Iran Protest Brutality: ईरान में विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के दौरान सुरक्षा बलों पर महिलाओं के साथ गंभीर यौन हिंसा और अमानवीय व्यवहार करने के आरोप लगे हैं. ईरानी-जर्मन पत्रकार मिशेल अब्दोल्लाही ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक वीडियो में दावा किया है कि प्रदर्शन में शामिल महिलाओं के खिलाफ बलात्कार और शारीरिक उत्पीड़न को डर फैलाने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया. उनके अनुसार, ये जानकारियां उन्हें प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़ितों के करीबियों से मिली हैं.
डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, अब्दोल्लाही ने आरोप लगाया कि हिरासत में ली गई कई महिलाओं के साथ यौन हिंसा की गई, उन्हें गंभीर रूप से प्रताड़ित किया गया और उनके शरीर पर यातना के निशान छोड़े गए. उन्होंने यह भी दावा किया कि कई मामलों में शव पर मौजूद हिंसा के सबूतों को छिपाने के लिए मृतकों के शरीर जला दिए गए, ताकि अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियों तक सही जानकारी न पहुंच सके.
हिरासत में अमानवीय व्यवहार के आरोप
जर्मन अखबार ‘डाई वेल्ट’ ने भी प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से रिपोर्ट की है कि घायल महिलाओं को सुरक्षा बलों ने अपमानजनक तरीके से वाहनों में लादकर ले जाया. गवाहों का कहना है कि हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों के साथ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया और उन्हें मानसिक रूप से तोड़ने की कोशिश की गई.
इसके अलावा कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि कई प्रदर्शनकारियों को जबरन निर्वस्त्र किया गया और उन्हें अज्ञात इंजेक्शन दिए गए. ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन’ ने केरमानशाह शहर की घटनाओं का जिक्र करते हुए बताया कि नाबालिगों समेत कई युवाओं के साथ यौन दुर्व्यवहार और मारपीट की गई.
हिजाब विरोध से शुरू हुआ आंदोलन
ईरान में दिसंबर के अंत से जनवरी के मध्य तक चले विरोध प्रदर्शनों को हाल के वर्षों के सबसे बड़े आंदोलनों में गिना गया. शुरुआत में ये प्रदर्शन महंगाई और गिरती अर्थव्यवस्था के खिलाफ थे. उस दौरान ईरानी मुद्रा रियाल की कीमत ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर पहुंच गई थी और रोजमर्रा की जरूरतों की चीजें आम लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही थीं.
धीरे-धीरे यह आंदोलन सामाजिक और राजनीतिक असंतोष में बदल गया. महिलाओं ने हिजाब न पहनकर, सार्वजनिक रूप से बाल खोलकर और सरकार विरोधी नारों के साथ विरोध दर्ज कराया. कुछ इलाकों में लोगों ने सरकारी प्रतीकों और शीर्ष नेतृत्व की तस्वीरों को जलाकर अपना आक्रोश जाहिर किया.
इंटरनेट बंदी और सुरक्षा बलों की तैनाती
प्रदर्शनों को रोकने के लिए सरकार ने कई दिनों तक इंटरनेट और अंतरराष्ट्रीय संचार सेवाएं बंद कर दीं. रिपोर्टों के अनुसार, दंगों को काबू में करने के लिए बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों और मिलिशिया की तैनाती की गई. यहां तक कि सीमावर्ती क्षेत्रों से अतिरिक्त लड़ाकों को बुलाए जाने की खबरें भी सामने आईं.
मौतों के आंकड़ों पर विरोधाभास
प्रदर्शनों के दौरान हुई मौतों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं. सरकारी एजेंसियों और मानवाधिकार संगठनों के आंकड़ों में बड़ा अंतर है. कुछ रिपोर्ट्स में हजारों लोगों के मारे जाने का दावा किया गया, जबकि स्वतंत्र मानवाधिकार समूहों ने इससे भी अधिक संख्या बताई. अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बड़े पैमाने पर मौतों की पुष्टि की है, वहीं कई संगठनों का कहना है कि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है.
महसा अमीनी केस से जुड़ा पुराना संदर्भ
2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद भी ईरान में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच, ने उस दौरान हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों के साथ यौन हिंसा और टॉर्चर के मामलों की पुष्टि की थी. संयुक्त राष्ट्र की जांच रिपोर्ट में बाद में कहा गया कि महसा अमीनी की मौत शारीरिक हिंसा से जुड़ी थी, जबकि ईरानी सरकार ने इसे स्वास्थ्य कारणों से हुई मौत बताया था.
पीड़ितों की गवाही से सामने आया दर्द
कुछ पीड़ित महिलाओं ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया को दिए गए इंटरव्यू में बताया कि हिरासत के दौरान उन्हें जबरन स्वीकारोक्ति पत्रों पर हस्ताक्षर करने को मजबूर किया गया. कई महिलाओं को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी. एक पीड़िता ने बताया कि पूछताछ के दौरान उसे अलग कमरे में ले जाकर पीटा गया और अपमानजनक व्यवहार किया गया, जिसके बाद वह गहरे सदमे में चली गई.
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