अंग्रेजी रटकर अमेरिकी नागरिकों को फंसाते थे जालसाज, ऐसे चलता था फ्रॉड का खेल, 2 अरब की साइबर ठगी का खुलासा

Lucknow News: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जिसने यह साबित कर दिया कि साइबर अपराध केवल हाईटेक तकनीक का खेल नहीं, बल्कि सुनियोजित मनोवैज्ञानिक जाल भी है.

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Lucknow News: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जिसने यह साबित कर दिया कि साइबर अपराध केवल हाईटेक तकनीक का खेल नहीं, बल्कि सुनियोजित मनोवैज्ञानिक जाल भी है. गोमतीनगर विस्तार के एक पॉश रिहायशी अपार्टमेंट में चल रहे इस फर्जी कॉल सेंटर से अमेरिकी नागरिकों को डिजिटल अरेस्ट, सिस्टम हैकिंग और नागरिकता रद्द होने का डर दिखाकर करोड़ों रुपये की ठगी की जा रही थी. हैरानी की बात यह है कि इस पूरे नेटवर्क को चलाने वाले अधिकांश आरोपी ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उन्हें विदेशी लोगों को ठगने के लिए ऐसी ट्रेनिंग दी गई थी कि वे अंग्रेजी में धाराप्रवाह बातचीत करते हुए खुद को अमेरिकी एजेंसियों का अधिकारी साबित कर देते थे. पुलिस की कार्रवाई के बाद इस हाई-प्रोफाइल साइबर रैकेट की कई परतें खुलने लगी हैं.

पॉश अपार्टमेंट बना साइबर फ्रॉड का अड्डा

उत्तर प्रदेश पुलिस की क्राइम ब्रांच और साइबर सेल ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए गोमतीनगर विस्तार स्थित ओमेक्स आर-2 रेजिडेंशियल अपार्टमेंट में छापेमारी की. जांच के दौरान पता चला कि यहां एक फ्लैट को अत्याधुनिक फर्जी कॉल सेंटर में बदल दिया गया था. बाहर से यह एक सामान्य रिहायशी फ्लैट दिखाई देता था, लेकिन अंदर विदेशी नागरिकों को निशाना बनाने वाला पूरा साइबर ऑपरेशन संचालित हो रहा था. पुलिस ने मौके से गिरोह के मास्टरमाइंड समेत सात आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.

कम पढ़े-लिखे कर्मचारियों को हिंदी में रटाई जाती थी अंग्रेजी

इस गिरोह की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि गिरफ्तार अधिकांश आरोपी केवल सातवीं से दसवीं कक्षा तक पढ़े हुए हैं. अंग्रेजी में कमजोर होने के बावजूद इन्हें विदेशी नागरिकों से बातचीत कराने के लिए अलग तरीका अपनाया गया था. कॉल करने से पहले अंग्रेजी के पूरे संवाद हिंदी लिपि में लिखकर दिए जाते थे, जिन्हें कर्मचारी घंटों अभ्यास करके याद करते थे. इसी वजह से बातचीत के दौरान वे अमेरिकी नागरिकों को शक होने का मौका नहीं देते थे. कॉल सेंटर पूरी तरह अमेरिकी समय के अनुसार रात में संचालित किया जाता था ताकि वहां के लोगों से आसानी से संपर्क किया जा सके.

अमेरिकी नागरिकों को दिखाते थे ये डर

डीसीपी अपराध अनिल कुमार यादव के अनुसार, गिरोह पहले अमेरिका में मौजूद अपने एजेंटों की मदद से लोगों के मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी और अन्य निजी जानकारियां जुटाता था. इसके बाद उन्हें ऐसे ईमेल और पॉप-अप संदेश भेजे जाते थे जिनमें दावा किया जाता था कि उनके कंप्यूटर में खतरनाक वायरस आ गया है, उनका सिस्टम हैक हो चुका है या फिर उनकी अमेरिकी नागरिकता खतरे में है.

जब घबराए हुए लोग दिए गए नंबर पर संपर्क करते थे, तब कॉल सेंटर के कर्मचारी खुद को अमेरिकी फेडरल एजेंसियों या सुरक्षा विभाग का अधिकारी बताकर उनसे बातचीत करते थे. डर और दबाव का माहौल बनाकर पीड़ितों से मोटी रकम वसूल ली जाती थी.

