नई दिल्ली: भारत और रूस के बीच बढ़ते रणनीतिक और औद्योगिक सहयोग को लेकर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. अमेरिका द्वारा भारत पर नए टैरिफ लगाए जाने की पृष्ठभूमि में भारत ने रूस के साथ इंडस्ट्रियल को-ऑपरेशन और खनिज संसाधनों पर एक अहम समझौता किया है. ईटी की खबर के अनुसार, यह समझौता खास इसलिए भी है क्योंकि इसमें ‘रेयर अर्थ मेटल्स’ के क्षेत्र में सहयोग शामिल है, ऐसे तत्व जो आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा प्रणालियों और ग्रीन एनर्जी टेक्नोलॉजी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.
इस समझौते के जरिए भारत ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि वह अंतरराष्ट्रीय दबाव में अपने दीर्घकालिक रणनीतिक हितों से समझौता नहीं करेगा.
टैरिफ के बीच भारत का रूस की ओर झुकाव
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत पर टैरिफ को 25% से बढ़ाकर 50% कर दिया गया है. यह निर्णय मुख्यतः इस आरोप पर आधारित है कि भारत रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन युद्ध को फंड कर रहा है. अमेरिका का यह कदम भारत के लिए व्यापारिक दृष्टिकोण से एक चुनौती जरूर है, लेकिन भारत ने इसका जवाब बहुत ही परिपक्व और रणनीतिक तरीके से दिया है, अपने रूसी साझेदार के साथ और गहरे सहयोग की दिशा में कदम बढ़ाकर.
अब जबकि ट्रंप प्रशासन का रुख भारत के खिलाफ कठोर होता जा रहा है, भारत ने उल्टा रूस के साथ और अधिक प्रौद्योगिकीय और औद्योगिक क्षेत्रों में साझेदारी कर अपनी नीति की स्पष्टता और आत्मनिर्भरता का प्रदर्शन किया है.
भारत-रूस डील: किन क्षेत्रों में हुई बातचीत?
रूस की राजधानी में आयोजित द्विपक्षीय औद्योगिक बैठक में भारत और रूस के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भाग लिया. भारत की ओर से डीपीआईआईटी सेक्रेटरी अमरदीप सिंह भाटिया और रूस की ओर से डिप्टी मिनिस्टर अलेक्सी ग्रुजदेव ने नेतृत्व किया. इस दौरान जिन क्षेत्रों में गहन चर्चा और सहमति बनी, वे हैं:
रेयर अर्थ मेटल्स और क्रिटिकल मिनरल्स का खनन
इन खनिजों की वैश्विक आपूर्ति पर अभी तक चीन का प्रभुत्व रहा है, और भारत का यह कदम इस वर्चस्व को चुनौती देने वाला माना जा रहा है. यह वही धातुएं हैं जो इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, मोबाइल फोन, मिसाइल गाइडेंस सिस्टम्स और अन्य हाईटेक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में अनिवार्य हैं.
अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन
एक तकनीक जो कोयले से अधिक स्वच्छ और कुशल ऊर्जा उत्पादन को संभव बनाती है.
एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी और विनिर्माण
छोटे विमान इंजनों का निर्माण, विंड टनल सुविधा का विकास, और भारत में एयरोस्पेस क्षमताओं को बढ़ाने की योजनाओं पर चर्चा हुई.
एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग (3D प्रिंटिंग)
दोनों देश उच्च तकनीक विनिर्माण क्षेत्रों में एक-दूसरे को सहयोग और ज्ञान साझा करने पर सहमत हुए.
फर्टिलाइजर, खनन मशीनरी में तकनीक ट्रांसफर
रूस से आधुनिक औद्योगिक मशीनरी भारत में लाने और भारतीय उत्पादन क्षमता को मजबूत करने की योजना पर बातचीत हुई.
वेस्ट मैनेजमेंट और स्किल डेवलपमेंट
भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप दोनों देश कौशल निर्माण और पर्यावरणीय चुनौतियों पर साझा काम करेंगे.
यह बैठक केवल विचार-विमर्श तक सीमित नहीं रही. इसका समापन एक प्रोटोकॉल साइनिंग के साथ हुआ, जिसमें दोनों देशों ने साझा औद्योगिक हितों और रणनीतिक साझेदारी को अगले स्तर पर ले जाने की प्रतिबद्धता जताई. बैठक में करीब 80 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया जिसमें नीति निर्माता, उद्योगपति और टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ शामिल थे.
अमेरिका की चिंता: क्यों भड़का है वॉशिंगटन?
भारत ने वर्ष 2024 में रूस से रिकॉर्ड $52.7 बिलियन का तेल आयात किया. यह आंकड़ा अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों की अपेक्षाओं के विपरीत था, जिन्होंने रूस को वैश्विक व्यापार से अलग-थलग करने की नीति अपनाई थी.
इस घटनाक्रम के जवाब में अमेरिका ने 27 अगस्त 2025 से लागू होने वाले नए 25% टैरिफ की घोषणा की है, जो भारत से होने वाले निर्यात पर प्रभाव डालेगा. इसके साथ ही पुराने 25% टैरिफ को भी उसी दिन लागू किया जाएगा जिससे एक तरह का दोहरा झटका लगेगा.
GTRI (Global Trade Research Initiative) के विश्लेषण के अनुसार, यह नया टैरिफ भारत के अमेरिका को होने वाले कुल निर्यात का 40-50% तक घटा सकता है, विशेष रूप से गैर-फार्मा और गैर-इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों में.
अमेरिका, चीन और यूरोप खुद क्या कर रहे हैं?
भारत को निशाना बनाए जाने की आलोचना इसलिए भी हो रही है क्योंकि अमेरिका और उसके सहयोगी देश खुद भी रूस से व्यापार कर रहे हैं:
इस दोहरे मापदंड को लेकर भारत में नीति विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की प्रतिक्रिया राजनीतिक ज्यादा और आर्थिक रूप से अव्यावहारिक है. खासकर तब, जब चीन के पास गैलियम, जर्मेनियम, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ जैसे संसाधनों का वैश्विक नियंत्रण है, जो अमेरिका की खुद की टेक और डिफेंस इंडस्ट्री के लिए जरूरी हैं.
भारत के सामने क्या जोखिम हैं?
यदि अमेरिका का टैरिफ लंबे समय तक बना रहता है, तो भारत से निर्यात होने वाले उत्पाद महंगे हो जाएंगे. इससे अमेरिकी बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धा घट सकती है और वियतनाम, बांग्लादेश, और चीन जैसे देशों को फायदा मिल सकता है.
वहीं कुछ कैटेगरीज जैसे फार्मा और आईटी-सेवाएं फिलहाल इन टैरिफ्स से बची हुई हैं, लेकिन अगर राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो ये क्षेत्र भी प्रभावित हो सकते हैं.
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