Iran Deal Protest: अमेरिका और ईरान के बीच चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक बड़े समझौते का ऐलान किया गया है. इस समझौते को मध्य पूर्व में स्थिरता और शांति की उम्मीद के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन ईरान के भीतर इसकी प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं है. जहां सरकार इसे आर्थिक राहत और कूटनीतिक सफलता के रूप में पेश कर रही है, वहीं देश के कट्टरपंथी गुट इसे राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता बता रहे हैं. समझौते की घोषणा से पहले ही तेहरान की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जिसने यह साफ कर दिया कि इस मुद्दे पर ईरानी समाज और राजनीतिक वर्ग के बीच गहरी मतभेद मौजूद हैं.
समझौते से पहले ही सड़कों पर उतरे विरोधी
डील की औपचारिक घोषणा से एक दिन पहले ईरान की राजधानी तेहरान में बड़ी संख्या में लोगों ने प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों ने सरकार के वार्ताकारों और वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ नारेबाजी करते हुए समझौते का विरोध किया. उनका आरोप था कि सरकार अमेरिका के दबाव में झुक रही है और ऐसा समझौता करने जा रही है जो देश की रणनीतिक और राजनीतिक ताकत को कमजोर कर सकता है.
प्रदर्शन के दौरान कई लोगों ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए और कहा कि देश की संप्रभुता किसी भी कीमत पर दांव पर नहीं लगाई जानी चाहिए. इस विरोध ने यह संकेत दिया कि समझौते को लेकर देश के भीतर गंभीर असहमति मौजूद है.
कट्टरपंथी गुट क्यों कर रहे हैं विरोध?
इस विरोध की अगुवाई ‘जेभे-ए पायदारी’ या एंड्योरेंस फ्रंट नामक कट्टरपंथी संगठन ने की. यह गुट खुद को 1979 की इस्लामिक क्रांति के मूल सिद्धांतों का संरक्षक मानता है. संगठन के नेताओं का कहना है कि अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार का समझौता ईरान की स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक शक्ति को प्रभावित कर सकता है.
कट्टरपंथी नेताओं का मानना है कि पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश में सरकार उन मूल विचारों से दूर जा रही है जिन पर इस्लामिक गणराज्य की नींव रखी गई थी. यही वजह है कि यह गुट इस समझौते को केवल कूटनीतिक कदम नहीं, बल्कि वैचारिक चुनौती के रूप में भी देख रहा है.
परमाणु कार्यक्रम को लेकर सबसे ज्यादा चिंता
विरोध करने वालों की सबसे बड़ी चिंता ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है. उनका कहना है कि समझौते के तहत ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम पर कड़ी निगरानी और कई प्रकार की सीमाएं स्वीकार करनी पड़ सकती हैं.
कट्टरपंथी नेता महमूद नबावियन ने दावा किया है कि भविष्य में यदि ईरान को सीमित स्तर पर भी यूरेनियम संवर्धन करना होगा, तो उसे अमेरिका या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की स्वीकृति लेनी पड़ सकती है. उनके अनुसार यह स्थिति ईरान की वैज्ञानिक प्रगति और सामरिक स्वतंत्रता दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है. यही कारण है कि परमाणु कार्यक्रम को राष्ट्रीय गौरव और सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है और समझौते के खिलाफ भावनाएं और अधिक मजबूत हो रही हैं.
प्रतिबंध हटेंगे या नहीं, यही सबसे बड़ा सवाल
समझौते के समर्थन और विरोध के बीच सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि इसके बदले ईरान को वास्तव में क्या मिलेगा. खबरें हैं कि अमेरिका ईरान के तेल निर्यात पर लगे कुछ प्रतिबंधों में राहत दे सकता है. इसके अलावा विदेशों में फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों को भी वापस करने की संभावना जताई जा रही है.
हालांकि अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि प्रतिबंधों में राहत कब मिलेगी, कितनी मिलेगी और किन शर्तों के साथ मिलेगी. इसी अनिश्चितता को आधार बनाकर कट्टरपंथी गुट इस समझौते को ‘एकतरफा सौदा’ करार दे रहे हैं. उनका तर्क है कि ईरान अपने महत्वपूर्ण हितों में रियायत दे रहा है, जबकि बदले में मिलने वाले लाभ अभी केवल वादों तक सीमित हैं.
नेताओं के इस्तीफे की भी उठी मांग
तेहरान में हुए प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों ने विदेश मंत्री अब्बास अरागची और प्रमुख वार्ताकार मोहम्मद बागेर कालिबाफ के खिलाफ भी नाराजगी जताई. कई प्रदर्शनकारियों ने उनके इस्तीफे की मांग करते हुए आरोप लगाया कि वार्ता टीम देश के हितों की रक्षा करने में विफल रही है.
विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने उन सैनिकों और नेताओं का भी जिक्र किया जिन्होंने वर्षों के संघर्ष में अपनी जान गंवाई थी. उनका कहना था कि जिन लोगों ने देश की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए बलिदान दिया, उनके संघर्ष की भावना के विपरीत यह समझौता दिखाई देता है.
सरकार ने विरोध को बताया सीमित
दूसरी ओर ईरानी सरकार और उसके समर्थक इस विरोध को ज्यादा महत्व देने से बच रहे हैं. राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के करीबी अधिकारियों ने लोगों से संयम बरतने और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने की अपील की है. सरकार का कहना है कि कुछ छोटे राजनीतिक समूहों की नाराजगी को पूरे देश की राय नहीं माना जाना चाहिए. ईरानी मीडिया के एक वर्ग ने भी दावा किया है कि अधिकांश नागरिक आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय अलगाव से बाहर निकलने के लिए ऐसे समझौतों का समर्थन कर रहे हैं.
क्या ईरान के भीतर बढ़ेगा राजनीतिक संघर्ष?
अमेरिका के साथ हुआ यह समझौता केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह ईरान की आंतरिक राजनीति का भी केंद्र बनता जा रहा है. एक तरफ सरकार आर्थिक राहत और वैश्विक संबंधों में सुधार का रास्ता तलाश रही है, तो दूसरी तरफ कट्टरपंथी गुट इसे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ कदम बता रहे हैं.
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि समझौते की शर्तें सार्वजनिक होने के बाद जनता की राय किस दिशा में जाती है. फिलहाल इतना साफ है कि अमेरिका के साथ समझौते ने बाहरी तनाव भले कम करने की कोशिश की हो, लेकिन ईरान के भीतर राजनीतिक बहस और टकराव को और तेज कर दिया है.
ये भी पढ़ें: अमेरिका-ईरान समझौते से पहले इजरायल का बड़ा ऐलान, लेबनान को लेकर अपनाया सख्त रूख