ऐसे होती थी वसूली

जांच में सामने आया कि आरोपी बैंक ट्रांसफर से बचने के लिए गिफ्ट कार्ड, क्रिप्टोकरेंसी और हवाला नेटवर्क का इस्तेमाल करते थे. इससे लेनदेन का पता लगाना बेहद मुश्किल हो जाता था. इसी वजह से यह गिरोह लंबे समय तक पुलिस और जांच एजेंसियों की नजरों से बचा रहा.

दो अरब रुपये से ज्यादा का फ्रॉड

छापेमारी के दौरान पुलिस ने कॉल सेंटर से बरामद लैपटॉप और अन्य डिजिटल उपकरणों की फॉरेंसिक जांच कराई. शुरुआती जांच में पता चला कि गिरोह हर दिन लगभग 10 से 12 अमेरिकी नागरिकों को अपना शिकार बना रहा था.

जांच के दौरान एक ऐसा रिकॉर्ड भी मिला जिसमें हाल ही में एक अमेरिकी नागरिक से करीब 70 हजार डॉलर यानी लगभग 70 लाख रुपये की ठगी की गई थी. शुरुआती जांच के अनुसार पिछले छह महीनों में इस नेटवर्क ने दो अरब रुपये से अधिक की अवैध ट्रांजैक्शन और साइबर ठगी को अंजाम दिया है. पुलिस अब इन वित्तीय लेनदेन की विस्तृत जांच कर रही है.

गुजरात से संचालित हो रहा था पूरा नेटवर्क

पुलिस के अनुसार इस साइबर गिरोह का मुख्य आरोपी पुनीत कुमार वर्मा गुजरात के अहमदाबाद का निवासी है. जांच में यह भी सामने आया कि उसका बड़ा भाई यशचंद्र प्रकाश वर्मा अहमदाबाद से पूरे नेटवर्क को संचालित कर रहा था. उसके अमेरिका में भी कई एजेंट सक्रिय बताए जा रहे हैं, जो संभावित शिकारों की जानकारी जुटाने का काम करते थे. यानी लखनऊ का कॉल सेंटर इस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का केवल एक ऑपरेशन सेंटर था, जबकि इसकी कमान दूसरे राज्यों और विदेशों तक फैली हुई थी.

फर्जी दस्तावेजों के सहारे लिया गया था फ्लैट

पुलिस जांच में यह भी खुलासा हुआ कि पुनीत कुमार वर्मा ने ओमेक्स अपार्टमेंट में फ्लैट किराए पर लेने के लिए नकली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया था. रेंट एग्रीमेंट से लेकर पुलिस वेरिफिकेशन फॉर्म तक में दर्ज पते फर्जी पाए गए हैं. अब पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इन दस्तावेजों को तैयार करने में किन लोगों की भूमिका रही.

गुजरात और पश्चिम बंगाल के सात आरोपी गिरफ्तार

गिरफ्तार किए गए सातों आरोपी अलग-अलग राज्यों से जुड़े हुए हैं. इनमें गुजरात के अहमदाबाद निवासी पुनीत कुमार वर्मा और दीपेन चंद्रकांत पटेल शामिल हैं. इसके अलावा पश्चिम बंगाल के कोलकाता और उत्तर 24 परगना जिले के रहने वाले मोहम्मद सोहेल, मोहम्मद शाहनवाज आलम, मोहम्मद इमरान, मोहम्मद रियाज और सज्जाद हुसैन उर्फ सरफराज को भी गिरफ्तार किया गया है. पुलिस का मानना है कि इस गिरोह में शामिल अन्य लोगों की पहचान भी जल्द सामने आ सकती है.

हाईटेक उपकरणों से लैस था पूरा सेटअप

छापेमारी के दौरान पुलिस ने फ्लैट से बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए. इनमें आठ आधुनिक लैपटॉप, नौ स्मार्टफोन, चार हाई-स्पीड इंटरनेट राउटर, नौ हेडफोन, पांच लैपटॉप चार्जर, दो कंप्यूटर माउस और कई डेटा केबल शामिल हैं. इन सभी उपकरणों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है ताकि नेटवर्क के अन्य सदस्यों और विदेशी कनेक्शन का पता लगाया जा सके.

जांच में खुल सकते हैं और बड़े खुलासे

पुलिस का मानना है कि यह केवल एक कॉल सेंटर का मामला नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले साइबर अपराध नेटवर्क की एक बड़ी कड़ी है. डिजिटल डिवाइस, बैंकिंग ट्रेल, क्रिप्टो ट्रांजैक्शन और विदेशी एजेंटों से जुड़े इनपुट की जांच जारी है. आने वाले दिनों में इस नेटवर्क से जुड़े और कई नाम सामने आने की संभावना जताई जा रही है.

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