सुप्रीम कोर्ट का दीपावली से पहले पटाखों पर पूर्ण बैन से इनकार, ग्रीन क्रैकर्स को शर्तों के साथ मंजूरी

Fire Cracker ban in delhi NCR: जस्टिस बीआर. गवई और जस्टिस विनोद चंद्रन की पीठ ने शुक्रवार को इस मुद्दे पर हुई सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि पूरी तरह से पटाखों पर बैन लगाना एक व्यवहारिक समाधान नहीं है.

Supreme Court refuses to impose a blanket ban on firecrackers before Diwali
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Fire Cracker ban in delhi NCR: जस्टिस बीआर. गवई और जस्टिस विनोद चंद्रन की पीठ ने शुक्रवार को इस मुद्दे पर हुई सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि पूरी तरह से पटाखों पर बैन लगाना एक व्यवहारिक समाधान नहीं है. अदालत ने कहा कि जब भी पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाता है, तब "पटाखा माफिया" सक्रिय हो जाता है और बाज़ार में गैरकानूनी पटाखों की आपूर्ति बढ़ जाती है.

कोर्ट का मानना है कि यह न केवल वायु गुणवत्ता को और बिगाड़ता है, बल्कि कानून व्यवस्था और निगरानी व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन जाता है. कोर्ट ने कहा, “हमें माफिया से भी सावधान रहना होगा, जो प्रतिबंध के बाद अधिक सक्रिय हो जाते हैं."

पटाखा निर्माता बनाम नागरिक अधिकार

इस सुनवाई में पटाखा निर्माताओं और विक्रेताओं की आजीविका और आम नागरिकों के स्वच्छ हवा में सांस लेने के अधिकार, दोनों के बीच संतुलन साधने की कोशिश दिखाई दी. चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की "अगर निर्माण तय मानकों के अनुसार हो रहा है, तो इसमें क्या समस्या है? ज़रूरी यह है कि जो बनाया जा रहा है, वह नियमों के अनुरूप हो."

इस दौरान कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि पिछले प्रतिबंधों के बावजूद अवैध और खतरनाक सामग्री का इस्तेमाल होता रहा है. ऐसी परिस्थितियों में निर्माताओं के लाइसेंस रद्द करने की कार्यवाही का सुझाव भी सामने आया.

केंद्र और राज्यों को 10 दिन में समाधान पेश करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय (MoEF) को आदेश दिया कि वह सभी पक्षों, दिल्ली सरकार, पटाखा निर्माता, विक्रेता, और अन्य राज्यों से चर्चा करके एक व्यवहारिक और संतुलित समाधान तैयार करे और 10 दिन के भीतर अदालत में प्रस्तुत करे.

ग्रीन क्रैकर्स की सीमित अनुमति

फिलहाल अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि ग्रीन क्रैकर्स के निर्माण की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन उनका निर्माण और बिक्री केवल तभी होगी जब वे NEERI (नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट) और PESO (पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन) द्वारा तय मानकों का पालन करें, दिल्ली-एनसीआर जैसे प्रदूषण प्रभावित क्षेत्रों में बिक्री पूरी तरह से प्रतिबंधित रहेगी. इसके साथ ही निर्माताओं को हलफनामा देकर यह आश्वासन देना होगा कि वे प्रतिबंधित क्षेत्रों में कोई आपूर्ति नहीं करेंगे.

ग्रीन क्रैकर्स की निगरानी को लेकर उठे सवाल

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील अपराजिता सिंह ने अदालत से मांग की कि पूरा प्रतिबंध लागू किया जाए, यह कहते हुए कि वर्तमान में कोई प्रभावी निगरानी तंत्र मौजूद नहीं है. उन्होंने कहा कि NEERI केवल एक बार उत्पाद का परीक्षण करता है, लेकिन बाजार में बिकने वाले उत्पादों की कोई निगरानी नहीं होती.

उन्होंने ग्रीन क्रैकर्स की पहचान के लिए QR कोड सिस्टम लागू करने का सुझाव भी दिया, ताकि प्रामाणिक और फर्जी उत्पादों में अंतर किया जा सके. लेकिन जस्टिस विनोद चंद्रन ने चेताया कि सिर्फ एक सैंपल टेस्टिंग से यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि जो नमूना NEERI को भेजा गया है, वही उत्पाद असल में बाजार में बिक रहा है.

CAQM और अन्य सुझाव

CAQM (Commission for Air Quality Management) ने अदालत से आग्रह किया कि केवल उन्हीं उत्पादों को मंजूरी दी जाए जो परीक्षण में मानकों पर खरे उतरें. वकील बलबीर सिंह ने सुझाव दिया कि जो उत्पाद मानकों पर खरे नहीं उतरते, उन्हें "नॉन-ग्रीन" घोषित कर दिया जाए, ताकि उनकी बिक्री पर सख्ती से रोक लग सके.

कौन चाहता है प्रतिबंध हटाना?

सुनवाई के दौरान सीनियर वकील परमेश्वर ने पटाखों के निर्माण पर से प्रतिबंध हटाने की वकालत की. वहीं, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार ने कभी पूर्ण प्रतिबंध का सुझाव नहीं दिया, बल्कि हमेशा मानकों पर आधारित निर्माण को प्राथमिकता दी है.

अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को

अदालत ने सभी पक्षों को अपनी स्थिति स्पष्ट करने और व्यावहारिक समाधान पेश करने के लिए अगली तारीख 8 अक्टूबर 2025 तय की है. इस दौरान कोर्ट यह मूल्यांकन करेगी कि क्या कोई संतुलित नीति बनाई जा सकती है जो प्रदूषण को नियंत्रित करे और लाखों मजदूरों की आजीविका पर असर न डाले.

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