तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच आयोजित दूसरी उच्चस्तरीय राजनीतिक वार्ता लगभग नौ घंटे तक चली. लंबी बैठकों के बावजूद किसी औपचारिक समझौते पर सहमति नहीं बन सकी; फिर भी दोनों पक्षों ने सीमाओं पर तनाव घटाने की सामान्य सहमति जताकर रिश्तों में आई ताजा खटास को अस्थायी रूप से कम करने का संकेत दिया.
वार्ता के मुख्य विवादास्पद मुद्दों में सबसे बड़ा द्वंद्व सीमा पार होने वाली आतंकवादी गतिविधियाँ और तेहरिक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से संबंधित चिंताएँ रहीं. पाकिस्तान ने अफगान पक्ष से उन गतिविधियों पर निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक स्पष्ट वेरीफिकेशन (तपास) तंत्र स्थापित करने की मांग रखी, जिससे आरोप है कि अफगान धरती से पाकिस्तानी सुरक्षा बलों व नागरिकों पर किए जा रहे हमलों को रोका जा सके.
वेरीफिकेशन तंत्र पर अफगान सख्ती
काबुल ने पाकिस्तान द्वारा प्रस्तावित जॉइंट बॉर्डर पेट्रोलिंग (सांझा सीमांत गश्त) को स्वीकार नहीं किया. अफगान प्रतिनिधियों ने यह स्पष्ट किया कि वे अपने क्षेत्र में किसी स्थायी विदेशी सैन्य या पेट्रोलिंग उपस्थिति को मंज़ूर नहीं कर सकते. इसके बावजूद अफगान पक्ष ने खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान के संभावित रूपों पर विचार करने के लिए ‘आपसी सहमति वाले रास्ते’ तलाशने की पहल पर सहमति जताई. यानी, दोनों देशों के बीच सीमित और नियंत्रित तरीके से सूचनाओं के आदान-प्रदान के विकल्प खोले जा सकते हैं, पर वह जॉइंट गश्त जैसा समेकित सैन्य उपाय नहीं होगा.
शरणार्थी वापसी और फंसे ट्रकों का विवाद
बैठक में अफगान शरणार्थियों की वापसी और सीमा पर फंसे व्यापारिक वाहनों का मसला भी प्रमुख रहा. पाकिस्तान ने सीमा पर लगभग 1,200 ट्रकों फंसे रहने का हवाला देते हुए व्यापारिक दबाव और आर्थिक हानि की बात रखी तथा सीमित बॉर्डर खोलने और चरणबद्ध वापसी की रूपरेखा की माँग की. दूसरी ओर अफगान प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी कि यदि शरणार्थियों को जबरन लौटाया गया तो इससे एक मानवीय संकट खड़ा हो सकता है और अफगान अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा. दोनों पक्षों ने इस संवेदनशील मानवीय और आर्थिक मुद्दे के समाधान के लिए तुर्की तथा कतर द्वारा संभावित मध्यस्थता की भूमिका स्वीकार की. रिपोर्टों में संकेत दे दिए गए हैं कि तुर्की और कतर एक संयुक्त ट्रेड-एंड-सेक्योरिटी टास्क ग्रुप बनाने की पहल कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य धीरे-धीरे व्यापार बहाली और सुरक्षा गारंटी सुनिश्चित करना है.
युद्ध छोड़कर कोई विकल्प नहीं- आसिफ
वार्ता से ठीक पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने सार्वजनिक रूप से कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यदि वार्ता नाकाम रही तो पाकिस्तान के पास “खुले युद्ध” को छोड़कर कोई विकल्प नहीं बचेगा. उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल दोनों पक्ष दोहा में हुए युद्धविराम का पालन कर रहे हैं, पर यदि आचरण में बदलाव हुआ और सीमापार हमले जारी रहे तो सैन्य विकल्पों पर विचार किया जा सकता है.
इन धमकियों के बावजूद अफगान पक्ष, जिसमें तालिबान सरकार के प्रतिनिधि भी शामिल थे, ने सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान के आदेशानुशासन को स्वीकार करने से इन्कार किया. तालिबान सूत्रों ने बातचीत को “बराबरी के स्तर पर” होने वाला संवाद बताया और पाकिस्तान के आरोपों को “राजनीतिक प्रेरित” करार दिया. उन्होंने यह भी दोहराया कि अफगान इलाके में किसी पाकिस्तानी आतंकी को आधिकारिक तौर पर पनाह नहीं दी गई है और यदि पाकिस्तान ने सीमा पार कार्रवाई की तो उसे अफगानिस्तान पर हमला समझ कर उत्तर दिया जाएगा.
बातचीत के निहितार्थ और आगे का मार्ग
यानि कुल मिलाकर इस्तांबुल बैठक ने शांति के लिए इच्छाशक्ति का संकेत जरूर दिया लेकिन ठोस समझौतों और लागू होने योग्य संयंत्रों पर दोनों पक्षों के बीच अंतर बना रहा. भविष्य के कुछ संभावित परिणाम और चुनौतियाँ इस प्रकार हो सकती हैं:
तथ्य-आधारित साझेदारी पर निश्चय: पाकिस्तान का वेरीफिकेशन तंत्र की माँग और अफगानिस्तान का इससे इनकार यह दर्शाता है कि दोनों देशों के पास सीमाओं पर भूमिका और संप्रभुता की व्याख्या अलग-अलग है. अतः कोई भी स्थायी परिपथ तभी बन सकता है जब दोनों पक्ष सीमांत निगरानी के गैर-सैन्य, पारदर्शी और समय-सीमित तौर-तरीकों पर सचमुच सहमत हों.
टास्क ग्रुप एवं मध्यस्थता की भूमिका: तुर्की और कतर द्वारा प्रस्तावित ट्रेड-एंड-सेक्योरिटी टैस्क ग्रुप यदि बना और सक्रिय हुआ तो यह व्यापार बहाली व मानवीय मुद्दों को हल करने में एक मध्यवर्ती समाधान दे सकता है, बशर्ते दोनों देशों की राष्ट्रीय चिंताओं का समुचित ध्यान रखा जाए.
सैन्य विकल्पों की धमकियों का जोखिम: पाकिस्तान के सार्वजनिक कट्टर वक्तव्य और युद्ध के संकेतों से क्षेत्रीय अस्थिरता की आशंका बढ़ती है; ऐसे वक्तव्यों से हर हाल में सैनिक गतिशीलता और बार-बार की गश्तों में वृद्धि हो सकती है, जो दुर्घटनागत झड़पों का कारण बन सकती है.
खुफिया-साझा ही फिलहाल व्यवहार्य विकल्प: दोनों पक्षों ने जॉइंट पेट्रोलिंग से इनकार के बावजूद खुफिया-साझा करने जैसे सीमित उपायों पर विचार करने की सहमति जताई, यथार्थवादी रूप से यही सबसे व्यवहारिक और संवेदनशील समाधान बनकर उभरता दिख रहा है.
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