Rising Bharat Leadership Summit 2026: आज राजधानी दिल्ली में Rising Bharat Leadership Summit 2026 का भव्य आयोजन हो रहा है. इस कार्यक्रम में रक्षा, राजनीति और राष्ट्रवाद से जुड़ी जानी-मानी हस्तियों ने शिरकत की. इस बीच कार्यक्रम में परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेन्द्र सिंह यादव ने शिरकत की और इस कार्यक्रम में खास बातचीत का हिस्सा बनें.
ऑपरेशन सिंदूर में भारत में निर्मित हथियारों की ताकत
निर्भर भारत एक इसकी आत्मा की शक्ति के रूप में निखर करके बाहर आ रहा है और यह दिखा रहा है कि भारत की क्षमता योग्यता वो किसी से कम नहीं है. दुनिया में जब जहाज का आविष्कार नहीं हुआ था तब भारत ने जहाजों का आविष्कार कर दिया था. पुष्पक विमान उसका एक उदाहरण है कि जब रामचंद्र जी लंका से अयोध्या आए थे तो पुष्पक विमान में आए थे. तो हमारे अंदर क्षमताओं की कमी नहीं है. हमें अगर एक सही दिशा मिले, सही लीडरशिप मिले तो हम अपनी क्षमताओं के प्रदर्शन से पूरी दुनिया को झुका भी सकते हैं.
और आज उसी दिशा में भारत आगे बढ़ रहा है और यह भारत की तमाम उन युवा शक्तियों को मैं नमन कर रहा हूं जो राष्ट्र को आगे बढ़ाने में अपना पूर्ण योगदान दे रहे हैं. तो यह भारत के लिए, भारतवासियों के लिए बहुत बड़ी बात है.
5 से ज्यादा गोलियां लगने के समय जहन में क्या चल रहा था?
देश तो मेरे बारे में सब कोई जानता है लेकिन हम सबसे बड़ी बात यहां इस बात की है कि दुनिया में 200 से ज्यादा राष्ट्र हैं और सब राष्ट्र वाले अपने देश को सिर्फ एक खंड समझते हैं. लेकिन हम इस खंड को मां समझते हैं. और मां में वो शक्ति है, वो ताकत है, वो ऊर्जा है कि मां अपनी उस औलाद को एक सशक्त समृद्ध बना सकती है. एक साहसी पुरुष बना सकती है. जीजाबाई ने शिवाजी को इतना महान बना दिया कि उन्होंने हिंदू राष्ट्र का ही निर्माण कर दिया.
तो हमारे देश की धरती जप की, तप की, ज्ञान की, विज्ञान की, पुरुषार्थ की, परमार्थ की, वीरों की, वीरांगनाओं की धरती है. और यह धरती में जन्म लेना शायद 100 जन्मों का पुण्य रहा होगा. जब हमें भारत मां का गर्व मिला होगा. बिल्कुल तो मांओं का वो संस्कार इस धरती का वो जो संस्कृति उसी ने वो ताकत वो समृद्धि दी कि 17000 फीट ऊंची पहाड़ी पर जहां पर दुश्मन इतनी भारी तादाद में बैठा था, वहां पर भी हिंदुस्तान की फौज के जवान कंधे से कंधा और कदम से कदम मिलाकर के उन पहाड़ों के शिखरों पर चढ़ते रहे बढ़ते रहे संघर्ष करते रहे और उनके बंकरों को उनका कब्रिस्तान भी बनाते रहे.
सात जवानों ने 150 पाकिस्तानियों का किया काम तमाम
मुझे वो घड़ी वो पल आज भी याद है कि जब हम चढ़ते जा रहे थे उस टाइगर हिल टॉप की तरफ. 21 जवानों की टीम थी अचानक से दुश्मन ने फायर खोल दिया. और 21 में से सात जवान ऊपर चढ़ पाए. केवल सात जवान. ऐसे आपके स्टेज की बराबर इतना प्लेन स्पेस सामने दुश्मन के बंकर. हम सातों जवानों ने अधाधुंध फायरिंग किया और उसमें बैठे हुए तमाम पाकिस्तानियों को पल भर के अंदर मौत के घाट उतार दिया था. वहां से दुश्मन की जो मेन पोस्टों की दूरी थी 50 से 60 मीटर और ऊपर दुश्मन की डिप्लॉयमेंट एक कंपनी एक कंपनी की स्ट्रेंथ 150-150, लेकिन हम केवल सात लेकिन बिना डरे बिना रुके धैर्य और साहस के साथ हम आगे बढ़ते रहे लड़ते रहे संघर्ष करते रहे और 5 घंटे हमने वहां संघर्ष किया और यह सच है कि जब यह संघर्ष की अग्नि जलती है तो आत्मा निखरती है.
