पराली जलाई तो भुगतना होगा खामियाजा, 15 महीने तक ‘रेड कैटेगरी’ में रहेगा खेत, जानें सरकार का नया प्लान

दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान प्रदूषण बढ़ने की बड़ी वजहों में पराली जलाना भी शामिल है. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में खेतों में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने अब नए नियमों का प्रस्ताव रखा है.

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दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान प्रदूषण बढ़ने की बड़ी वजहों में पराली जलाना भी शामिल है. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में खेतों में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने अब नए नियमों का प्रस्ताव रखा है. मंत्रालय ने बुधवार को ड्राफ्ट नियम जारी करते हुए पराली जलाने वाले खेतों को एक तय अवधि तक ‘रेड कैटेगरी’ में रखने का प्रावधान किया है.

पराली जली तो 15 महीने तक रेड कैटेगरी

प्रस्तावित नियमों के मुताबिक, जिस खेत में पराली जलाने की घटना सामने आएगी, उसे घटना की तारीख से 15 महीने तक ‘रेड कैटेगरी’ में रखा जाएगा. हालांकि, इस कैटेगरी में शामिल किए जाने के बाद जमीन के मालिक या किसान पर किस तरह के अतिरिक्त प्रतिबंध लागू होंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं किया गया है. अगर उसी जमीन पर दोबारा पराली जलाने की घटना सामने आती है या लगाया गया पर्यावरण जुर्माना तय समय पर जमा नहीं किया जाता है, तो ‘रेड एंट्री’ अगले 15 महीनों के लिए भी जारी रहेगी.

जमीन के हिसाब से लगेगा जुर्माना

ड्राफ्ट में पराली जलाने पर लगने वाले पर्यावरण जुर्माने की मौजूदा दरों को ही बरकरार रखा गया है. इसके तहत 2 एकड़ से कम जमीन पर पराली जलाने पर 5,000 रुपये, 2 से 5 एकड़ जमीन पर 10,000 रुपये और 5 एकड़ से ज्यादा जमीन पर 30,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा. यानी जुर्माने की रकम सीधे जमीन के आकार से जुड़ी होगी और बड़ी जोत वाले किसानों पर अधिक आर्थिक दंड लगाया जाएगा.

जुर्माने की रकम से बढ़ावा मिलेगा फसल विविधीकरण

सरकार ने प्रस्तावित नियमों में पर्यावरण जुर्माने से जमा होने वाली राशि के इस्तेमाल को लेकर भी प्रावधान किया है. इस रकम का उपयोग फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने, बायोमास के उपयोग और उसके स्टोरेज से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के साथ फसल अवशेष प्रबंधन में रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए किया जा सकेगा. फिलहाल ड्राफ्ट नियमों पर संबंधित पक्षों से 60 दिनों के भीतर सुझाव मांगे गए हैं. इसके बाद सरकार आगे की प्रक्रिया पूरी कर इन्हें कानून का रूप देने की दिशा में बढ़ सकती है.

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