पाकिस्तान ने हाल ही में सऊदी अरब के साथ एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके बाद से पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल तेज हो गई है. यह डील ऐसे वक्त में हुई है जब यमन के हूती विद्रोही सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा बने हुए हैं. अब सवाल उठ रहा है—क्या पाकिस्तान इस डील के तहत सऊदी हितों की रक्षा के लिए यमन के हूती विद्रोहियों से सीधी भिड़ंत करेगा?
यमन के हूती विद्रोही बीते एक दशक से सऊदी अरब के लिए सिरदर्द बने हुए हैं. 2013 में यमन की राजधानी सना पर कब्जा करने के बाद उन्होंने सऊदी समर्थित सरकार को उखाड़ फेंका. इसके बाद से सऊदी अरब ने यमन में कई सैन्य अभियान चलाए, लेकिन कोई स्थायी सफलता नहीं मिल सकी. हूती विद्रोही न केवल यमन में सक्रिय हैं, बल्कि उन्होंने सऊदी के तेल प्रतिष्ठानों पर भी हमले किए हैं. माना जाता है कि उन्हें ईरान का सीधा समर्थन प्राप्त है. यही वजह है कि सऊदी उन्हें सिर्फ एक आंतरिक खतरा नहीं, बल्कि ईरान समर्थित एक क्षेत्रीय मोर्चा मानता है.
पाकिस्तान की नई भूमिका और बढ़ते खतरे
सऊदी-पाकिस्तान रक्षा डील के बाद अब यह आशंका जताई जा रही है कि पाकिस्तान, सऊदी के सैन्य हितों की रक्षा के लिए हूतियों के खिलाफ अभियान में शामिल हो सकता है. लेकिन यह कदम पाकिस्तान के लिए आसान नहीं होगा.
1. लाल सागर पर व्यापार को खतरा
हूती विद्रोही इस समय लाल सागर के रणनीतिक जलमार्ग पर दबदबा बनाए हुए हैं. यही रास्ता पाकिस्तान के लिए भी व्यापारिक दृष्टि से बेहद अहम है. पाकिस्तानी व्यापार का एक बड़ा हिस्सा — अनुमानतः 35 लाख करोड़ रुपए का माल इसी मार्ग से होकर गुजरता है. यदि पाकिस्तान हूतियों के खिलाफ किसी सैन्य गठजोड़ में शामिल होता है, तो उसका सीधा असर उसके समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है.
2. ईरान-पाक रिश्तों पर गहरा असर
हूती विद्रोहियों को जिस तरह ईरान का समर्थन हासिल है, वह किसी से छिपा नहीं है. पाकिस्तान और ईरान के बीच लगभग 900 किलोमीटर की सीमाएं जुड़ी हैं. यदि पाकिस्तान हूतियों के खिलाफ किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई करता है या सऊदी के पक्ष में खड़ा होता है, तो ईरान के साथ उसके रिश्ते खटास भरे हो सकते हैं — और यह पाकिस्तान के लिए एक और मोर्चा खोलने जैसा होगा.
हूती: जिनसे अमेरिका और इज़राइल भी सतर्क
हूती विद्रोहियों की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अमेरिका और इज़राइल जैसे ताकतवर देश भी अब उनके सामने सीधी भिड़ंत से बचने लगे हैं. अमेरिका ने इस साल की शुरुआत में हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी, लेकिन जब हूती लड़ाकों ने उसके 50 मिलियन डॉलर के हथियार को निशाना बनाकर गिरा दिया, तो अमेरिका को रणनीति बदलनी पड़ी. वहीं इज़राइल पर हूती लगभग हर दिन मिसाइल हमले कर रहे हैं. इन हमलों से उसकी आर्थिक व्यवस्था तक प्रभावित हुई है—इयालेट पोर्ट पर व्यापार ठप है और रक्षा खर्च में भारी इजाफा हुआ है. इज़राइल अब दुनिया भर से हूतियों से निपटने के लिए सहयोग मांग रहा है.
क्या पाकिस्तान के लिए यह डील फायदे का सौदा है या जोखिम भरा कदम?
विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी के साथ रक्षा समझौता पाकिस्तान को आर्थिक रूप से मजबूत करने वाला कदम हो सकता है, लेकिन इससे उसके कूटनीतिक समीकरण गड़बड़ा सकते हैं. एक ओर जहां पाकिस्तान को अरब दुनिया से आर्थिक राहत की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर उसे ईरान जैसे पड़ोसी के साथ संबंधों को भी संतुलित रखना होगा. यमन के हूती विद्रोहियों से सीधे टकराना पाकिस्तान के लिए केवल एक सैन्य निर्णय नहीं होगा, बल्कि यह एक बहुस्तरीय कूटनीतिक चुनौती बन सकती है.
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