और आत्मा की जो शक्ति होती है वह परमात्मा की शक्ति होती है. उसी परमात्मा की शक्ति के साथ हम पांच घंटे लड़े और पांच घंटे के बाद ऐसे दृश्य ऐसी परिस्थिति आई जो अभी तक लोगों ने सिर्फ फिल्मों में देखा है कि गर्दनें कटती हैं और धड़ चलते हैं. मैंने उसको देखा नहीं जिया भी है. कैप्टन विजय थापर के फादर यहां पर बैठे हुए हैं. मैं उनको नमन करता हूं. वह मांजी और पिता के तुल्य हैं. ठीक है. जिनका बेटा बड़े गर्व से अपने मम्मी पापा को लेटर लिखता है कि जब यह खत आपके पास पहुंचा होगा तो मैं सितारों की परियों से बातें कर रहा होगा. यह एक फौजी का बेटा ही लिख सकता है क्योंकि उसके अंदर वह संस्कार आ गए.
फौज का महामंत्र क्या है?
वह गुण आ गए. तो यह बहुत बड़ी बात थी क्योंकि मान मर्यादा और इज्जत नाम नमक और निशान यह हमारी फौज का महामंत्र है कि अपनी पलटन अपनी सेना और अपने राष्ट्र को आखिरी गोली और आखिरी सांस तक हराने नहीं देंगे, झुकने नहीं देंगे बल्कि उसके सर को उठा के रखेंगे. वो पल सर से लेकर के पैर तक लहूलुहान और यह 19 साल का लड़का जिसको ना उम्र का अनुभव ना सर्विस का अनुभव उनके साथ लड़ रहा था. एक-एक करके साथी शहीद होते जा रहे थे. मुझे वो पल याद है जब मैं नाक से खून की धार बह रही थी. मुझे मेरा साथी फर्स्ट एड करने लगता है और उसको यहां पर गोली लगती है.
इधर से पूरा सर निकलता है. उसका हाथ पकड़ा सर क्या हुआ लेकिन एक शब्द तक नहीं बोला. बगल वाला साथी बैठा तो वो मेरा ट्रेनिंग का साथी था. मैं उसको बोला अनंत राम सर को तो गोली लगी. क्या? यह उसका आखिरी शब्द था. उसको सीने में गोलियां लगती है. फेफड़ों से खून की फ्वारे छूटती मेरी गोद में आकर के लेट जाता है. एक पल में दोनों साथी शहीद हो गए. एक साथी पीछे से दौड़ के जब नजदीक पहुंचता है वहीं आर्टरी का बम गिरता है और उसका यह सर कट करके दूर जाकर के गिरता है. चारों तरफ खून की बौछारें ही बौछारें थी. मैं देख रहा था कि उस धड़ पर सर नहीं था लेकिन हाथों से बंदूक नहीं छूटी थी और वह धड़ दो कदम तक चला.
हमारी फौज एक बार कमिटमेंट करती है तो...
फिर जमीन पर गिर गया. एक और साथी आगे बढ़ा. एक और बम वहां पर गिरता है. दोनों हाथ दोनों पैर कट करके जमीन पर गिरते हैं. और जब ये शरीर के अंग कट करके गिरते हैं. किस तरह से उछलते और तड़पते हैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता हूं. सब कुछ खत्म हो गया. मैं भी मर गया उनकी तरफ से. लेकिन किसान का बेटा था खेत खलियानों में काम किया था. कभी जाड़े में खेतों में पानी दिया. कभी गर्मी के अंदर हल चलाया तो इतनी मता थी कि वह जब आने लगे, गोलियां मारने लगे. रिचेक करने के लिए कोई जिंदा तो नहीं बच गया है. वो गोली मारते जा रहे थे.
