क्या है 'न्यूक्लियर अंब्रेला', जिसे UAE को देगा भारत? पाकिस्तान-सऊदी अरब का हाल बेहाल

India-UAE Nuclear Agreement: हाल ही में भारत और UAE के बीच जो परमाणु समझौते की चर्चा हो रही है, उसके चलते मीडिया और कूटनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत अब यूएई को ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ यानी परमाणु सुरक्षा कवच देने जा रहा है.

Nuclear Umbrella which India will give to UAE Pakistan-Saudi Arabia's condition is bad
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India-UAE Nuclear Agreement: हाल ही में भारत और UAE के बीच जो परमाणु समझौते की चर्चा हो रही है, उसके चलते मीडिया और कूटनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत अब यूएई को ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ यानी परमाणु सुरक्षा कवच देने जा रहा है. यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान हाल ही में डेढ़ घंटे के लिए भारत आए और उनके दौरे के दौरान दोनों देशों ने कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए. 

इन समझौतों में ‘न्यूक्लियर डील’ भी शामिल है, जिसमें विशेष रूप से ‘न्यूक्लियर सेफ्टी’ और ‘ऑपरेशन’ पर चर्चा की गई. इस समझौते को लेकर सबसे ज्यादा ध्यान इसी बात पर गया कि क्या भारत अपनी सीमाओं से बाहर जाकर UAE की सुरक्षा के लिए अपने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करेगा. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इसके मायने तकनीकी और रणनीतिक दोनों दृष्टिकोण से अलग हैं.

न्यूक्लियर सेफ्टी और सुरक्षा में अंतर

समझौते में ‘न्यूक्लियर सेफ्टी’ का जिक्र किया गया है. तकनीकी तौर पर इसे दो तरीके से समझा जा सकता है. पहला, परमाणु संयंत्रों को किसी तरह के दुर्घटनाओं, रेडिएशन लीक या परमाणु कचरे की गलत हैंडलिंग से बचाना. भारत के पास 50 साल से अधिक का अनुभव है और UAE के पास ‘बराकाह’ नामक नाभिकीय संयंत्र है. भारत की मदद से वहां सुरक्षा प्रोटोकॉल को मजबूत किया जा सकता है.

दूसरा मतलब है बाहरी हमलों से सुरक्षा, जिसे तकनीकी भाषा में Nuclear Security या Physical Protection कहा जाता है. ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ का अर्थ होता है एक्सटेंडेड डिटरेंस, यानी अगर कोई तीसरा देश UAE पर परमाणु हमला करता है तो भारत अपने हथियारों के जरिए उसका जवाब देगा. लेकिन इस समझौते की भाषा और घोषणाओं से यह स्पष्ट नहीं होता कि भारत ऐसा कदम उठाने वाला है.

कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि ऐसे समझौते आम तौर पर बहुत संवेदनशील होते हैं और उनके डिटेल्स सार्वजनिक नहीं होते. UAE ने तकनीकी और सुरक्षा सहयोग की मांग जरूर की होगी, और भारत ने सकारात्मक संकेत दिए होंगे, लेकिन इसका मतलब सीधे तौर पर ‘परमाणु अंब्रेला’ देना नहीं है.

भारत के लिए क्यों है चुनौती

भारत के लिए यूएई को परमाणु सुरक्षा कवच देना आसान नहीं है. इसके पीछे कई कारण हैं. सबसे पहले, भारत की ‘नो फर्स्ट यूज’ नीति. भारत का परमाणु हथियारों का इस्तेमाल केवल बचाव के लिए होता है, यानी अगर कोई हमला करता है तो जवाब दिया जाएगा. किसी अन्य देश के लिए एक्सटेंडेड डिटरेंस का आश्वासन देना इस नीति में बदलाव होगा.

दूसरा कारण अमेरिका का नजरिया है. UAE में अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं और अमेरिका के साथ ‘123 एग्रीमेंट’ भी है. अगर भारत वहां सुरक्षा कवच देने की बात करता है तो यह अमेरिका के साथ टकराव का कारण बन सकता है.

तीसरा कारण क्षेत्रीय जटिलताएं हैं. पाकिस्तान और सऊदी अरब ने एक ऐसा समझौता किया है जिसमें सुरक्षा कवच की बातें की जाती हैं. भारत को UAE के लिए ऐसा कदम उठाने के लिए राजनीतिक, रणनीतिक और आर्थिक रूप से सावधानी बरतनी होगी. भारत को UAE से पैसों के लिए अपनी परमाणु संप्रभुता जोखिम में नहीं डालनी है.

समझौते का असली मकसद

विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों का मानना है कि यह समझौता मुख्य रूप से एनर्जी सेक्टर और टेक्नोलॉजी डिप्लोमेसी से जुड़ा है. इसमें स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स का निर्माण और उनका सुरक्षित संचालन शामिल है. ये रिएक्टर छोटे, सुरक्षित और कम खर्चीले होते हैं, और आने वाले वर्षों में ये ऊर्जा क्षेत्र में गेम चेंजर साबित हो सकते हैं.

UAE की दृष्टि से यह कदम ग्रीन एनर्जी और तेल पर निर्भरता कम करने की दिशा में है. भारत के लिए यह अवसर है कि वह अपनी उभरती परमाणु तकनीक को मध्य पूर्व में स्थापित करे और चीन को इस क्षेत्र में तकनीकी प्रतिस्पर्धा में चुनौती दे.

भारत और UAE के बीच अपेक्षित सहयोग

इस समझौते के तहत भारत UAE को स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स प्रदान करेगा और उनके संचालन और सुरक्षा में मदद करेगा. यानी भारत यह सुनिश्चित करेगा कि रिएक्टर सुरक्षित और टिकाऊ तरीके से काम करें. यह सहयोग न केवल ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा बल्कि भारत की टेक्नोलॉजी और औद्योगिक क्षमता को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करेगा.

कुल मिलाकर, इस समझौते का केंद्रबिंदु ‘परमाणु सुरक्षा कवच’ नहीं बल्कि ऊर्जा, तकनीकी सहयोग और रणनीतिक साझेदारी है. इसे ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ के रूप में देखना सही नहीं है, बल्कि यह भारत की तकनीकी दक्षता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.

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