India America Defence Deal: भारत और अमेरिका ने रक्षा सहयोग के नए युग की शुरुआत कर दी है. मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में हुई मुलाकात के दौरान भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने एक 10 साल की रणनीतिक रक्षा डील पर हस्ताक्षर किए हैं. यह समझौता न केवल दोनों देशों के बीच सैन्य साझेदारी को नई दिशा देगा, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन को भी गहराई से प्रभावित करेगा.
नई डिफेंस डील भारत-अमेरिका के बीच अब तक की सबसे व्यापक और दीर्घकालिक सुरक्षा साझेदारी मानी जा रही है. समझौते के तहत दोनों देश आने वाले दशक तक रक्षा क्षेत्र में तकनीकी, रणनीतिक और औद्योगिक सहयोग को बढ़ावा देंगे.
इस समझौते में कुछ प्रमुख बिंदु शामिल हैं:
भारत को क्या मिलेगा इस समझौते से?
यह डील भारत के लिए ‘गेम चेंजर’ साबित हो सकती है. इससे न केवल भारत को अत्याधुनिक अमेरिकी रक्षा तकनीक तक पहुंच मिलेगी, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा उद्योग को भी नई मजबूती मिलेगी.
अमेरिका भारत को जिन उन्नत हथियार प्रणालियों तक पहुंच दे रहा है, उनमें शामिल हैं:
इनके अलावा भारत पहले से ही C-130J Super Hercules, C-17 Globemaster III, P-8I Poseidon, CH-47F Chinook, MH-60R Sea Hawk, और AH-64E Apache जैसे अमेरिकी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहा है. अब इस साझेदारी से भारत को MQ-9B Sky Guardian ड्रोन और M777 हॉवित्जर तोपों जैसे सिस्टम्स में और उन्नत तकनीक मिलेगी.
इंडो-पैसिफिक में मजबूत होगा भारत-अमेरिका का दबदबा
अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने कहा कि भारत और अमेरिका दोनों देश क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों को गहराई से समझते हैं और साथ मिलकर उनका सामना करने की क्षमता रखते हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक तकनीक और संसाधन देने के लिए तैयार है.
वहीं, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा, “भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी आज हमारे द्विपक्षीय संबंधों का सबसे मजबूत स्तंभ है. यह केवल साझा हितों पर आधारित नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों और क्षमताओं की साझी समझ पर टिकी है.”
कूटनीतिक और सामरिक दृष्टि से बड़ा कदम
विशेषज्ञों के अनुसार, यह डील भारत को वैश्विक रक्षा मंच पर ‘टेक्नोलॉजिकल इक्विलाइजर’ की भूमिका में लाएगी. जहाँ भारत अपनी आत्मनिर्भर रक्षा नीति (Aatmanirbhar Bharat in Defence) को मजबूत करेगा, वहीं अमेरिका के लिए यह साझेदारी चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने का एक अहम साधन बनेगी.
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