नई दिल्ली/टोरंटो: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जी7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए कनाडा का निमंत्रण मिला है. हालांकि इस यात्रा से पहले खालिस्तान समर्थकों द्वारा दी गई धमकियों ने एक बार फिर भारत और कनाडा के आपसी संबंधों और सुरक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इतिहास बताता है कि भारतीय प्रधानमंत्रियों को विदेश में निशाना बनाने की साजिशें कोई नई बात नहीं हैं. 1985 में राजीव गांधी की अमेरिका यात्रा के दौरान भी खालिस्तानी आतंकियों ने उनकी हत्या की योजना बनाई थी, जिसे FBI ने विफल कर दिया था.
आज, जब प्रधानमंत्री मोदी जैसे वैश्विक नेता कनाडा की यात्रा करने जा रहे हैं, इस संदर्भ में खालिस्तान समर्थकों की ताकत, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और राजनीतिक पहुंच को गंभीरता से समझना और सतर्क रहना बेहद जरूरी है.
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: खालिस्तानियों की साजिश
1984 में ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद भारत में खालिस्तान आंदोलन ने हिंसक रूप धारण कर लिया था. इसके बाद 1985 में टाइम मैगजीन की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया था कि अमेरिका में खालिस्तान समर्थकों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को निशाना बनाने की योजना बनाई थी. FBI की जांच में यह सामने आया कि आतंकवादी राजीव गांधी की हत्या के लिए सुपारी किलर की तलाश में थे. मुख्य साजिशकर्ता गुरप्रताप सिंह बिर्क को FBI ने अंडरकवर ऑपरेशन के तहत गिरफ्तार किया. इस साजिश में हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भजनलाल को भी निशाना बनाने की योजना थी.
खालिस्तान समर्थक संगठन और उनका नेटवर्क
वर्तमान में अमेरिका और कनाडा में खालिस्तान समर्थक संगठनों का नेटवर्क पहले से कहीं अधिक व्यापक और संगठित हो चुका है.
प्रमुख संगठन:
कनाडा की खालिस्तानी लॉबी भले ही संख्या में सीमित हो, लेकिन इन संगठनों की फंडिंग, सोशल मीडिया पहुंच और स्थानीय राजनीति में प्रभाव काफी बढ़ गया है. कई कनाडाई राजनेता खालिस्तान समर्थकों के साथ नरम रुख अपनाते हैं, कभी वोट बैंक के दबाव में, तो कभी फ्री स्पीच की आड़ में.
2023 में FBI और इंटरपोल की रिपोर्ट में SFJ को "आंतरिक सुरक्षा के लिए उभरता हुआ खतरा" करार दिया गया था. इसके बावजूद, कनाडा में खालिस्तानियों को राजनीतिक संरक्षण और सार्वजनिक मंच अभी भी सहजता से मिलते हैं.
क्या भारत को चिंता करनी चाहिए?
बिल्कुल. प्रधानमंत्री मोदी की सुरक्षा केवल एक व्यक्ति की सुरक्षा नहीं है, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और कूटनीतिक भागीदारी से भी जुड़ी हुई है. भारत को कनाडा की सुरक्षा एजेंसियों पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहिए. अतीत के अनुभव बताते हैं कि खालिस्तानी समूह अवसर मिलते ही भारतीय नेतृत्व को निशाना बनाने की कोशिश करते रहे हैं.
भारत को क्या कदम उठाने चाहिए?
SPG और R&AW की टीम कनाडा भेजें:
उच्च स्तरीय सुरक्षा टीम कनाडा में पहले से तैनात रहनी चाहिए. स्थानीय एजेंसियों के साथ समन्वय बनाते हुए भारत को अपनी स्वतंत्र सुरक्षा योजना भी रखनी होगी.
संयुक्त खालिस्तानी वॉचलिस्ट तैयार हो:
संभावित संदिग्धों, फंडिंग नेटवर्क और खालिस्तान समर्थक कार्यक्रमों पर संयुक्त नजर रखने के लिए साझा वॉचलिस्ट की जरूरत है.
सुरक्षा घेरा बहुस्तरीय हो:
जहां-जहां प्रधानमंत्री का दौरा हो, वहां ग्राउंड से लेकर एयर स्पेस तक, मल्टी-लेयर सिक्योरिटी हो. साइबर मॉनिटरिंग और डिजिटल थ्रेट इंटेलिजेंस भी मजबूत किया जाए.
डिजिटल प्रोपेगेंडा का मुकाबला:
खालिस्तानी संगठन अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अत्यधिक सक्रिय हैं. भारत को अपने साइबर सेल को सतर्क रखते हुए फेक न्यूज, डीपफेक और सोशल मीडिया पर चल रहे भारत-विरोधी अभियानों को तत्काल जवाब देना होगा.
कूटनीतिक दबाव बढ़ाना:
कनाडा और अमेरिका से भारत को दो-टूक कहना चाहिए कि खालिस्तानी तत्वों के खिलाफ कार्रवाई हो. भारत को यूएन, इंटरपोल और FATF जैसे मंचों पर खालिस्तान समर्थक संगठनों को वैश्विक आतंकी नेटवर्क घोषित करने की मांग भी तेज करनी चाहिए.
खतरे को नजरअंदाज क्यों नहीं कर सकते?
इतिहास गवाह है कि खालिस्तान समर्थक न केवल भारत के भीतर, बल्कि विदेशों में भी हिंसक गतिविधियों में शामिल रहे हैं. एयर इंडिया फ्लाइट 182 बम धमाका इसका सबसे कड़ा उदाहरण है. आज भी कनाडा जैसे देश में उन लोगों को "फ्रीडम ऑफ स्पीच" के नाम पर मंच मिलना, भारत के लिए एक सतत सुरक्षा चुनौती है.
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