मांस और हड्डी शरीर से बाहर निकलती जा रही थी. लेकिन उसकी पीड़ा को चुपचाप पड़ा सहता जा रहा था. तीन बार गोलियां मारी लेकिन तीनों बार चुपचाप पड़ा रहा. बस एक मन के अंदर विश्वास को पैदा रखा. एक अपने आप से कमिटमेंट करके रखा. अगर इसने सर और सीने में गोली नहीं मारी ना चाहे मेरे हाथ पैर दोनों ही काट करके ले जाओ मैं उफ तक नहीं करूंगा और मैं जिंदा भी रहूंगा क्योंकि कमिटमेंट और कमिटमेंट पर दड़ रहना दोनों अलग-अलग बात है. कमिटमेंट तो हम सब करते हैं. सुबह के कमिटमेंट को शाम को तोड़ देते हैं. शाम के कमिटमेंट को सुबह तोड़ देते हैं. लेकिन हमारी फौज एक बार कमिटमेंट करती है तो उसके ऊपर दृढ़ संकल्पित रहती है और वही हमारी ताकत बनती है.
महाभारत में पितामह भीष्म ने क्या किया था? दृढ़ संकल्प ही किया था पूरे जीवन तभी उन्होंने अपनी इंद्रियां ही ने अपनी मौत को मुठी मुट्ठी में बांध लिया था और यह शख्स आज आज आपके सामने खड़ा है जो बात कर रहा है. यह 17 गोलियां लगने के बाद आपसे बात नहीं कर रहा होता. अगर दृढ़ संकल्प इतना रहा होता तो कहीं पत्थर की मूरत बना हुआ होता.
जिंदगी में कितना बदलाव आया?
जो है उस जिंदगी और इस जिंदगी में तो बहुत फर्क है. वहां जवान अकेला नहीं होता और पूरी फौज उसके साथ होती है. लेकिन जब वो रिटायरमेंट हो जाता है तो फिर यहां वो वाला माहौल तो नहीं बनता. मिलता नहीं है. लेकिन उसको अपनी कैपेबिलिटी बढ़ा के, अपनी स्किल्स बढ़ा के इनके साथ बड़ा सामंजस्य बैठाने में थोड़ा टाइम लगता है. और सामंजस्य बैठाया और बैठाने के बाद फिर आज की लाइफ बड़ी संघर्ष वाली लाइफ है और संघर्ष ही जीवन दूसरा जीवन है. तो मैं अभी पिछले साल चार साल में रिटायरमेंट हुआ हूं लेकिन अपने कर्तव्य और दायित्वों से रिटायर नहीं हुआ हूं.
इसलिए कश्मीर से कन्याकुमारी राजस्थान से लेकर के नागालैंड तक लगभग 4 साल के अंदर 8 लाख स्टूडेंटों से संवाद किया और इस 8 लाख में 2 लाख ऐसे स्टूडेंट जो एक सुसाइड की तरफ जा रहे थे एक मानसिक तनाव के कारण जहां पेरेंट्स का अपने बच्चों के दूसरे के बच्चों से तुलनात्मक कि मेरा बच्चा उस फलाने का बच्चा डॉक्टर बन गया, फलाने का बच्चा इंजीनियर बन गया, तुझे भी डॉक्टर बनना है इंजीनियर बनना है लेकिन मैं उनसे पेर पेरेंट्स से ये कहता हूं और कहना चाहता हूं हर एक इंसान इस यूनिवर्स का यूनिक है.
उसके जैसा दूसरा नहीं है. आपके बेटे के जैसा दूसरा नहीं है. तो आपके बेटे में जो क्षमताएं हैं उसको पहचानो और उस क्षमता के अनुसार उस गुण के अनुसार जो परमात्मा ने दिया उसकी तरफ बढ़ाओ. आपका बेटा जिस क्षेत्र में जाएगा आपका और उस राष्ट्र का नाम रोशन कर देगा.
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