India with Iran at UNHRC: भारत ने जेनेवा में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 39वें विशेष सत्र में ईरान के खिलाफ पेश किए गए प्रस्ताव का विरोध करते हुए स्पष्ट रूप से ईरान के पक्ष में मतदान किया. यह कदम भारत की स्वतंत्र और बहुपक्षीय विदेश नीति का प्रतीक माना जा रहा है. भारत के इस रुख के बाद ईरान के राजदूत मोहम्मद फथाली ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर मोदी सरकार की इस पहल की खुले तौर पर प्रशंसा की.
ईरानी राजदूत फथाली ने अपने पोस्ट में लिखा कि भारत ने “संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में ईरान के समर्थन में सैद्धांतिक और दृढ़ रुख अपनाया, जिसमें राजनीतिक रूप से प्रेरित और अन्यायपूर्ण प्रस्ताव का विरोध करना शामिल है.” उन्होंने इसे न्याय, बहुपक्षवाद और राष्ट्रीय संप्रभुता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का प्रतीक बताया. फथाली ने कहा कि इस समर्थन से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध और मजबूत हुए हैं.
I extend my sincere gratitude to the Govt. of India for its principled and firm support of I.R. of Iran at the UN_HRC, including opposing an unjust and politically motivated resolution. This stance reflects India’s commitment to justice, multilateralism, and national sovereignty. pic.twitter.com/kLFnqpNjmB
— Iran Ambassador Mohammad Fathali (@IranAmbIndia) January 24, 2026
प्रस्ताव के पीछे का मुद्दा
इस सत्र में पेश किए गए प्रस्ताव में ईरान में हालिया सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर कथित हिंसक दमन की निंदा करने की मांग की गई थी. प्रस्ताव के तहत स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय फैक्ट-फाइंडिंग मिशन के कार्यकाल को दो वर्ष बढ़ाने, हिंसक दमन की जांच कराने और जिम्मेदारों पर कार्रवाई करने की सिफारिश की गई थी. यह प्रस्ताव 25 देशों के समर्थन से पारित हुआ, जबकि भारत समेत सात देशों ने इसके विरोध में मतदान किया. विरोध करने वाले अन्य देशों में चीन, पाकिस्तान, इराक, इंडोनेशिया, क्यूबा और वियतनाम शामिल थे.
भारत ने क्यों किया विरोध
भारत ने इस प्रस्ताव को पश्चिमी देशों द्वारा प्रायोजित और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया. विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि यह प्रस्ताव ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने वाला था. भारत के मुताबिक, इस कदम का मकसद बहुपक्षवाद, संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांतों को बनाए रखना था, जो देश की विदेश नीति का मूल आधार हैं.
ईरान में हाल की घटनाओं का अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
ईरान में पिछले कुछ महीनों में हुए विरोध प्रदर्शनों में हजारों लोगों की मौत और कई गिरफ्तारियों की खबरें आईं. पश्चिमी देशों ने इस दमन की कड़ी आलोचना की और इसे “अभूतपूर्व” करार देते हुए जांच की सिफारिश की. भारत ने हालांकि इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि राष्ट्रीय संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का सिद्धांत सर्वोपरि है.
भारत-ईरान संबंधों पर असर
भारत का यह कदम दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने वाला माना जा रहा है. ईरान और भारत लंबे समय से ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्र में जुड़े हुए हैं. ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे का समर्थन दोनों देशों के लिए महत्त्वपूर्ण होता है. राजदूत फथाली ने भी अपने पोस्ट में इस पहल को दोनों देशों के विश्वसनीय और स्थिर संबंधों के दृष्टिकोण से सकारात्मक बताया.
भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की झलक
इस घटना से यह भी स्पष्ट हुआ कि भारत अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है. चाहे पश्चिमी देशों की तरफ से राजनीतिक दबाव हो या वैश्विक स्तर पर संवेदनशील मुद्दा हो, भारत ने अपने फैसले को राष्ट्रीय हित और बहुपक्षीय दृष्टिकोण के आधार पर लिया. इस कदम ने भारत की स्वतंत्र और रणनीतिक विदेश नीति की छवि को अंतरराष्ट्रीय मंच पर और मजबूत किया है.
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