रूस-यूक्रेन संघर्ष अब पारंपरिक हथियारों से आगे बढ़ चुका है. इस जंग में अब एक ऐसा हथियार सक्रिय हो गया है, जो युद्ध की परिभाषा ही बदल सकता है लेजर हथियार प्रणाली. हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें रूसी सेना ड्रोन को जमीन पर गिराने के लिए लेजर तकनीक का इस्तेमाल करती दिखाई दी. यह नजारा इजरायल की आयरन बीम तकनीक से मिलता-जुलता था, जो हवा में उड़ते खतरे को पलभर में भाप बना देती है. लेकिन इस खबर में भारत के लिए दिलचस्पी की दो वजहें हैं एक उम्मीद और दूसरी चिंता.
चीन की मदद से मिली लेजर टेक्नोलॉजी
जानकारी के मुताबिक, रूस की ‘Nomad स्पेशल फोर्स यूनिट’ अब Low Altitude Laser Defending System (LASS) का इस्तेमाल कर रही है, जो सीधे तौर पर चीन के Shen Nung 3000/5000 मॉडल जैसा दिखता है. इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटजिक स्टडीज़ (IISS) के विशेषज्ञ फेबियन हिंज का भी यही मानना है कि यह सिस्टम चीन की मूल तकनीक पर आधारित है. चीन ने इस तकनीक को सबसे पहले ईरान को सौंपा था और अब रूस तक इसकी पहुंच हो चुकी है.
भारत के लिए क्या मायने हैं इस सिस्टम के?
भारत और रूस लंबे समय से रक्षा साझेदार रहे हैं. ब्रह्मोस मिसाइल जैसी कई जॉइंट डिफेंस परियोजनाएं इसकी मिसाल हैं. यदि यह लेजर सिस्टम रूस के पास पूरी तरह ऑपरेशनल है और उसने इसे खुद विकसित करने में महारत हासिल कर ली है, तो भविष्य में भारत को भी इसका लाभ मिल सकता है — यदि रूस इसे भारत के साथ साझा करने को तैयार हो.
लेकिन दूसरी ओर, यह तकनीक चीन से आ रही है, और यहीं खतरे की घंटी बजती है. चीन पहले ही यह हथियार ईरान को दे चुका है. और अगर पाकिस्तान को यह तकनीक मिलती है. जिसकी आशंका ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद और प्रबल हो गई है, तो भारत को सीमाओं पर एक नया खतरा झेलना पड़ सकता है.
क्या है यह लेजर डिफेंस सिस्टम?
यह सिस्टम लो-एल्टीट्यूड पर उड़ते ड्रोन्स को सिर्फ लेजर बीम से टारगेट कर गिरा सकता है. इसे मोबाइल कंटेनरों में फिट कर, किसी भी ट्रक या वाहन से ऑपरेट किया जा सकता है. खास बात यह है कि इसका इस्तेमाल बिना मिसाइल खर्च किए किया जा सकता है — यानि ये इकोनॉमिक और सटीक दोनों है.
तकनीक की सीमाएं अभी बरकरार
भारत के लिए अगला कदम क्या?
भारत पहले ही Directed Energy Weapons (DEW) पर रिसर्च कर रहा है. DRDO ने कई प्रोटोटाइप बनाए हैं, लेकिन ऐसे सिस्टम की तैनाती अभी शुरुआती चरण में है. यदि रूस इस क्षेत्र में एक परिपक्व टेक्नोलॉजी पर पहुंच चुका है, तो यह भारत के लिए दो विकल्प खोलता है. रूस से इसे साझा करने की अपील जैसा ब्रह्मोस में हुआ. चीन-पाक गठजोड़ को ध्यान में रखते हुए, स्वदेशी लेजर प्रोजेक्ट्स को तेज़ करना.
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