नेपाल एक बार फिर गहरी राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है. बीते सप्ताह राजधानी काठमांडू सहित देश के कई हिस्सों में सरकार विरोधी प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया. हालात तब बिगड़े जब नाराज प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन, सर्वोच्च न्यायालय, प्रधानमंत्री निवास, राष्ट्रपति भवन और प्रमुख राजनीतिक दलों के दफ्तरों को आग के हवाले कर दिया. इस दौरान कई वरिष्ठ नेताओं पर हमले भी किए गए.
स्थिति काबू से बाहर होती देख नेपाली सेना को हस्तक्षेप करना पड़ा, जिसके बाद देश में कुछ हद तक शांति बहाल हो सकी. इसके तुरंत बाद पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की की अध्यक्षता में एक अंतरिम सरकार का गठन किया गया, जो फिलहाल प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रही है.
पुराने दलों का वर्चस्व बरकरार, नई पीढ़ी की मांग अनदेखी
हालांकि सत्ता परिवर्तन की यह कवायद जन आंदोलनों की सफलता मानी जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और बयां करती है. जन-ज़ेनरेशन (Gen-Z) के नेतृत्व में उठी आवाजें देश की राजनीतिक बागडोर पूरी तरह नए नेतृत्व को सौंपे जाने की मांग कर रही हैं. इसके बावजूद नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-यूएमएल और सीपीएन (माओवादी सेंटर) जैसे पुराने दल सत्ता और पद से चिपके हुए हैं. इन दलों का स्पष्ट संकेत है कि वे आगामी वर्ष में प्रस्तावित आम चुनावों में एक बार फिर सत्ता में लौटने की कोशिश करेंगे.
नेपाली कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की रफ्तार बेहद धीमी
देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस में बदलाव की प्रक्रिया लगभग ठप है. महासचिव गगन थापा और विश्व प्रकाश शर्मा ने पार्टी के भीतर सुधार और जनता से सीधा संवाद कायम करने पर जोर दिया है, लेकिन पार्टी अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा अब भी चुप हैं. ज्ञात हो कि देउबा और उनकी पत्नी, विदेश मंत्री आरजू राणा देउबा, पर हालिया हिंसक घटनाओं के दौरान हमला हुआ था. दोनों फिलहाल अस्पताल में भर्ती हैं और इस्तीफे के सवाल पर मौन साधे हुए हैं. इस बीच पार्टी के भीतर उनके उत्तराधिकारी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं.
ओली अज्ञातवास में, पार्टी असमंजस में
सीपीएन-यूएमएल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली घटनाक्रम के बाद से किसी अज्ञात स्थान पर हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं तक को उनके ठिकाने की जानकारी नहीं है. महासचिव शंकर पोखरेल ने कहा है कि नेतृत्व परिवर्तन का प्रश्न “उचित समय” पर उठेगा. हालांकि पार्टी के कुछ नेता जैसे प्रदीप ग्यावली और योगेश भट्टाराई संगठन में आंतरिक सुधार पर बल दे रहे हैं, लेकिन सूत्रों के अनुसार, ओली किसी भी हालत में पार्टी नेतृत्व छोड़ने को तैयार नहीं हैं. उनका मानना है कि पार्टी को उन्होंने ही खड़ा किया है, और वह ही उसे संभाल सकते हैं.
प्रचंड के खिलाफ पार्टी में खुला विद्रोह
सीपीएन (माओवादी सेंटर) के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' को भी अब पार्टी के भीतर विरोध का सामना करना पड़ रहा है. उप महासचिव जनार्दन शर्मा ने सार्वजनिक रूप से उनके इस्तीफे की मांग की है, वहीं अन्य वरिष्ठ नेताओं ने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की आवश्यकता जताई है. फिर भी प्रचंड फिलहाल पद छोड़ने के मूड में नहीं हैं. उन्हें विश्वास है कि आगामी चुनावों में उनकी पार्टी अच्छा प्रदर्शन करेगी और वे सत्ता में लौटेंगे.
आगे की राह कठिन, लेकिन निर्णायक
नेपाल में इस समय जो राजनीतिक परिदृश्य बन रहा है, वह भविष्य के लिए काफी कुछ तय करेगा. एक ओर नई पीढ़ी बदलाव की मांग कर रही है, तो दूसरी ओर पुराने दल सत्ता में बने रहने को लेकर अडिग हैं. ऐसे में आने वाले महीनों में राजनीतिक घटनाक्रम बेहद रोचक और निर्णायक हो सकते हैं.
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