गाजा में बेकाबू होते जा रहे हालात, 2300 में बिक रहा 5 रुपये का Parle-G, वायरल वीडियो ने दिखाई सच्चाई

पारले-जी, जो भारतीय उपभोक्ताओं के लिए सादगी और बचपन की यादों का नाम है, आज गाजा में 2300 रुपये (24 यूरो) में बिक रहा है.

Parle-G worth 5 rupees is being sold for 2300 rupees in Gaza
प्रतीकात्मक तस्वीर/Photo- X

रामल्ला/गाज़ा: वह बिस्किट जो भारत में चाय के प्याले के साथ 5 रुपये में रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है, वह गाज़ा की गलियों में विलासिता का प्रतीक बन चुका है. पारले-जी, जो भारतीय उपभोक्ताओं के लिए सादगी और बचपन की यादों का नाम है, आज गाजा में 2300 रुपये (24 यूरो) में बिक रहा है.

यह कहानी सिर्फ एक बिस्किट की नहीं, बल्कि एक पूरे समाज के भूखे, प्यासे और टूटते वजूद की है, जो जंग के मलबे में दबा पड़ा है.

एक बाप, एक बेटी और एक बिस्किट

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ फिलिस्तीनी नागरिक मोहम्मद जवाद का एक वीडियो, गाज़ा की उस दर्दनाक हकीकत को सामने लाता है, जिसे आंकड़ों और घोषणाओं के पीछे अक्सर छुपा दिया जाता है.

वीडियो में जवाद की नन्ही बेटी रफीफ अपने हाथों में पारले-जी का पैकेट लिए मुस्करा रही है. और जवाद बता रहे हैं, "मैंने अपनी बेटी की पसंद के लिए 24 यूरो दिए, भले ही उसकी असली कीमत 1.5 यूरो थी. मैं उसे मना नहीं कर सका."

यह महज़ एक पिता की लाचारी नहीं, बल्कि उस बिखरते समाज का आईना है, जहां बुनियादी जरूरतें भी अब बाजार की शर्तों पर नहीं, युद्ध के सौदागरों की मर्ज़ी पर मिलती हैं.

गाज़ा में मानवीय आपदा की भयावहता

संयुक्त राष्ट्र ने पहले ही गाज़ा को "अकाल के कगार पर खड़ा युद्धक्षेत्र" बताया है. और इस बिस्किट की कीमत बताती है कि वह कगार अब पार हो चुका है.

रिपोर्टों के मुताबिक:

  • आटा 500 डॉलर प्रति बोरी बिक रहा है.
  • चीनी 90 डॉलर प्रति किलोग्राम तक पहुंच चुकी है.
  • पानी, दवाइयां और अन्य ज़रूरी वस्तुएं ब्लैक मार्केट में बिक रही हैं.
  • और वह सारी राहत सामग्री जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पहुंचती है, वह या तो रास्ते में लूट ली जाती है, या राजनीतिक गुटों द्वारा कब्जा करके ऊंचे दामों पर बेची जाती है.

पारले-जी की कहानी से भारत में हलचल

जैसे ही यह वीडियो भारत में फैला, सोशल मीडिया पर एक भावनात्मक बहस छिड़ गई. कई उपयोगकर्ताओं ने पारले कंपनी, भारतीय सरकार, और मानवाधिकार संगठनों को टैग करते हुए सीधी मदद भेजने की अपील की.

लेकिन सवाल सिर्फ भेजने का नहीं है. सवाल है कि राहत आखिर पहुंचती किस तक है? क्या जो भेजा जा रहा है, वह जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है या हमास, निजी मिलिशिया, या युद्ध के दलालों की जेबें भर रहा है?

वितरण निष्पक्ष नहीं है: मोहम्मद जवाद

वायरल पोस्ट पर प्रतिक्रियाओं के बाद, जवाद ने खुद स्पष्ट किया, "गाज़ा में कोई भी चीज़ सीधे जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचती. कब्जे और अराजकता के बीच, कुछ ताकतें इसे हथिया कर काले बाज़ार में बेच रही हैं. कई बार लोगों को अपनी जरूरतों के लिए जान जोखिम में डालनी पड़ती है."

यह आरोप सिर्फ हथियारबंद समूहों पर ही नहीं, बल्कि उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर भी है जो सिर्फ भेजने का दावा करती है, लेकिन पहुंच की निगरानी नहीं करती.

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