भारत-पाकिस्तान समेत कई देशों पर मंडरा रहा बाढ़ का खतरा, वैज्ञानिकों की नई चेतावनी ने बढ़ाई चिंता

जलवायु परिवर्तन की वजह से तेजी से पिघल रहे ग्लेशियरों पर हुए एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने खुलासा किया है कि यदि यह प्रक्रिया इसी तरह जारी रही, तो पृथ्वी पर हजारों नई झीलें अस्तित्व में आ सकती हैं.

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धरती पर फैले लाखों ग्लेशियर केवल जमी हुई बर्फ के विशाल भंडार नहीं हैं, बल्कि इनके नीचे छिपी भू-आकृतियां भविष्य में दुनिया के लिए बड़े खतरे का संकेत दे रही हैं. जलवायु परिवर्तन की वजह से तेजी से पिघल रहे ग्लेशियरों पर हुए एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने खुलासा किया है कि यदि यह प्रक्रिया इसी तरह जारी रही, तो पृथ्वी पर हजारों नई झीलें अस्तित्व में आ सकती हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इनमें से कई झीलें आबादी वाले क्षेत्रों के लिए अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ का कारण बन सकती हैं, जिससे एशिया समेत कई देशों में बड़ा संकट पैदा होने की आशंका है.

3D तकनीक से तैयार हुआ ग्लेशियरों के नीचे का नक्शा

नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन को स्वीडन, अमेरिका, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे के वैज्ञानिकों ने मिलकर अंजाम दिया. शोध के दौरान ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के विशाल हिम क्षेत्रों का विश्लेषण करने के लिए अत्याधुनिक जीपीयू और डीप लर्निंग आधारित त्रि-आयामी (3डी) आइस फ्लो मॉडल का इस्तेमाल किया गया. इस तकनीक की मदद से वैज्ञानिकों ने पहली बार ग्लेशियरों के नीचे मौजूद जमीन की वास्तविक बनावट का अनुमान लगाया. अध्ययन में सामने आया कि बर्फ के नीचे बड़ी संख्या में प्राकृतिक गड्ढे, घाटियां और बेसिन मौजूद हैं, जो भविष्य में बर्फ पिघलने पर पानी से भरकर करीब 56,659 नई झीलों का रूप ले सकते हैं.

पिघलती बर्फ के बाद बदल सकती है पृथ्वी की तस्वीर

वैज्ञानिकों का उद्देश्य यह समझना था कि यदि ग्लेशियर पूरी तरह समाप्त हो जाएं तो पृथ्वी की सतह कैसी दिखाई देगी. चूंकि ग्लेशियरों का आधार प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देता, इसलिए यह अध्ययन बेहद चुनौतीपूर्ण था. शोधकर्ताओं के अनुसार, बर्फ के नीचे मौजूद कई गहरे प्राकृतिक बेसिन भविष्य में पानी का विशाल भंडार बन सकते हैं. इससे न केवल स्थानीय भूगोल बदलेगा, बल्कि जल प्रवाह, नदी तंत्र और आसपास के पर्यावरण पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है. यह अध्ययन भविष्य की जलवायु चुनौतियों को समझने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

एशिया के पहाड़ी इलाकों पर सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा

अध्ययन में सबसे अधिक चिंता हाई माउंटेन एशिया को लेकर जताई गई है. वैज्ञानिकों ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के किनारों के पास बड़े-बड़े गड्ढों की पहचान की है, जहां बनने वाली झीलों में भारी मात्रा में पानी जमा हो सकता है. यदि इनमें से कोई झील अचानक फटती है तो नीचे बसे गांव, शहर, सड़कें, खेती की जमीन और पनबिजली परियोजनाएं गंभीर खतरे में आ सकती हैं. ऐसी घटनाओं को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है, जो कुछ ही घंटों में व्यापक तबाही मचा सकती हैं.

भारत समेत चार देशों पर सबसे ज्यादा जोखिम

शोधकर्ताओं के मुताबिक, ग्लेशियर झीलों से पैदा होने वाले संभावित खतरे की चपेट में आने वाली दुनिया की आधे से अधिक आबादी केवल चार देशों—भारत, पाकिस्तान, चीन और पेरू—में रहती है. इन देशों के पर्वतीय क्षेत्रों में तेजी से बदलती जलवायु भविष्य में आपदा का जोखिम और बढ़ा सकती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि समय रहते ग्लेशियरों की निगरानी, संभावित झीलों की पहचान और मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था विकसित करना बेहद जरूरी है, ताकि जलवायु परिवर्तन के इस उभरते खतरे से लोगों की जान और बुनियादी ढांचे को सुरक्षित रखा जा सके.

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