Pakistan Afghanistan Tension: अफगानिस्तान के रिहायशी इलाकों में पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए हवाई हमलों ने 10 मासूमों की जान ले ली है. इनमें 9 बच्चे शामिल हैं, जिनकी उम्र 10 साल से कम बताई जा रही है. सिर्फ कुछ ही साल के ये बच्चे अपने घरों में सुरक्षित रहने की उम्मीद लिए थे, लेकिन अब उनके परिवारों के लिए दुख और शोक का साम्राज्य छा गया है.
हमलों के तुरंत बाद पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने मीडिया के सामने बयान दिया कि अफगानिस्तान में उनकी सेना ने कोई हवाई हमला नहीं किया. उनका यह दावा न केवल घटनास्थल की सच्चाई के विपरीत है, बल्कि इससे यह भी स्पष्ट होता है कि आम नागरिकों को निशाना बनाने की कड़ी आलोचना से बचने के प्रयास किए जा रहे हैं.
उन्होंने कहा, ‘‘जब भी पाकिस्तान किसी पर हमला करता है तो इसकी घोषणा करता है. हमारे दृष्टिकोण में कोई अच्छा या बुरा तालिबान नहीं है.’’ इस बयान को अफगानिस्तान में हुए हमलों में हताहत मासूमों की मौत की सच्चाई से जोड़कर देखा जा रहा है.
पूर्व अनुभव भी गवाही देता है
यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तानी सेना ने इस तरह के हमले और इसके बाद झूठे बयानों का सहारा लिया हो. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के साथ चार दिन चले संघर्ष के समय भी पाकिस्तान ने ड्रोन हमलों के बाद जिम्मेदारी से इनकार किया था. उस समय भी आम नागरिकों की जान चली गई थी, और अब अफगानिस्तान में यही पैटर्न दोहराया गया है.
अदालतों में गूंजेगा सवाल
अफगानिस्तान में यह पाकिस्तानी सेना का पिछले दो महीने में तीसरा हवाई हमला है. इन हमलों में अब तक कुल 71 नागरिक मारे जा चुके हैं. इन हमलों में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के किसी भी बड़े कमांडर को मारने में सफलता नहीं मिली. इस बार, हताहतों में नौ बच्चे और एक बुजुर्ग महिला शामिल हैं. यह घटना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए मानवाधिकार और युद्ध कानूनों पर गंभीर सवाल खड़े करती है.
विश्व समुदाय में बढ़ी चिंता
इन हत्यारोपों ने न केवल अफगानिस्तान में भय और असुरक्षा पैदा की है, बल्कि पाकिस्तान की जिम्मेदारी और पारदर्शिता पर भी गंभीर संदेह बढ़ा दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे हमलों और झूठे बयानों का सिलसिला जारी रहा, तो क्षेत्रीय स्थिरता और मानवाधिकार सुरक्षा दोनों पर गंभीर असर पड़ेगा.
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