Toilet Phone Scrolling Health Risk: क्या आप उन लोगों में से हैं जो टॉयलेट में जाते समय स्मार्टफोन साथ ले जाना नहीं भूलते? न्यूज पढ़ना हो, सोशल मीडिया स्क्रॉल करना हो, या दोस्तों से चैट, टॉयलेट में फोन का इस्तेमाल आज की पीढ़ी की आम आदत बन चुकी है. लेकिन सावधान. 2025 में प्रकाशित एक नई स्टडी के मुताबिक, यह आदत आपके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकती है. शोध में पाया गया कि टॉयलेट में स्मार्टफोन का इस्तेमाल बवासीर (पाइल्स) का खतरा 46% तक बढ़ा सकता है. आखिर फोन स्क्रॉल करने और बवासीर का क्या संबंध है? आइए, इस स्टडी के नतीजों और इसके पीछे के विज्ञान को आसान भाषा में समझते हैं.
बवासीर क्या है और क्यों होती है?
बवासीर, जिसे आमतौर पर पाइल्स कहा जाता है, गुदा या मलाशय के आसपास की नसों में सूजन की स्थिति है. हर स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में ये नसें मौजूद होती हैं, जो मल त्याग को नियंत्रित करने में मदद करती हैं. लेकिन जब इनमें सूजन आती है, तो यह दर्द, खुजली, रक्तस्राव या गांठ जैसी समस्याएं पैदा कर सकती हैं. बवासीर आंतरिक (गुदा के अंदर) या बाहरी (गुदा के बाहर) हो सकती है. इसके प्रमुख कारणों में उम्र (45 वर्ष से अधिक), गर्भावस्था, मोटापा, कब्ज, दस्त, भारी वजन उठाना और टॉयलेट में लंबा समय बिताना शामिल हैं. यह स्थिति अमेरिका में हर साल करीब 40 लाख लोगों को डॉक्टर के पास पहुंचाती है और स्वास्थ्य सेवाओं पर 800 मिलियन डॉलर से अधिक खर्च करवाती है.
टॉयलेट में स्मार्टफोन और बवासीर का कनेक्शन
लंबे समय तक बैठना सामान्य रूप से बवासीर का कारण नहीं माना जाता, लेकिन टॉयलेट सीट पर ज्यादा देर बैठना इस जोखिम को बढ़ाता है. टॉयलेट सीट पर बैठने से पेल्विक फ्लोर, जो मूत्राशय, आंत और महिलाओं में गर्भाशय को सहारा देता है, पर दबाव पड़ता है. यह दबाव गुदा क्षेत्र में रक्त को जमा होने देता है, जिससे नसें सूज सकती हैं. स्मार्टफोन का इस्तेमाल इस समय को और बढ़ा देता है, क्योंकि लोग स्क्रॉल करते हुए समय का ध्यान ही नहीं रख पाते. स्टडी में पाया गया कि स्मार्टफोन यूजर्स टॉयलेट में औसतन ज्यादा समय बिताते हैं, जिससे बवासीर का खतरा बढ़ जाता है.
स्टडी में क्या हुआ और किस पर हुआ शोध?
यह अध्ययन अमेरिका के बेथ इजराइल डेकोनेस मेडिकल सेंटर में 125 वयस्कों (45 वर्ष और उससे अधिक उम्र) पर किया गया, जो कोलोनोस्कोपी कराने आए थे. कोलोनोस्कोपी एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें मलाशय और बड़ी आंत की जांच के लिए कैमरे वाली ट्यूब का इस्तेमाल होता है. शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों से उनकी टॉयलेट आदतों, स्मार्टफोन के उपयोग, फाइबर सेवन, शारीरिक गतिविधि और मल त्याग के दौरान तनाव के बारे में सवाल पूछे. कोलोनोस्कोपी के दौरान दो विशेषज्ञों ने बवासीर की मौजूदगी की पुष्टि की. इस अध्ययन को 3 सितंबर 2025 को PLOS One जर्नल में प्रकाशित किया गया.
स्टडी के चौंकाने वाले नतीजे
शोध में पाया गया कि 66% प्रतिभागियों ने टॉयलेट में स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने की बात स्वीकारी. इनमें से 54.3% लोग न्यूज पढ़ते थे, जबकि 44.4% सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते थे. स्मार्टफोन यूजर्स में से 37.3% लोग टॉयलेट में 5 मिनट से ज्यादा समय बिताते थे, जबकि गैर-उपयोगकर्ताओं में यह आंकड़ा सिर्फ 7.1% था. सबसे महत्वपूर्ण बात, स्मार्टफोन का उपयोग करने वालों में बवासीर का खतरा 46% अधिक था, भले ही उम्र, लिंग, बीएमआई, व्यायाम और फाइबर सेवन जैसे कारकों को ध्यान में रखा गया. दिलचस्प बात यह थी कि मल त्याग के दौरान जोर लगाने (स्ट्रेनिंग) का बवासीर से कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया.
बवासीर से बचने के लिए क्या करें?
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि टॉयलेट में स्मार्टफोन का उपयोग बंद करना बवासीर के जोखिम को कम करने का सबसे आसान तरीका है. डॉ. तृषा पासरिचा, इस स्टडी की वरिष्ठ लेखिका, कहती हैं, “स्मार्टफोन की स्क्रॉलिंग में समय का पता ही नहीं चलता, क्योंकि ऐप्स इसी तरह डिजाइन किए गए हैं. टॉयलेट में 5 मिनट से ज्यादा समय बिताने से बचें.” इसके अलावा, कुछ अन्य उपाय हैं:फाइबर युक्त भोजन: रोजाना 25-30 ग्राम फाइबर (जैसे फल, सब्जियां, साबुत अनाज) खाएं.
हाइड्रेशन: खूब पानी पिएं ताकि मल नरम रहे और कब्ज न हो.
सीमित समय: टॉयलेट में 3-5 मिनट से ज्यादा न बैठें. अगर जरूरत हो तो टाइमर सेट करें.
व्यायाम: नियमित शारीरिक गतिविधि पेल्विक क्षेत्र में रक्त प्रवाह को बेहतर बनाती है.
क्यों है यह स्टडी खास?
यह पहला ऐसा अध्ययन है, जिसने टॉयलेट में स्मार्टफोन उपयोग और बवासीर के बीच संबंध को वैज्ञानिक रूप से जांचा. हालांकि यह 45 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों पर केंद्रित था, शोधकर्ताओं का मानना है कि यह नतीजे युवाओं पर भी लागू हो सकते हैं, क्योंकि वे स्मार्टफोन का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. हालांकि, स्टडी की कुछ सीमाएं हैं, जैसे छोटा सैंपल साइज और स्व-रिपोर्टेड डेटा पर निर्भरता. फिर भी, यह हमारे रोजमर्रा के डिजिटल व्यवहार और स्वास्थ्य पर इसके प्रभावों पर सोचने का मौका देती है.
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