Sapt Shakti: स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित किया. अपने भाषण में उन्होंने भारत के पुराने इतिहास और भविष्य की विकास यात्रा को जोड़ते हुए ‘सप्त सिंधु’ का खास जिक्र किया. भारत की आजादी की 80वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री ने ‘सप्त शक्ति’ की बात भी रखी.
उन्होंने कहा कि जिस तरह प्राचीन समय में सात नदियों ने भारत की सभ्यता को मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभाई, उसी तरह आज देश को आगे बढ़ाने के लिए सात बड़ी शक्तियों को साथ लेकर चलना जरूरी है. प्रधानमंत्री के मुताबिक, इन सात शक्तियों का मजबूत प्रवाह भारत को आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक और सामरिक रूप से और मजबूत बना सकता है.
क्या होता है ‘सप्त सिंधु’?
‘सप्त सिंधु’ का मतलब सात नदियों की भूमि से है. प्राचीन समय में जिन इलाकों से सात प्रमुख नदियां बहती थीं, उन्हें सप्त सिंधु क्षेत्र कहा जाता था. यह क्षेत्र सिर्फ नदियों की वजह से खास नहीं था. यहां खेती, व्यापार और मानव बस्तियों का भी तेजी से विकास हुआ. नदियों से मिलने वाले पानी ने जमीन को उपजाऊ बनाया और लोगों के जीवन को आसान किया.
इन नदियों के किनारे लोगों ने बस्तियां बसाईं. खेती के साथ व्यापार बढ़ा और अलग-अलग इलाकों के बीच संपर्क भी मजबूत हुआ. इसी वजह से सप्त सिंधु क्षेत्र को भारतीय सभ्यता के शुरुआती महत्वपूर्ण केंद्रों में गिना जाता है.
प्रधानमंत्री मोदी ने इसी इतिहास को आज के भारत से जोड़ते हुए कहा कि जिस तरह सात नदियों के प्रवाह ने प्राचीन भारत को समृद्ध बनाया, उसी तरह आज सात नई शक्तियों को एक साथ आगे बढ़ाकर भारत को दुनिया में नई ऊंचाई दी जा सकती है.
ऋग्वेद में भी मिलता है सप्त सिंधु का जिक्र
सप्त सिंधु का उल्लेख भारत के प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में भी मिलता है. ऋग्वेद के नदी सूक्त में कई नदियों का वर्णन किया गया है. वैदिक काल के इतिहास को समझने में इस क्षेत्र को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है.
इन नदियों के आसपास प्राचीन समय में लोगों की बस्तियां और खेती के क्षेत्र विकसित हुए. माना जाता है कि इस इलाके ने वैदिक संस्कृति के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
नदियों के किनारे ज्ञान और विचारों का आदान-प्रदान भी होता था. इसलिए सप्त सिंधु को केवल प्राकृतिक संसाधनों वाला इलाका नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय जीवन और संस्कृति के विकास से जुड़ा क्षेत्र भी माना जाता है.
ये हैं सप्त सिंधु की सात नदियां
प्राचीन ग्रंथों में सप्त सिंधु से जुड़ी सात नदियों का अलग-अलग नामों से उल्लेख मिलता है. इनमें सिंधु सबसे प्रमुख नदी मानी जाती है. वितस्ता को आज झेलम के नाम से जाना जाता है. इसी तरह असिकनी की पहचान चिनाब से और परुष्णी की पहचान रावी नदी से की जाती है.
विपाशा को वर्तमान में ब्यास कहा जाता है, जबकि शुतुद्री को सतलुज के नाम से जाना जाता है. सप्त सिंधु से जुड़ी सातवीं नदी सरस्वती मानी जाती है, जिसका प्राचीन भारतीय परंपरा में खास महत्व रहा है.
इन नदियों ने जिस बड़े क्षेत्र को पानी दिया, वहां खेती और मानव जीवन के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनीं. इसी वजह से उत्तर-पश्चिम भारत का यह इलाका प्राचीन सभ्यताओं के विकास का अहम केंद्र बना.
नदियों ने बदल दी प्राचीन भारत की तस्वीर
प्राचीन समय में नदियां केवल पानी का साधन नहीं थीं. उनके आसपास खेती होती थी, बस्तियां बसती थीं और व्यापार के रास्ते विकसित होते थे. नदियों से मिलने वाले पानी के कारण जमीन उपजाऊ रहती थी. इससे अनाज का उत्पादन बढ़ा और लोगों को स्थायी जीवन जीने में मदद मिली. धीरे-धीरे इन इलाकों में सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां भी बढ़ती गईं.
इसी वजह से सिंधु क्षेत्र और उसके आसपास की सभ्यताओं को भारत के प्राचीन इतिहास में खास स्थान दिया जाता है. नदियों के इस योगदान ने मानव जीवन और सभ्यता को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई.
प्राचीन सप्त सिंधु से आधुनिक सप्त शक्ति तक
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में ‘सप्त सिंधु’ को सिर्फ इतिहास की बात तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने इसे आज के भारत के विकास से जोड़ते हुए ‘सप्त शक्ति’ का विचार सामने रखा. उनका संदेश यह है कि जिस तरह सात नदियों का प्रवाह मिलकर प्राचीन भारत को मजबूत बनाता था, उसी तरह आज देश की अलग-अलग ताकतों को एक साथ आगे बढ़ाने की जरूरत है.
भारत को आर्थिक विकास, तकनीक, सुरक्षा, सामाजिक प्रगति और दूसरे क्षेत्रों में मजबूत बनाकर दुनिया में नई भूमिका हासिल की जा सकती है. प्रधानमंत्री ने इसी सोच को ‘सप्त शक्ति’ के विचार के रूप में देश के सामने रखा.
इस तरह लाल किले से दिया गया ‘सप्त सिंधु’ का संदेश भारत के पुराने इतिहास और भविष्य के विकास के बीच एक कड़ी के रूप में सामने आया. प्राचीन नदियों की कहानी के जरिए प्रधानमंत्री ने यह समझाने की कोशिश की कि भारत की ताकत हमेशा से उसके अलग-अलग संसाधनों और शक्तियों को एक साथ लेकर चलने में रही है.
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