नई दिल्ली: पाकिस्तान लंबे समय से अपनी परमाणु ताकत को भारत के खिलाफ बड़ी ढाल के तौर पर पेश करता रहा है. उसका दावा रहा है कि परमाणु हथियारों की वजह से भारत उसके खिलाफ बड़ी सैन्य कार्रवाई करने से बचेगा. लेकिन मई 2025 में हुए भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव ने इस रणनीति पर कई सवाल खड़े कर दिए.
अमेरिका स्थित बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स की एक रिपोर्ट में पाकिस्तान की परमाणु रणनीति की सीमाओं पर चर्चा की गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2025 में भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया. इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव बढ़ा और पाकिस्तान के कुछ एयरबेस भी भारतीय कार्रवाई की जद में आए.
रिपोर्ट में इस बात पर सवाल उठाया गया है कि अगर पाकिस्तान के परमाणु हथियार भारत को सैन्य कार्रवाई से रोकने के लिए हैं, तो फिर भारत ने उसके खिलाफ कार्रवाई कैसे की. इस दौरान भारत की पारंपरिक सैन्य क्षमता और पाकिस्तान की परमाणु रणनीति के बीच का अंतर भी सामने आया.
परमाणु हथियार भारत को रोक नहीं पाए
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2025 के टकराव ने पाकिस्तान के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया. अगर परमाणु हथियार भारत को कार्रवाई करने से नहीं रोक पाए, तो संकट के समय इनकी वास्तविक सैन्य उपयोगिता कितनी है?
अमेरिकी रिपोर्ट का कहना है कि परमाणु हथियारों को बेकार नहीं कहा जा सकता, लेकिन उनकी ताकत को हर परिस्थिति में एक मजबूत सुरक्षा कवच मानना सही नहीं होगा.
भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया था. इस कार्रवाई के दौरान पाकिस्तान और पीओके में मौजूद नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाए जाने की जानकारी सामने आई थी. इसके बाद सैन्य तनाव बढ़ने पर पाकिस्तान के 11 एयरबेस भी भारतीय कार्रवाई की जद में आए.
पारंपरिक सैन्य ताकत पर पाकिस्तान का जोर
रिपोर्ट में पाकिस्तान के सैन्य प्रचार में आए बदलाव का भी जिक्र किया गया है. मई 2026 में पाकिस्तान ने 2025 के सैन्य टकराव की पहली बरसी को बड़े स्तर पर पेश किया. इसके मुकाबले 1998 के परमाणु परीक्षणों की वर्षगांठ ‘यौम-ए-तकबीर’ को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया गया.
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के सार्वजनिक सैन्य प्रचार में भी पारंपरिक हथियारों और सैन्य उपलब्धियों को ज्यादा जगह मिली. सैन्य प्रदर्शन से जुड़ी तस्वीरों में परमाणु हथियारों और परमाणु क्षमता वाली मिसाइलों के बजाय पारंपरिक सैन्य ताकत को अधिक दिखाया गया.
‘फुल-स्पेक्ट्रम डिटरेंस’ पर उठे सवाल
पाकिस्तान लंबे समय से ‘फुल-स्पेक्ट्रम डिटरेंस’ की रणनीति की बात करता रहा है. इसका मुख्य उद्देश्य परमाणु हथियारों को ऐसी रणनीतिक ताकत के रूप में इस्तेमाल करना है, जिससे भारत किसी भी स्तर पर सैन्य कार्रवाई करने से पहले कई बार सोचे.
लेकिन अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2025 का संघर्ष इस रणनीति की सीमाएं दिखाता है. परमाणु हथियारों के कारण पैदा होने वाले संभावित खतरे के बावजूद भारत ने पाकिस्तान के भीतर सैन्य कार्रवाई की.
इससे यह सवाल उठा कि परमाणु हथियार होने के बावजूद क्या पाकिस्तान पारंपरिक सैन्य मोर्चे पर भारत को रोक पाने की स्थिति में है?
परमाणु हथियार सुरक्षा के साथ जोखिम भी बढ़ाते हैं
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि परमाणु हथियार केवल सुरक्षा का साधन नहीं हैं. संकट के समय इनकी मौजूदगी खतरा भी बढ़ा सकती है.
अगर दोनों देशों के बीच तनाव बहुत ज्यादा बढ़ जाए और किसी एक पक्ष की ओर से गलत आकलन हो जाए, तो स्थिति बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंच सकती है. यही वजह है कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल और उनकी कमान से जुड़ा हर फैसला बेहद संवेदनशील होता है.
रिपोर्ट में संघर्ष के अंतिम दौर में पाकिस्तान की नेशनल कमांड अथॉरिटी को लेकर हुई चर्चाओं का भी उल्लेख किया गया है. इससे परमाणु हथियारों की कमान और नियंत्रण को लेकर सवाल सार्वजनिक चर्चा में आए.
पाकिस्तान अब पारंपरिक हथियारों पर बढ़ा रहा जोर
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान अपनी पारंपरिक सैन्य ताकत बढ़ाने पर भी ध्यान दे रहा है. रक्षा बजट में बढ़ोतरी और आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड की स्थापना को इसी दिशा में उठाए गए कदमों के तौर पर देखा गया है.
अमेरिकी विश्लेषण के अनुसार, पाकिस्तान के लिए पारंपरिक सैन्य क्षमता की सफलता ज्यादा आसानी से दिखाई जा सकती है. युद्ध के दौरान इसके इस्तेमाल के साथ-साथ इसे सैन्य प्रचार में भी दिखाया जा सकता है. इसके मुकाबले परमाणु हथियारों का इस्तेमाल बेहद गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है.
भारत के लिए क्या है इसका मतलब?
भारत के नजरिए से मई 2025 का घटनाक्रम यह बताता है कि पाकिस्तान की परमाणु क्षमता और उसकी पारंपरिक सैन्य ताकत को अलग-अलग समझना जरूरी है.
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत ने आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई की. इसके बाद पैदा हुए सैन्य तनाव में भी पाकिस्तान की परमाणु क्षमता भारत को अपने घोषित लक्ष्यों से पीछे हटाने में सफल नहीं रही.
हालांकि, अमेरिकी रिपोर्ट यह नहीं कहती कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार बेअसर हैं. इसका मुख्य संदेश यह है कि परमाणु हथियारों को हर परिस्थिति में सुरक्षा की पक्की गारंटी मानना सही नहीं है.
पाकिस्तान का अनुभव यह भी दिखाता है कि परमाणु हथियार सुरक्षा देने के साथ कई बड़े रणनीतिक जोखिम लेकर आते हैं. इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि परमाणु बम कितना नुकसान पहुंचा सकता है, बल्कि यह भी है कि उसकी मौजूदगी संकट के समय किस तरह के खतरे पैदा कर सकती है.
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