भारत और रूस के रणनीतिक रिश्तों में एक नया और अहम अध्याय जुड़ गया है. दोनों देशों के बीच एक ऐतिहासिक रक्षा समझौते को कानूनी रूप दे दिया गया है, जिसके तहत अब भारतीय और रूसी सशस्त्र बल एक-दूसरे के क्षेत्र में सैनिकों, युद्धपोतों और सैन्य विमानों की तैनाती कर सकेंगे. इस समझौते पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सोमवार को हस्ताक्षर किए, जिससे रूस की आंतरिक कानूनी प्रक्रिया पूरी हो गई.
यह समझौता दोनों देशों की सरकारों के बीच हुआ एक अंतर-सरकारी रक्षा करार है, जो सैन्य सहयोग को पहले से कहीं ज्यादा व्यावहारिक और ऑपरेशनल बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है.
कितने सैनिक और सैन्य संसाधन होंगे तैनात?
रूस की संसद की इंटरनेशनल अफेयर्स कमेटी को संबोधित करते हुए सांसद व्याचेस्लाव निकोनोव ने इस समझौते के प्रमुख प्रावधानों की जानकारी दी. उनके अनुसार, यह करार दोनों देशों को एक-दूसरे के क्षेत्र में एक साथ:
को अधिकतम पांच साल की अवधि के लिए तैनात करने की अनुमति देता है. यदि भारत और रूस दोनों की सहमति होती है, तो इस अवधि को आगे पांच साल और बढ़ाया जा सकता है.
क्या है RELOS समझौता?
इस रक्षा करार को औपचारिक रूप से RELOS (Reciprocal Exchange of Logistic Support) कहा जाता है. यह सिर्फ सैनिकों या हथियारों की तैनाती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दायरे में कई अहम पहलू शामिल हैं.
RELOS समझौते के तहत दोनों देश एक-दूसरे को:
उपलब्ध कराएंगे. इसके अलावा यह समझौता संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, मानवीय सहायता अभियानों, प्राकृतिक आपदाओं और मानव-निर्मित आपदाओं से निपटने जैसे मामलों पर भी लागू होगा.
क्यों है यह समझौता खास?
इस समझौते की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके जरिए भारत और रूस अब एक-दूसरे की धरती से अपने लड़ाकू विमान और युद्धपोत ऑपरेट कर सकेंगे. यानी जरूरत पड़ने पर भारतीय नौसेना रूसी बंदरगाहों का इस्तेमाल कर सकेगी और रूसी वायुसेना भारतीय एयरफील्ड से उड़ान भर सकती है और इसका उलटा भी संभव होगा.
रूस की संसद की वेबसाइट पर जारी एक आधिकारिक नोट में कहा गया है कि इस समझौते से सैन्य सहयोग से जुड़ी नौकरशाही बाधाएं काफी हद तक कम हो जाएंगी. पहले जिन प्रक्रियाओं में लंबा समय लगता था, वे अब कहीं ज्यादा सरल और तेज हो जाएंगी.
ऑपरेशनल पहुंच और रणनीतिक फायदा
रूसी रक्षा अधिकारियों का मानना है कि इस व्यवस्था से दोनों देशों की सैन्य तैयारियों को मजबूती मिलेगी. भारत के लिए यह समझौता हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी ऑपरेशनल पहुंच को और मजबूत करेगा.
वहीं रूस के लिए, यह आर्कटिक और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक लचीलापन बढ़ाने में मददगार साबित होगा. युद्धपोतों की पोर्ट कॉल, सैन्य विमानों की आवाजाही और लॉजिस्टिक सपोर्ट अब पहले की तुलना में कहीं अधिक सहज हो जाएगा.
रूस की संसद से पहले ही मिल चुकी थी मंजूरी
इस रक्षा समझौते को पहले ही रूस की संसद के दोनों सदनों- स्टेट ड्यूमा और फेडरेशन काउंसिल से मंजूरी मिल चुकी थी. राष्ट्रपति पुतिन के हस्ताक्षर के साथ अब रूस की तरफ से सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं.
हालांकि, समझौते को पूरी तरह लागू करने के लिए भारत और रूस के बीच औपचारिक रूप से दस्तावेजों का आदान-प्रदान (exchange of instruments) अभी होना बाकी है.
भारत की बहुपक्षीय सैन्य रणनीति को मजबूती
गौर करने वाली बात यह है कि भारत पहले ही अमेरिका, फ्रांस और कुछ अन्य देशों के साथ इसी तरह के लॉजिस्टिक सपोर्ट समझौते कर चुका है. अब रूस का इस सूची में शामिल होना भारत की मल्टी-अलाइनमेंट और बहुपक्षीय रक्षा नीति को और मजबूती देता है.
इससे भारत को अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में सैन्य सहयोग और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी.
रूस ने भारत को बताया अहम रणनीतिक साझेदार
रूसी मीडिया चैनल SolovievLive को दिए एक इंटरव्यू में भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने कहा कि भारत रूस के लिए न सिर्फ एक अहम आर्थिक साझेदार है, बल्कि एक प्रमुख राजनीतिक और रणनीतिक सहयोगी भी है.
उन्होंने कहा कि रूस भारत को एक मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर के प्रमुख स्तंभों में से एक मानता है, जिसकी भूमिका वैश्विक विकास और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक रही है और आगे भी रहेगी.
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