इस्लामाबाद: तुर्की और चीन के विमानों ने पिछले महीने पाकिस्तान में लगातार करीब 60 घंटे तक कई चक्कर लगाए थे. अब सामने आया है कि तुर्की के विमान पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर Baykar K2 ड्रोन लेकर पहुंचे थे. पाकिस्तान ने तुर्की के लंबी दूरी तक हमला करने वाले K2 कामिकेज ड्रोन को अपने बेड़े में शामिल कर लिया है. इसके साथ ही पाकिस्तान इस ड्रोन को अपने बेड़े में शामिल करने वाला पहला देश बन गया है. यह ड्रोन ईरान के शाहेद ड्रोन जैसा बताया जाता है, लेकिन शाहेद के मुकाबले यह ज्यादा भारी हथियार ले जा सकता है.
करीब 2,000 किलोमीटर की रेंज होने की वजह से यह ड्रोन भारत के लिए चिंता का कारण बन सकता है. इससे पाकिस्तान भारत के काफी अंदर तक लंबी दूरी से हमला करने की क्षमता हासिल कर सकता है. इससे पहले ईरान के शाहेद ड्रोन ने भी अमेरिका और इजरायल की वायु रक्षा प्रणालियों के सामने चुनौती खड़ी की है.
पाकिस्तान को मिले 2,000 किमी रेंज वाले K2 ड्रोन
अभी यह जानकारी सामने नहीं आई है कि पाकिस्तान को कितने K2 ड्रोन मिले हैं. इस सौदे की कीमत और पूरी शर्तें भी साफ नहीं हैं. इसलिए अभी यह तय करना मुश्किल है कि यह पाकिस्तान की नई बड़ी सैन्य क्षमता है या फिर तुर्की की ओर से सिर्फ एक रणनीतिक संदेश. फिलहाल यह भी पता नहीं है कि तुर्की ने पाकिस्तान को कितने ड्रोन दिए हैं.
फिर भी अगर पाकिस्तान को इन ड्रोन की सीमित संख्या भी मिलती है तो उसकी बिना पायलट वाले विमानों से हमला करने की क्षमता काफी बढ़ सकती है. इससे पाकिस्तानी सेना एयरबेस, कमांड सेंटर, सामान पहुंचाने वाले केंद्र, रडार और दूसरे अहम ठिकानों को लंबी दूरी से निशाना बना सकती है.
भारत के लिए कितना खतरनाक है K2 ड्रोन?
भारत के लिए यह ड्रोन एक नई चुनौती बन सकता है. कम गति से और कम ऊंचाई पर उड़ने वाला बड़ा ड्रोन बैलिस्टिक मिसाइल की तुलना में कम खतरनाक लग सकता है, लेकिन अगर एक साथ कई ड्रोन भेजे जाएं तो वे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों और दूसरे जरूरी बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकते हैं. ऐसे हमलों में खतरे को समय रहते पहचानना भी मुश्किल हो सकता है.
पाकिस्तान के लिए K2 की ताकत तब और बढ़ सकती है, जब इसे पहले से मौजूद बायराकटार टीबी2 और अकिंची जैसे ड्रोन के साथ इस्तेमाल किया जाए. इन ड्रोन को एक साथ इस्तेमाल करने से निगरानी, लक्ष्य की पहचान, जानकारी जुटाने और हमला करने की क्षमता मजबूत हो सकती है.
भारत के सामने बड़ी चुनौती कम ऊंचाई पर धीरे-धीरे उड़ने वाले ऐसे ड्रोन का समय पर पता लगाने की होगी. इसके लिए लड़ाकू विमानों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, तोपों, कम दूरी की मिसाइलों और हवाई निगरानी को जोड़कर मजबूत ड्रोन रोधी सुरक्षा तंत्र तैयार करना जरूरी होगा.
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