Netanyahu Pardon: इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने रविवार को राष्ट्रपति आइज़ैक हर्ज़ोग के पास 111 पन्नों का विस्तृत माफी आवेदन जमा किया है. यह दस्तावेज़ उनके खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार मामलों से राहत दिलाने की कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है. अब फैसला राष्ट्रपति के हाथ में है लेकिन प्रक्रिया उतनी सीधी नहीं है जितनी दिखाई देती है. नेतन्याहू के पूर्व वकील की एक टिप्पणी ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है और संकेत दिया है कि प्रधानमंत्री को क्षमादान मिलना आसान नहीं होगा.
इजरायल का राष्ट्रपति पद ज्यादातर औपचारिक होता है. सरकार संचालन, कानून बनाने या राष्ट्रीय नीतियों पर उनका कोई प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होता. लेकिन एक क्षेत्र ऐसा है जहाँ राष्ट्रपति की शक्ति पूरी तरह स्वतंत्र और अत्यंत प्रभावशाली है, माफी और दंड में राहत का अधिकार.
राष्ट्रपति चाहे तो किसी भी अपराधी की सजा पूरी तरह समाप्त कर सकते हैं, उसे कम कर सकते हैं या उसमें बदलाव कर सकते हैं. इस फैसले में वे न तो प्रधानमंत्री से बंधे होते हैं और न ही कैबिनेट की मंजूरी की जरूरत होती है. हालांकि, परंपरा के अनुसार न्याय मंत्रालय एक समिति के माध्यम से राय देता है, जिसे राष्ट्रपति देखता है परंतु अंतिम निर्णय सिर्फ उन्हीं का होता है.
“किसी ऐसे व्यक्ति को माफी नहीं दी जा सकती जो अपराध मानता ही नहीं”
नेतन्याहू की माफी याचिका पर जो सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ है वह उनके पूर्व वकील मिकाह फेटमैन के बयान से. इजरायली चैनल 12 से बातचीत में फेटमैन ने कहा, “कानून के मुताबिक माफी उसी अपराधी को दी जाती है, जो अपना गुनाह स्वीकार करे. बिना स्वीकारोक्ति माफी नहीं होती.” यही बात अब नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई है.
प्रधानमंत्री पर इन गंभीर आरोपों में मुकदमे चल रहे हैं:
लेकिन उन्होंने अब तक एक भी आरोप नहीं माना है. जब तक वे यह नहीं स्वीकार करते कि उन्होंने गलती की है, तब तक राष्ट्रपति पर कानूनी तौर पर माफी देने का दबाव नहीं बनाया जा सकता.
ऐतिहासिक मिसाल भी नेतन्याहू के खिलाफ जाती है
इजरायल में माफी का इतिहास बहुत छोटा और बेहद कड़ा है. इसका सबसे उल्लेखनीय उदाहरण “बस 300 मामला” (1984) है. इसमें शिन बेट के एजेंटों ने दो फिलिस्तीनियों की हत्या की, फिर झूठ बोला. तत्कालीन राष्ट्रपति चैम हर्ज़ोग, जो मौजूदा राष्ट्रपति आइज़ैक हर्ज़ोग के पिता थे, ने तभी माफी दी थी जब दोषियों ने अपराध सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया था.
उस वक्त हाई कोर्ट ने भी यह स्पष्ट कहा था, “बिना अपराध स्वीकार किए किसी को माफी का अधिकार नहीं.” यही कसौटी आज नेतन्याहू पर भी लागू होती है, इसलिए मामला और पेचीदा हो गया है.
“अगर PM को बरी किया गया तो न्यायपालिका बेमानी हो जाएगी”
इजरायली विपक्ष ने नेतन्याहू की माफी मांग को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया है. ‘द टाइम्स ऑफ इज़रायल’ के अनुसार विपक्षी नेता यैर लापिद ने कहा, “अगर कोई आम नागरिक बिना अपराध स्वीकार किए माफी नहीं पा सकता, तो प्रधानमंत्री को यह विशेषाधिकार क्यों?”
उनका कहना है कि नेतन्याहू को माफी दे दी गई तो देश में दो तरह का कानून लागू हो जाएगा, एक जनता के लिए और एक सत्ता में बैठे व्यक्ति के लिए. विपक्ष इसे न्यायिक व्यवस्था पर सीधा हमला बता रहा है.
“मामला राजनीतिक बदला है”
दूसरी तरफ, नेतन्याहू के समर्थक पूरी प्रक्रिया को “राजनीतिक चुड़ैल-शिकार” बताते हैं. उनका तर्क है कि भ्रष्टाचार के ये केस राजनीतिक विरोधियों और न्यायपालिका के कुछ वर्गों ने मिलकर तैयार किए हैं. उनके अनुसार, देश निरंतर अस्थिरता से गुजर रहा है और नेतन्याहू पर चल रही कानूनी लड़ाई खत्म करना राष्ट्रीय हित में होगा. लेकिन आलोचकों का कहना है कि सत्ता का दुरुपयोग रोकने के लिए कानून सब पर बराबर लागू होना चाहिए, यहां तक कि प्रधानमंत्री पर भी.
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