नई दिल्ली: पाकिस्तान ने हाल ही में खुद को अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के तौर पर पेश किया, लेकिन उसका यह दावा पूरी तरह से खोखला और झूठा साबित हुआ है. पाकिस्तान ने पूरी दुनिया को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि वह दोनों देशों को एक साथ लाकर शांति वार्ता करा रहा है, जबकि हकीकत यह थी कि वह केवल झूठी खबरों के जरिए खुद को प्रमुख बनाने की कोशिश कर रहा था. पाकिस्तान का यह झूठ इतना सफाई से बोला गया कि एक अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी भी इसके जाल में फंस गई और गलत खबर चला दी.
पाकिस्तान ने झूठी खबरें फैलाईं
पाकिस्तान ने लगातार यह जानकारी दी कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची इस्लामाबाद आ रहे हैं और अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता शुरू होने वाली है. इसके साथ ही दावा किया गया कि अमेरिकी सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स टीम पहले से ही पाकिस्तान में मौजूद है, ताकि बातचीत के लिए तैयारी की जा सके. पाकिस्तान की सेना की मीडिया विंग ISPR ने इन झूठी खबरों को फैलाने में अहम भूमिका निभाई और मीडिया के माध्यम से इसे दुनिया तक पहुंचाया.
ईरान का रुख था स्पष्ट
जबकि पाकिस्तान दावा कर रहा था कि शांति वार्ता चल रही है, ईरान के अधिकारी इस झूठ को पूरी तरह से नकारते रहे थे. ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने स्पष्ट किया था कि वह अमेरिका से तब तक नहीं मिलेंगे, जब तक उनकी प्रमुख शर्तें पूरी नहीं होतीं. इन शर्तों में सबसे अहम यह थी कि अमेरिका को ईरान की शिपिंग (समुद्री व्यापार) पर लगी पाबंदी हटानी होगी. अराघची इस्लामाबाद अपनी शिकायतें और चिंताएं बताने आए थे, न कि किसी शांति वार्ता के लिए.
पाकिस्तान का प्रचार और सच्चाई का खुलासा
पाकिस्तान की कोशिशें थीं कि वह दुनिया में खुद को एक प्रमुख शांति दूत के रूप में पेश करे, लेकिन जैसे-जैसे सच्चाई सामने आई, उसकी पोल खुल गई. पत्रकार रयान ग्रिम ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह कभी सच नहीं था कि ईरान के विदेश मंत्री अराघची अमेरिका से बातचीत शुरू करने का इरादा रखते थे. उन्होंने बताया कि यह झूठ इसलिए फैला, क्योंकि पाकिस्तान की सेना की मीडिया विंग (ISPR) ने पत्रकारों को गलत जानकारी भेजी थी, जिससे यह अफवाह फैल गई कि शांति वार्ता शुरू हो रही है.
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