नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव टीएमसी के नेतृत्व में विपक्षी दलों द्वारा संसद में पेश किया गया था. इस प्रस्ताव में ज्ञानेश कुमार पर कई गंभीर आरोप लगाए गए थे. आरोपों के अनुसार, उन्होंने अपने पद का गलत इस्तेमाल किया और कुछ राजनीतिक दलों के पक्ष में भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया. विशेष रूप से, बिहार और पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का आरोप उनके खिलाफ था. इसके अलावा, चुनावी धांधली की जांच को जानबूझकर रोकने की भी बातें सामने आई थीं.
प्रस्ताव की प्रक्रिया और राज्यसभा का निर्णय
महाभियोग प्रस्ताव 12 मार्च को राज्यसभा में पेश किया गया था, जिसमें कुल 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे. इसके बाद, लोकसभा में भी 130 सांसदों ने इस पर समर्थन जताया. लेकिन भारतीय संविधान के तहत, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना आसान नहीं है. इसके लिए कम से कम 100 लोकसभा सांसदों या 50 राज्यसभा सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं.
हालांकि, राज्यसभा के सभापति ने 1968 के जजेस इनक्वायरी एक्ट के सेक्शन 3 का हवाला देते हुए इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से मना कर दिया. इस फैसले से यह साफ हो गया कि महाभियोग का रास्ता इतना सीधा नहीं है और इसे पास करने के लिए अधिक सख्त प्रक्रिया की आवश्यकता है.
CEC को हटाने की जटिल प्रक्रिया
भारतीय संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं. अनुच्छेद 124(5) और अनुच्छेद 124(4) के तहत, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए वही प्रक्रिया अपनाई जाती है, जो सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को हटाने के लिए की जाती है. इसके लिए संसद के दोनों सदनों में 'विशेष बहुमत' से प्रस्ताव पास करना होता है, यानी उपस्थित सदस्यों का दो तिहाई बहुमत.
सरकार और विपक्ष के बीच गहरी खींचतान
महाभियोग प्रस्ताव के खारिज होने के बाद अब सरकार और विपक्ष के बीच यह मुद्दा और भी पेचीदा हो गया है. विपक्ष इस फैसले को लोकतंत्र की हत्या के रूप में देख रहा है, जबकि सरकार इसे संविधानिक प्रक्रिया के तहत सही मान रही है. इस पूरी घटना ने चुनावी प्रणाली और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, और यह मामला आगे भी चर्चा का विषय बना रहेगा.
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