इस्लामाबाद/तेल अवीव/वॉशिंगटन: दुनिया भर में परमाणु हथियारों के प्रसार को लेकर सतर्क इज़रायल ने वर्ष 2000 के आसपास एक ऐसा गुप्त ऑपरेशन तैयार किया था, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति का रुख ही बदल सकता था. इस मिशन का निशाना था- पाकिस्तान के मशहूर परमाणु वैज्ञानिक डॉ. अब्दुल कादिर खान, जिन्हें आमतौर पर ए.क्यू. खान के नाम से जाना जाता है. लेकिन अमेरिका के हस्तक्षेप के कारण यह मिशन अंजाम तक नहीं पहुंच पाया.
सूत्रों के अनुसार, इस योजना के पीछे इज़रायली खुफिया एजेंसी मोसाद थी, जिसने एक स्पेशल यूनिट ‘किडोन’ को इस कार्य के लिए तैयार किया था. हिब्रू भाषा में ‘किडोन’ का अर्थ होता है “भाला” यानी एक ऐसा हथियार जो लक्ष्य को सीधा भेदे. यही टीम इज़रायल के सबसे संवेदनशील और घातक गुप्त ऑपरेशनों को अंजाम देने के लिए जानी जाती है.
मिशन का उद्देश्य: परमाणु प्रसार को रोकना
इस ऑपरेशन के पीछे मुख्य चिंता यह थी कि डॉ. ए.क्यू. खान कथित तौर पर अपने परमाणु ज्ञान और तकनीक को उन देशों के साथ साझा कर रहे थे, जिन्हें इज़रायल अपने लिए खतरा मानता था — खासकर ईरान. इज़रायल को आशंका थी कि खान ईरान को परमाणु हथियार बनाने में सहायता दे सकते हैं, और यह पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है.
पूर्व मोसाद प्रमुख शब्ताई शावित ने वर्ष 2023 में दिए एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि उन्होंने इस मिशन को हरी झंडी देने की योजना बनाई थी. उनका कहना था, "अगर हमें खान के इरादों की पूरी जानकारी होती, तो मैं अपने कमांडरों को आदेश देता कि उसे खत्म कर दें. मुझे लगता है इससे इतिहास की दिशा बदल सकती थी."
मोसाद का प्लान: विदेशी दौरे में हमले की योजना
रिपोर्टों के अनुसार, मोसाद की योजना थी कि जब डॉ. ए.क्यू. खान किसी दक्षिण एशियाई देश के दौरे पर हों, उस दौरान उन्हें रास्ते से हटा दिया जाए. एक प्रशिक्षित एजेंट की टीम, जो विशेष रूप से इस मिशन के लिए तैयार की गई थी, उनके हर मूवमेंट पर नज़र रख रही थी.
इस दौरान एजेंटों को उच्च स्तरीय प्रशिक्षण, भाषा कौशल, स्थानीय सांस्कृतिक समझ और सटीक ऑपरेशन स्किल्स दिए गए ताकि वह बिना किसी संदेह के मिशन को अंजाम दे सकें.
प्रोपब्लिका की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मिशन उस स्तर का था जैसा मोसाद ने पहले कई बार अपने दुश्मनों के खिलाफ किया है, जैसे इज़रायल-विरोधी आतंकियों या ईरान के वैज्ञानिकों को चुपचाप खत्म कर देना.
इज़रायल की चिंता: ईरान और परमाणु बम
इज़रायल लंबे समय से यह आशंका जताता रहा है कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएं सिर्फ ऊर्जा के लिए नहीं हैं, बल्कि उसका उद्देश्य परमाणु हथियार बनाना है. अतीत में इज़रायल कई बार ईरानी वैज्ञानिकों को लक्षित कर चुका है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, केवल 2025 के जून माह में ही इज़रायल ने कथित तौर पर 20 से अधिक ईरानी वैज्ञानिकों को मार गिराया.
डॉ. खान के खिलाफ कार्रवाई की योजना इसी रणनीतिक सोच का हिस्सा थी, जिससे इज़रायल किसी भी संभावित परमाणु प्रसार को रोकना चाहता था, खासकर उन देशों में जो उसके अस्तित्व के लिए खतरा माने जाते हैं.
अमेरिकी हस्तक्षेप से कैसे रुका मिशन?
हालांकि, मोसाद का यह खतरनाक ऑपरेशन अंजाम तक नहीं पहुंच पाया, और इसका कारण था — अमेरिका का दबाव. जब यह जानकारी सामने आई कि मोसाद किसी विदेशी दौरे के दौरान डॉ. खान की हत्या की योजना बना रहा है, तब अमेरिका सतर्क हो गया.
उस समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को आश्वासन दिया कि वह डॉ. खान को नियंत्रित करेंगे. मुशर्रफ़ ने भरोसा दिलाया कि डॉ. खान किसी अन्य देश को परमाणु तकनीक नहीं देंगे और उनके ऊपर कड़ी निगरानी रखी जाएगी.
इस राजनयिक आश्वासन के बाद, अमेरिका ने इज़रायल से इस ऑपरेशन को रद्द करने की अपील की. वैश्विक सामरिक संतुलन और कूटनीतिक तनाव को देखते हुए, मोसाद को अपना मिशन स्थगित करना पड़ा हालांकि यह उनके इतिहास के सबसे साहसी और संवेदनशील मिशनों में से एक माना जाता है.
मोसाद की उलझन: रोकना था या अंजाम देना?
एक वरिष्ठ मोसाद अधिकारी ने बाद में कहा था कि इस मिशन को रोकना उनके लिए "आसान निर्णय" नहीं था. उनका मानना था कि अगर डॉ. खान को उस समय खत्म कर दिया जाता, तो दुनिया में परमाणु प्रसार की तस्वीर कुछ और होती. लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति, अमेरिका के साथ संबंध, और कूटनीतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए इस ऑपरेशन को स्थगित करना पड़ा.
ए.क्यू. खान का विवादास्पद इतिहास
डॉ. अब्दुल कादिर खान को पाकिस्तान के "परमाणु कार्यक्रम का जनक" माना जाता है. उन्होंने पाकिस्तान को परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बनाने में अहम भूमिका निभाई. लेकिन 2004 में उन्होंने यह स्वीकार किया कि उन्होंने ईरान, उत्तर कोरिया और लीबिया जैसे देशों को परमाणु तकनीक साझा की थी भले ही उन्होंने कहा कि यह काम उन्होंने अपनी निजी इच्छा से किया था, न कि सरकार के निर्देश पर.
बाद में उन्हें नजरबंद कर दिया गया और कई वर्षों तक सार्वजनिक जीवन से दूर रखा गया. हालांकि, पाकिस्तान में उन्हें अभी भी एक राष्ट्रीय नायक की तरह देखा जाता है.
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