काबुल/दोहा: अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हाल के सप्ताहों में हुई सीमा झड़पों और गोलीबारी के बाद दोनों देशों ने संघर्षविराम की दिशा में कदम बढ़ाने की कोशिश की थी. लेकिन इस प्रक्रिया को उस समय बड़ा झटका लगा जब मध्यस्थता कर रहे देश कतर ने अपने बयान में संशोधन कर दिया, जिससे पाकिस्तान की स्थिति और भी कमजोर होती दिख रही है. संशोधित बयान में विवादित डूरंड लाइन का ज़िक्र हटा दिया गया है, जो कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच दशकों से चले आ रहे सीमा विवाद की जड़ है.
सीमा संघर्ष के बाद हुई थी शांति वार्ता
पिछले कई दिनों से अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा पर हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए थे. विशेष रूप से खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में दोनों देशों की सेनाओं के बीच कई बार झड़पें हुईं, जिनमें आम नागरिकों की भी मौतें हुईं और कई घायल हुए. इस बीच संघर्ष को रोकने और वार्ता की राह पर लौटने के लिए कतर और तुर्की ने मध्यस्थता की पहल की.
दोहा में 13 अक्टूबर को अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रक्षा मंत्रियों की मौजूदगी में एक अहम बैठक हुई. शुरुआती रिपोर्टों में बताया गया कि दोनों देशों ने संघर्षविराम और आपसी बातचीत को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है.
डूरंड लाइन को लेकर बदल गया रुख
हालांकि, पाकिस्तान के लिए असली झटका तब आया जब कतर ने बैठक के बाद जारी अपने आधिकारिक बयान में डूरंड लाइन को एक ‘सीमा’ के रूप में उल्लेख किया, जिसे अफगानिस्तान हमेशा से खारिज करता आया है. जैसे ही यह बयान सार्वजनिक हुआ, अफगानिस्तान में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं. सोशल मीडिया पर और विभिन्न राजनीतिक हलकों में इसे देश की संप्रभुता के खिलाफ बताया गया.
विवाद बढ़ता देख कतर के विदेश मंत्रालय ने अपने पहले के बयान में संशोधन कर दिया और डूरंड लाइन से संबंधित सभी संदर्भों को हटा लिया. अब कतर की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध बयान में कहीं भी डूरंड लाइन का उल्लेख नहीं किया गया है.
तालिबान सरकार का स्पष्ट रुख
अफगानिस्तान के रक्षा मंत्री मुल्ला याकूब मुजाहिद ने एक ऑनलाइन प्रेस वार्ता में बताया कि दोहा की बैठक में डूरंड रेखा से संबंधित कोई चर्चा नहीं हुई थी. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अफगानिस्तान ने इस बैठक को केवल संघर्षविराम और शांति स्थापना के संदर्भ में देखा, न कि किसी सीमा निर्धारण के रूप में.
उन्होंने यह भी कहा, “डूरंड लाइन अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच एक विवादित मामला है, जिसे हमारी सरकार कभी स्वीकार नहीं करेगी.” उन्होंने आगे चेतावनी दी कि अगर पाकिस्तान कोई सैन्य कार्रवाई करता है, तो अफगानिस्तान भी उत्तर देने के लिए तैयार रहेगा.
क्या है डूरंड लाइन का इतिहास और विवाद?
डूरंड रेखा की उत्पत्ति 1893 में हुई, जब ब्रिटिश भारत और अफगान अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच एक समझौता हुआ था. इस रेखा के तहत अफगानिस्तान और ब्रिटिश भारत के बीच 2,640 किलोमीटर लंबी एक सीमा खींची गई थी. लेकिन 1947 में पाकिस्तान के निर्माण के बाद से ही अफगानिस्तान ने इसे मान्यता नहीं दी है.
अफगान सरकारों (चाहे वे लोकतांत्रिक रही हों या तालिबान के नेतृत्व वाली) ने हमेशा इसे एक काल्पनिक रेखा कहा है. उनका दावा है कि यह रेखा अफगान क्षेत्रों को कृत्रिम रूप से पाकिस्तान में शामिल करती है. इस मुद्दे को लेकर पश्तून आबादी, जो दोनों ओर रहती है, को लेकर भी तनाव बना रहता है.
कतर का बयान बदलना क्यों है अहम?
कतर की ओर से बयान में डूरंड लाइन का उल्लेख हटाना एक कूटनीतिक संकेत माना जा रहा है कि वह तालिबान सरकार की संवेदनशीलताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता. दूसरी ओर, यह बदलाव पाकिस्तान के लिए एक झटका है, क्योंकि वह डूरंड लाइन को अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता रहा है.
इस घटनाक्रम से साफ हो गया है कि अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम की कोई भी पहल तब तक स्थायी नहीं हो सकती जब तक सीमा विवाद को सुलझाने के लिए स्पष्ट और पारदर्शी बातचीत न हो.
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