लाल सागर और बाब-अल-मंदेब में बेबस पाकिस्तान! PAK नौसेना नहीं कर पाई अपने नागरिकों की मदद

लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में बढ़ते हमलों ने पाकिस्तान की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. 11 अगस्त को तंजानिया के झंडे वाले मालवाहक जहाज ‘तिहामा’ पर मिसाइल हमला हुआ.

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लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में बढ़ते हमलों ने पाकिस्तान की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. 11 अगस्त को तंजानिया के झंडे वाले मालवाहक जहाज ‘तिहामा’ पर मिसाइल हमला हुआ. यह घटना ऐसे समय हुई, जब इस बेहद संवेदनशील समुद्री रास्ते से बड़ी संख्या में जहाज गुजर रहे हैं और इनमें कई पाकिस्तानी नागरिक भी चालक दल के सदस्य के तौर पर काम करते हैं. इस हमले ने यह साफ कर दिया कि पाकिस्तान अपनी नौसेना के जरिए अपने नागरिकों को हर समुद्री क्षेत्र में सुरक्षा देने की स्थिति में नहीं है.

हूती हमलों से पहले से खतरे में है यह समुद्री रास्ता

लाल सागर, अदन की खाड़ी और बाब-अल-मंदेब क्षेत्र में हूती विद्रोहियों के हमले 2023 के अंत से ही अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं. अक्टूबर 2025 में गाजा युद्धविराम के बाद हमलों में कुछ समय के लिए कमी आई थी, लेकिन 2026 में ईरान-अमेरिका युद्ध शुरू होने के बाद क्षेत्रीय तनाव फिर बढ़ गया. इसका असर समुद्री व्यापार पर भी पड़ा और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से लेकर लाल सागर तक जहाजों की आवाजाही मुश्किल हुई.

पाकिस्तान को इस खतरे की जानकारी पहले से थी, क्योंकि उसके हजारों नागरिक दुनियाभर के मालवाहक जहाजों, टैंकरों और कंटेनर शिप पर काम करते हैं. ऐसे में इन समुद्री रास्तों की सुरक्षा पाकिस्तान के लिए केवल सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक और मानवीय मुद्दा भी है.

ऑपरेशन मुहाफिज-उल-बहर की सीमा कितनी है?

ईरान युद्ध के बीच पाकिस्तान ने 9 मार्च 2026 को ‘ऑपरेशन मुहाफिज-उल-बहर’ शुरू किया. इसका उद्देश्य समुद्री रास्तों और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े मार्गों की सुरक्षा करना है. हालांकि, इस अभियान का दायरा काफी सीमित रखा गया है. पाकिस्तानी अधिकारियों के मुताबिक, यह मुख्य रूप से पाकिस्तान के झंडे वाले व्यापारिक जहाजों को कराची से खाड़ी और कराची से लाल सागर तक के समुद्री रास्तों पर सुरक्षा देने के लिए है.

इसका मतलब यह है कि किसी विदेशी झंडे वाले जहाज पर पाकिस्तानी नागरिक काम कर रहे हों, तो उन्हें उसी स्तर की सुरक्षा मिलना तय नहीं है. यही पाकिस्तान की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी सीमाओं में से एक दिखाई देती है.

बाब-अल-मंदेब में दूसरे देशों की नौसेनाओं पर निर्भरता

बाब-अल-मंदेब और लाल सागर क्षेत्र में लंबे समय से अमेरिका और यूरोपीय देशों की नौसेनाएं सक्रिय हैं. दिसंबर 2023 में अमेरिका के नेतृत्व में समुद्री सुरक्षा गठबंधन बनाया गया था. इसके अलावा यूरोपीय संघ का ऑपरेशन एस्पाइड्स और कंबाइंड मैरीटाइम फोर्सेज भी इस क्षेत्र में सुरक्षा और निगरानी का काम कर रहे हैं.

इसके मुकाबले पाकिस्तान की नौसेना की मौजूदगी इस खास समुद्री गलियारे में बेहद सीमित रही है. पाकिस्तान नौसेना का मुख्य ध्यान अपने आसपास के समुद्री क्षेत्र, खासकर उत्तरी अरब सागर और ओमान की खाड़ी पर रहता है. इसलिए बाब-अल-मंदेब में किसी जहाज पर हमला होने की स्थिति में तुरंत कार्रवाई करने की क्षमता मुख्य रूप से दूसरी देशों की नौसेनाओं के पास है.

