिस्टम, इज़रायल के Iron Dome की तर्ज पर विकसित किया जा रहा है, लेकिन एशिया के भूगोल और सुरक्षा परिदृश्य को ध्यान में रखकर इसमें विशेष बदलाव किए जाएंगे.
Iron Dome आमतौर पर 4 से 70 किमी के दायरे में आने वाले रॉकेट्स को इंटरसेप्ट करता है. यह अपने एडवांस रडार से पहले इनकमिंग मिसाइल की दिशा और इंपैक्ट पॉइंट का आकलन करता है और तभी इंटरसेप्ट करता है जब वह आबादी वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ रही हो. इसी तरह, ताइवान का T-Dome भी अत्याधुनिक रडार और कंप्यूटिंग सिस्टम्स से लैस होगा, जो समुद्र और आकाश से आने वाले ख़तरों को समय रहते पहचान कर निष्क्रिय करेगा.
T-Dome अभी एक लंबी यात्रा
हालांकि इस योजना की घोषणा भले ही बड़ी हो, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रोजेक्ट को साकार करने में अभी वक्त लगेगा. ताइवान की नेशनल चेंग कुंग यूनिवर्सिटी में रक्षा विश्लेषक प्रोफेसर हंग-जन वांग का मानना है, “यदि T-Dome को वास्तव में इज़रायली Iron Dome के स्तर का बनाना है, तो इसकी लागत बहुत भारी होगी. इसके लिए न केवल तकनीकी संसाधन चाहिए, बल्कि लंबा समय और राजनीतिक स्थिरता भी जरूरी होगी.”
डेनिस वेंग, अमेरिका की सैम ह्यूस्टन स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर के अनुसार, “T-Dome का निर्माण राष्ट्रपति लाई के मौजूदा कार्यकाल में पूरा हो पाना मुश्किल है. यह घोषणा रणनीतिक स्तर पर चीन को संदेश देने और अमेरिका जैसे सहयोगी देशों को संकेत देने के लिए की गई है.”
अमेरिका का सहयोग और समानांतर प्रणाली
उल्लेखनीय है कि अमेरिका भी एक और अधिक उन्नत एयर डिफेंस प्रोग्राम पर काम कर रहा है, जिसे Golden Dome नाम दिया गया है. यह सिस्टम अंतरिक्ष में उड़ती मिसाइलों तक को इंटरसेप्ट करने की क्षमता रखेगा. रिपोर्ट्स के अनुसार, इसकी अनुमानित लागत करीब 175 अरब डॉलर हो सकती है.
ताइवान इस प्रकार के सहयोग से अपने सुरक्षा ढांचे को मजबूती देने की कोशिश कर रहा है और अमेरिका के साथ रक्षा साझेदारी को और गहरा करने में जुटा है.
तीखी आलोचना और चेतावनी
T-Dome योजना की घोषणा के बाद बीजिंग ने कड़ा विरोध दर्ज किया है. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि, “ताइवान के राष्ट्रपति का भाषण झूठ और भ्रामक सूचनाओं से भरा है. यह इतिहास और वैश्विक सहमति की अवहेलना करता है. ताइवान की आज़ादी को बढ़ावा देने वाली ये रणनीतियां भड़काऊ हैं.”
चीन ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि ताइवान अपनी रक्षा क्षमताएं बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो चीन जवाबी कार्रवाई करने का पूरा अधिकार रखता है. बीजिंग पहले ही ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और समय-समय पर बल प्रयोग की संभावना भी जताता रहा है.
चीन की सैन्य हरकतों से चिंता
बीते महीनों में चीन की सेना ने ताइवान के आसपास भारी सैन्य अभ्यास किए हैं, जिनमें नौसैनिक घेराबंदी, हवाई गश्त और मिसाइल तैनाती शामिल हैं. ताइवान के रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक चीन अब हाइब्रिड वॉरफेयर की रणनीति अपना रहा है, जिसमें साइबर अटैक, फेक न्यूज, ग्रे जोन हरासमेंट और आर्थिक दबाव प्रमुख हथियार हैं. अमेरिकी इंडो-पैसिफिक कमांडर एडमिरल सैमुअल पापारो ने हाल ही में कहा था कि चीन की ये गतिविधियां महज अभ्यास नहीं, बल्कि युद्ध की तैयारी हैं.
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