इस्लामाबाद: पाकिस्तान सरकार और सेना के लिए बलूचिस्तान लगातार बड़ी चुनौती बना हुआ है. बलूच विद्रोहियों की गतिविधियों के बीच अब ग्वादर को लेकर भी विवाद बढ़ता दिख रहा है. ग्वादर बलूचिस्तान का बेहद अहम इलाका है, जहां चीन ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के तहत अरबों डॉलर का निवेश किया है.
चीन ग्वादर के जरिए अरब सागर तक अपनी सीधी पहुंच मजबूत करना चाहता है. वहीं पाकिस्तान इस बंदरगाह को बड़े व्यापारिक केंद्र के तौर पर विकसित करने की कोशिश कर रहा है. अब ऐसी चर्चा है कि सरकार ग्वादर को बलूचिस्तान सरकार के बजाय सीधे इस्लामाबाद के नियंत्रण में लाने की तैयारी कर रही है. इस खबर के बाद स्थानीय स्तर पर विरोध शुरू हो गया है.
ग्वादर को लेकर दी गई चेतावनी
जमात-ए-इस्लामी बलूचिस्तान के प्रमुख मौलाना हिदायतुर रहमान ने रविवार को चेतावनी दी कि अगर ग्वादर को शहबाज शरीफ सरकार के सीधे नियंत्रण में लाने की कोशिश हुई तो स्थानीय लोग इसका विरोध करेंगे.
ग्वादर में पत्रकारों से बातचीत में रहमान ने कहा कि सोशल मीडिया पर नए प्रांत बनाने और कुछ इलाकों को संघीय क्षेत्र घोषित करने की चर्चा चल रही है. उनका आरोप है कि यह चर्चा सेना की ओर से कराई जा रही है, ताकि लोगों की प्रतिक्रिया का अंदाजा लगाया जा सके.
बलूचिस्तान में सेना के खिलाफ बढ़ सकता है विरोध
रहमान ने पाकिस्तान की मौजूदा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि संसद मौजूद होने के बावजूद देश में तानाशाही जैसा माहौल है. उनके मुताबिक, राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर संसद में चर्चा करने के बजाय दूसरे तरीकों से फैसले लिए जा रहे हैं.
उन्होंने कहा कि अगर ग्वादर को लेकर सेना ने कोई जबरन फैसला लिया तो बलूचिस्तान की राजनीतिक ताकतें और स्थानीय लोग इसका विरोध करेंगे. रहमान ने यह भी कहा कि ग्वादर के लोग बंदूक के दम पर थोपे गए किसी भी फैसले को स्वीकार नहीं करेंगे.
उन्होंने बलूचिस्तान में बड़ी संख्या में सैन्य चौकियां बनाए जाने की भी आलोचना की. रहमान का कहना है कि इन चौकियों से लोगों को सुरक्षा मिलने के बजाय उनके साथ परेशानी बढ़ी है. उन्होंने कहा कि अगर उन्हें एक दिन के लिए भी बलूचिस्तान का मुख्यमंत्री बनाया गया तो 24 घंटे के अंदर गैर-जरूरी सैन्य चौकियां हटा दी जाएंगी.
ग्वादर से चीन को कितना फायदा?
ग्वादर बंदरगाह चीन के लिए बेहद अहम परियोजना है. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के तहत इसे विकसित किया जा रहा है. दावा है कि बंदरगाह से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा चीन को मिलेगा, जबकि पाकिस्तान को काफी कम हिस्सा मिलेगा.
यही वजह है कि बलूच संगठनों की ओर से चीन की मौजूदगी का लगातार विरोध किया जाता रहा है. बलूच समूहों का आरोप है कि चीन इलाके के खनिज संसाधनों का फायदा उठा रहा है, जबकि स्थानीय लोगों को इसका लाभ नहीं मिल रहा.
चीनी नागरिकों पर भी हुए हमले
बलूच विद्रोही संगठन पहले भी चीन के नागरिकों और परियोजनाओं को निशाना बना चुके हैं. उनका कहना है कि अगर चीन बलूचिस्तान में अपनी मौजूदगी बढ़ाता है तो उसे आगे भी हमलों का सामना करना पड़ सकता है.
पाकिस्तान सरकार ने बलूच विद्रोहियों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश भी की है. इसी कड़ी में अमेरिका से भी सहयोग मांगा गया है. वहीं, आलोचकों का आरोप है कि ग्वादर पर नियंत्रण बढ़ाने और प्रशासनिक बदलाव की कोशिशों के पीछे सेना और चीन के हित जुड़े हुए हैं.
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