‘तिहामा’ हमले के बाद पाकिस्तान का रुख

11 अगस्त को ‘तिहामा’ पर हुए मिसाइल हमले के बाद पाकिस्तान के सार्वजनिक बयान ने भी उसकी सीमित मौजूदगी को उजागर किया. पाकिस्तान ने जहाज को गैर-युद्धपोत बताया और घटना की अधिक जानकारी के लिए संबंधित अधिकारियों से जानकारी मांगी. उसने घटना की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करने या मौके पर मौजूद अपनी नौसैनिक क्षमता के आधार पर तत्काल जानकारी देने का दावा नहीं किया.

किसी समुद्री क्षेत्र में लगातार मौजूद रहने वाली नौसेना के पास आमतौर पर वहां होने वाली घटनाओं की प्रत्यक्ष जानकारी और प्रतिक्रिया देने की बेहतर क्षमता होती है. पाकिस्तान की स्थिति इस मामले में अलग नजर आई.

समुद्री संकट का पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर असर

बाब-अल-मंदेब और अदन की खाड़ी में असुरक्षा का असर सिर्फ जहाजों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है. पाकिस्तानी नाविक देश के लिए महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा और रेमिटेंस कमाने में योगदान देते हैं. इसके अलावा इन समुद्री रास्तों से ऊर्जा और दूसरी जरूरी वस्तुओं का व्यापार भी होता है.

अगर इस इलाके में लगातार खतरा बना रहता है, तो जहाजों का बीमा महंगा हो सकता है. चालक दल के सदस्य जोखिम वाले रास्तों पर जाने से बच सकते हैं और व्यापारिक कंपनियां दूसरे लंबे रास्तों का इस्तेमाल कर सकती हैं. इन परिस्थितियों का सीधा असर पाकिस्तान के व्यापार और ऊर्जा लागत पर पड़ सकता है.

पाकिस्तान नौसेना अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम?

हालांकि, इस स्थिति को सीधे पाकिस्तान नौसेना की विफलता कहना सही नहीं होगा. पाकिस्तान की नौसेना का ढांचा मुख्य रूप से अपने आसपास के समुद्री क्षेत्र और भारत से जुड़े सुरक्षा खतरे को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है. सीमित बजट और संसाधनों के बीच बाब-अल-मंदेब से करीब एक हजार किलोमीटर दूर लगातार नौसैनिक मौजूदगी बनाए रखना आसान नहीं है.

असल समस्या यह है कि पाकिस्तान के नागरिक दुनिया के अलग-अलग देशों के झंडे वाले जहाजों पर काम करते हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए पाकिस्तान के पास हर समुद्री क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी नहीं है. ‘ऑपरेशन मुहाफिज-उल-बहर’ पाकिस्तान को अपने निर्धारित दायरे में कार्रवाई करने की क्षमता जरूर दिखाता है, लेकिन यह अभियान विदेशी झंडे वाले जहाजों पर काम कर रहे पाकिस्तानी नागरिकों को हर जगह सुरक्षा देने की क्षमता नहीं दिखाता.

दूसरे देशों की नौसेनाओं पर बनी रहेगी निर्भरता

बाब-अल-मंदेब जैसे संवेदनशील समुद्री गलियारे में जब तक पाकिस्तान अपनी स्वतंत्र नौसैनिक क्षमता नहीं बढ़ाता या मौजूदा अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा व्यवस्था में अपनी भूमिका मजबूत नहीं करता, तब तक उसे दूसरे देशों की नौसेनाओं पर निर्भर रहना पड़ेगा. इसका सीधा संदेश यह है कि पाकिस्तान नौसेना अपने तट और आसपास के समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा करने में सक्षम है, लेकिन उसकी पहुंच हर उस जगह तक नहीं है जहां उसके नागरिक समुद्र में काम कर रहे हैं. ‘तिहामा’ पर हुआ हमला इसी सीमित समुद्री पहुंच की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करता है.