Indian Electronic Warfare: 21वीं सदी का युद्ध मैदान अब सिर्फ टैंकों, मिसाइलों और बंदूकों तक सीमित नहीं रहा. युद्ध अब हवा में बहती तरंगों में लड़ा जा रहा है, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम (EMS) में. यह वही स्पेस है जहाँ से दुश्मनों की बातचीत सुनी जाती है, उनके रडार सिस्टम जाम किए जाते हैं और उनके डिजिटल नेटवर्क को हथियार बना दिया जाता है.
भारत अब इस नई युद्ध शैली में तेजी से कदम बढ़ा रहा है. एक ऐसा डोमेन जिसमें ‘देखा नहीं जाता, पर हर चीज़ प्रभावित होती है’. यही कारण है कि भारत ने अब एक ठोस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW) डॉक्ट्रिन तैयार की है, जिसमें थल, वायु और नौसेना की भूमिका समन्वित रूप से परिभाषित की गई है.
1980 के शुरुआती कदम से 2030 की वैश्विक रेस तक
भारत की EW क्षमताओं की शुरुआत भले ही 80 के दशक में कुछ आयातित उपकरणों और सीमित घरेलू प्रयोगों से हुई थी, लेकिन आज यह क्षेत्र तेज़ी से एक आत्मनिर्भर और रणनीतिक ताक़त के रूप में उभर रहा है. DRDO और BEL द्वारा विकसित सिस्टम न सिर्फ दुश्मन के संचार को बाधित कर सकते हैं, बल्कि अब भारतीय कंपनियाँ जैसे टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, एलएंडटी डिफेंस और सेंटम इलेक्ट्रॉनिक्स भी इस क्षेत्र में वैश्विक मानकों की तकनीकें बना रही हैं.
₹1.5 लाख करोड़ का रोडमैप
भारत में ₹1.5 लाख करोड़ से अधिक की सैन्य इलेक्ट्रॉनिक योजनाएं सक्रिय हैं. यह सिर्फ एक रक्षा निवेश नहीं, बल्कि भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और AI उद्योग को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का अवसर है. डिफेंस एक्सपोर्ट का लक्ष्य ₹35,000 करोड़ रखा गया है, जिसमें EW टेक्नोलॉजी की बड़ी हिस्सेदारी होगी.
AI, स्पेस और साइबर का संगम
नए युग के इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में सिर्फ जामिंग या ट्रैकिंग नहीं, बल्कि कॉग्निटिव एल्गोरिद्म, स्पेस-बेस्ड निगरानी, एंटी-ड्रोन टेक्नोलॉजी और 5G नेटवर्क की भूमिका होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में EMS को नियंत्रित करना, भौगोलिक सीमाओं पर नियंत्रण से भी ज्यादा अहम हो सकता है.
‘ऑपरेशन सिंदूर’ और भारत की बढ़ती ताक़त
भारत ने पहले ही 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान इसका प्रभाव दिखा दिया था, जब पाकिस्तानी रडार सिस्टम को इलेक्ट्रॉनिकली डिसेबल कर, टारगेट्स को मिनटों में खत्म किया गया था. यह सिर्फ एक सैन्य कामयाबी नहीं, बल्कि एक संदेश था, भारत अब डिजिटल युद्धभूमि में भी पूरी तरह तैयार है.
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