भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में मौसम का मिजाज बदलने वाला है. प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत हो रहा अल नीनो अब वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा रहा है. भारत में 180 से अधिक वैज्ञानिकों और पारिस्थितिकीविदों ने संभावित बेहद मजबूत अल नीनो को देखते हुए शोधकर्ताओं और क्षेत्रीय विशेषज्ञों से तैयारियां तेज करने की अपील की है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस घटना का असर केवल तापमान और बारिश तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि प्राकृतिक प्रणालियों और उन पर निर्भर समुदायों पर भी पड़ सकता है.
प्रशांत महासागर में तेजी से बढ़ रहा तापमान
अल नीनो के दौरान उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक हो जाता है. WMO के अनुसार, अगस्त के मध्य तक नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्री सतह का तापमान सामान्य से करीब 2.6 डिग्री सेल्सियस तक ऊपर पहुंच चुका था. सितंबर-नवंबर 2026 के लिए WMO के मॉडल में इस क्षेत्र का मौसमी औसत तापमान विसंगति करीब 3.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का अनुमान है.
फरवरी 2027 तक रह सकता है असर
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के 3 सितंबर के अपडेट के मुताबिक, मौजूदा अल नीनो आने वाले महीनों में और मजबूत होकर ‘वेरी स्ट्रॉन्ग’ स्थिति में पहुंच सकता है और साल के अंत के आसपास इसकी तीव्रता चरम पर पहुंचने का अनुमान है. WMO के पूर्वानुमानों में फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना करीब 100 प्रतिशत बताई गई है. हालांकि, किसी क्षेत्र में इसके प्रभाव की गंभीरता केवल अल नीनो की ताकत से तय नहीं होती और स्थानीय परिस्थितियां भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं.
भारत की प्रकृति पर पड़ सकता है असर
भारतीय वैज्ञानिकों की अपील में प्राकृतिक प्रणालियों पर संभावित दबाव को लेकर चिंता जताई गई है. वैज्ञानिकों के अनुसार, तेज गर्मी और सूखे जैसी स्थितियां जंगलों में आग का खतरा बढ़ा सकती हैं और प्रवाल भित्तियों समेत संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकते हैं. कृषि, मत्स्य पालन और पशुपालन पर निर्भर समुदायों के सामने भी मौसम में बड़े बदलाव की स्थिति में चुनौतियां बढ़ सकती हैं.
वैज्ञानिकों से असर दर्ज करने की अपील
180 से अधिक वैज्ञानिकों और पारिस्थितिकीविदों ने साथी शोधकर्ताओं और क्षेत्रीय विशेषज्ञों से अल नीनो के दौरान होने वाले बदलावों को व्यवस्थित तरीके से दर्ज करने और उनका अध्ययन करने का आग्रह किया है. अपील में प्राकृतिक और सामाजिक प्रणालियों पर पड़ने वाले प्रभावों की निगरानी बढ़ाने तथा मौजूदा पारिस्थितिकी तंत्रों पर दबाव कम करने की जरूरत बताई गई है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस दौरान जुटाई गई जानकारी भविष्य में बदलती जलवायु परिस्थितियों से निपटने की तैयारी में उपयोगी हो सकती है.
क्या है अल नीनो?
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो एल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन यानी ENSO का एक चरण है. इसमें मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की समुद्री सतह सामान्य से अधिक गर्म हो जाती है. इसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश, तापमान और हवाओं के पैटर्न पर पड़ सकता है. WMO के अनुसार, बहुत मजबूत अल नीनो कई क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी, सूखे और भारी बारिश जैसी चरम मौसमी घटनाओं के जोखिम को बढ़ा सकता है.
कैसे बनती है अल नीनो की स्थिति?
सामान्य परिस्थितियों में भूमध्य रेखा के आसपास चलने वाली व्यापारिक हवाएं गर्म समुद्री पानी को प्रशांत महासागर के पश्चिमी हिस्से की ओर धकेलती हैं. अल नीनो के दौरान इन हवाओं में कमजोरी आती है, जिससे गर्म पानी पूर्व की ओर खिसकता है और मध्य तथा पूर्वी प्रशांत में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ जाता है. यही बदलाव वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करते हुए दुनिया के कई हिस्सों के मौसम के पैटर्न में बदलाव ला सकता है. मौजूदा घटना को देखते हुए WMO ने सरकारों और संबंधित एजेंसियों से शुरुआती चेतावनी और तैयारी पर जोर दिया है.
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