मिडिल ईस्ट में सऊदी अरब खेल रहा डबल गेम! सबके सामने ईरान के साथ, लेकिन अमेरिका के साथ भी कर रहा ये प्लानिंग

Saudi Arabia-Iran Relations: मध्य पूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अब चरम सीमा पर पहुँच चुका है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान को चेतावनी दे रहे हैं कि अगर वे अमेरिकी हितों पर हमला करने की कोशिश करेंगे, तो इसके परिणाम गंभीर होंगे.

Saudi Arabia Middle East Supporting Iran in front of everyone but is also planning with America
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Saudi Arabia-Iran Relations: मध्य पूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अब चरम सीमा पर पहुँच चुका है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान को चेतावनी दे रहे हैं कि अगर वे अमेरिकी हितों पर हमला करने की कोशिश करेंगे, तो इसके परिणाम गंभीर होंगे. इसी के साथ खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य बलों की बड़ी तैनाती की खबरें सामने आई हैं, जो इस क्षेत्र में संभावित टकराव के खतरे को और बढ़ा रही हैं.

इस बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब की भूमिका पर भी कड़ा ध्यान दिया जा रहा है. एक ओर रियाद सार्वजनिक रूप से ईरान की संप्रभुता का सम्मान करने और कूटनीतिक समाधान खोजने की बात करता दिख रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ संकेत यह भी दे रहे हैं कि बंद कमरों में सऊदी नेतृत्व अमेरिका को ईरान पर कड़ा रुख अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है.

वॉशिंगटन में सऊदी नीति में बदलाव

अमेरिकी वेबसाइट Axios की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान (KBS) ने हाल ही में वॉशिंगटन में एक निजी ब्रीफिंग में अमेरिकी अधिकारियों को बताया कि अगर राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के खिलाफ अपनी धमकियों पर अमल नहीं करेंगे, तो ईरान और अधिक सशक्त होकर उभरेगा. बैठक में मौजूद चार सूत्रों ने यह जानकारी दी है कि KBS का मानना था कि सैन्य कार्रवाई में देरी से ईरान को और निडर बनाने का खतरा है.

यह दृष्टिकोण सऊदी अरब की सार्वजनिक नीति से बिलकुल अलग है. खुले मंचों पर सऊदी नेतृत्व लगातार क्षेत्रीय तनाव बढ़ने के खतरों की चेतावनी देता रहा है और सैन्य संघर्ष से बचने की अपील करता आया है.

तीन हफ्ते में सऊदी रुख में अचानक बदलाव

दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ तीन हफ्ते पहले सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने खुद राष्ट्रपति ट्रंप से आग्रह किया था कि वे ईरान पर हमला न करें. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, उस समय ट्रंप ने तत्काल सैन्य कार्रवाई को टाल दिया था.

अब सवाल यह उठता है कि सऊदी अरब का रुख इतनी जल्दी क्यों बदल गया. अमेरिकी सूत्रों का मानना है कि रियाद ने महसूस किया कि ट्रंप प्रशासन पहले ही ईरान पर हमले के मूड में है. ऐसे में सऊदी नेतृत्व खुले तौर पर विरोध करके खुद को किसी संभावित खतरे में नहीं डालना चाहता और इसलिए उनकी नीतियों में तेज बदलाव देखा जा रहा है.

सार्वजनिक बयान और पर्दे के पीछे की वास्तविकता

इसी सप्ताह MBS ने ईरान के राष्ट्रपति से फोन पर बातचीत में कहा कि सऊदी अरब अमेरिका को अपने हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करके ईरान पर हमला करने की अनुमति नहीं देगा. आधिकारिक बयान में भी सऊदी सरकार ने ईरान की संप्रभुता का सम्मान करने और कूटनीतिक समाधान खोजने की बात दोहराई.

लेकिन पर्दे के पीछे हालात अलग हैं. रिपोर्ट के अनुसार, शुक्रवार को KBS ने मिडिल ईस्ट मामलों के विशेषज्ञों और यहूदी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ लगभग एक घंटे लंबी बैठक में कहा कि अब ट्रंप को सैन्य कार्रवाई करनी ही पड़ेगी. साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि क्षेत्रीय युद्ध के खतरे को कम करने की रणनीति पर ध्यान देना आवश्यक है.

पैट्रियट मिसाइल डील और सैन्य तैयारियाँ

इस बीच अमेरिका ने सऊदी अरब को लगभग 9 अरब डॉलर की पैट्रियट एडवांस्ड कैपेबिलिटी-3 (PAC-3) मिसाइलें और संबंधित उपकरण बेचने की मंजूरी दी है. पेंटागन का कहना है कि इस सौदे से सऊदी अरब की एयर और मिसाइल रक्षा क्षमताओं को मजबूत किया जाएगा.

राजनीतिक विश्लेषक इस सौदे को केवल हथियारों की बिक्री के रूप में नहीं देखते. उनका कहना है कि यह कदम संभावित ईरानी जवाबी कार्रवाई से निपटने की तैयारी का संकेत भी है. इस प्रकार, सऊदी अरब और अमेरिका के बीच इस तनावपूर्ण दौर में सहयोग और रणनीतिक चालों का जटिल मिश्रण देखने को मिल रहा है.

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