ग्वादर नेवल बेस बन रहा चीनी नौसेना का नया ठिकाना? CPEC प्रोजेक्ट पर उठे बड़े सवाल

पाकिस्तान के ग्वादर में बनने वाले नए नौसैनिक अड्डे (नेवल बेस) को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. सबसे बड़ी चिंता यह है कि जिस चीनी कंपनी ने इस परियोजना की व्यवहार्यता (फीजिबिलिटी) रिपोर्ट तैयार की है, उसी को इस प्रोजेक्ट से सबसे अधिक लाभ मिलने की संभावना है.

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पाकिस्तान के ग्वादर में बनने वाले नए नौसैनिक अड्डे (नेवल बेस) को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. सबसे बड़ी चिंता यह है कि जिस चीनी कंपनी ने इस परियोजना की व्यवहार्यता (फीजिबिलिटी) रिपोर्ट तैयार की है, उसी को इस प्रोजेक्ट से सबसे अधिक लाभ मिलने की संभावना है. ऐसे में निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

फीजिबिलिटी स्टडी कितनी निष्पक्ष होती है?

किसी भी बड़े प्रोजेक्ट से पहले यह जांच की जाती है कि वह तकनीकी, आर्थिक और रणनीतिक रूप से कितना उपयोगी है. इसे फीजिबिलिटी स्टडी कहा जाता है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी रिपोर्टें अक्सर उस परियोजना को सही साबित करने के उद्देश्य से तैयार की जाती हैं, जिसके लिए उन्हें नियुक्त किया गया हो. इसी वजह से दुनिया के कई देशों में बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स की फीजिबिलिटी स्टडी स्वतंत्र एजेंसियों से करवाई जाती है, जिनका परियोजना में कोई सीधा हित न हो.

चीनी सरकारी कंपनी ने तैयार की रिपोर्ट

ग्वादर नेवल बेस की फीजिबिलिटी स्टडी चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी (CHEC) ने तैयार की है. यह कंपनी चाइना कम्युनिकेशंस कंस्ट्रक्शन कंपनी (CCCC) की सहायक कंपनी है. CCCC एक चीनी सरकारी कंपनी है, जिसमें चीन सरकार की लगभग 63.8 प्रतिशत हिस्सेदारी है. CHEC समुद्री निर्माण, ड्रेजिंग और तटीय क्षेत्रों के विकास में विशेषज्ञ मानी जाती है. यह कंपनी दुनिया के 80 से अधिक देशों में काम कर रही है और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की कई परियोजनाओं में भी शामिल रही है.

हितों के टकराव का बड़ा मामला

इस मामले में हितों के टकराव (Conflict of Interest) के दो बड़े पहलू हैं. पहला, CHEC ने उसी परियोजना का मूल्यांकन किया है जिसे भविष्य में वह खुद बना सकती है. सामान्य तौर पर पारदर्शी सरकारी प्रक्रियाओं में ऐसी स्थिति स्वीकार नहीं की जाती. दूसरा और अधिक गंभीर पहलू यह है कि इस नेवल बेस का एक प्रमुख उद्देश्य चीन की नौसेना (PLA Navy) को लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करना है. 

ऐसे में चीन सरकार के स्वामित्व वाली कंपनी द्वारा इस परियोजना की उपयोगिता का आकलन करना निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है. दूसरे शब्दों में, चीन की सरकारी कंपनी उस परियोजना को व्यवहारिक बता रही है जिससे चीन की नौसैनिक शक्ति को सीधे लाभ मिलेगा.

दक्षिण चीन सागर में भी निभाई थी अहम भूमिका

CHEC और उसकी मूल कंपनी CCCC का रिकॉर्ड भी विवादों से जुड़ा रहा है. साल 2020 में अमेरिका के वाणिज्य विभाग ने CCCC और उसकी सहायक कंपनियों को अपनी एंटिटी लिस्ट में शामिल किया था. अमेरिका का आरोप था कि इन कंपनियों ने दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीपों के निर्माण और उनके सैन्यीकरण में चीनी सेना की मदद की थी. यानी जिस कॉरपोरेट समूह ने ग्वादर नेवल बेस की व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार की है, वही समूह पहले भी चीन की नौसैनिक रणनीति से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर चुका है.

विश्व बैंक ने भी लगाई थी पाबंदी

वर्ष 2009 से 2017 के बीच विश्व बैंक ने CCCC और उसकी सभी सहायक कंपनियों पर प्रतिबंध लगाया था. यह कार्रवाई फिलीपींस में सड़क निर्माण परियोजना से जुड़े कथित धोखाधड़ी के मामले में की गई थी. इसलिए आलोचकों का कहना है कि कंपनी के पिछले रिकॉर्ड को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं

एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ग्वादर नेवल बेस की पूरी फीजिबिलिटी रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है. यदि रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होगी, तो कोई भी स्वतंत्र विशेषज्ञ उसके निष्कर्षों की जांच नहीं कर सकेगा. ऐसे में पाकिस्तान के सैन्य और नागरिक अधिकारी एक ऐसी रिपोर्ट पर भरोसा कर रहे हैं, जिसे चीन की सरकारी कंपनी ने तैयार किया है और जिससे चीन को रणनीतिक फायदा भी मिल सकता है. आलोचकों के अनुसार यह स्थिति पाकिस्तान की रणनीतिक स्वतंत्रता और संप्रभुता के लिए भी चिंता का विषय है.

क्या होना चाहिए अगला कदम?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद को दूर करने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए. सबसे पहले, फीजिबिलिटी स्टडी को पूरी तरह सार्वजनिक किया जाना चाहिए. इसके बाद किसी स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय संस्था से इसकी समीक्षा करवाई जानी चाहिए, जिसका CPEC या CCCC से कोई संबंध न हो. इसके अलावा, नेवल बेस के निर्माण से जुड़े सभी ठेकों को पारदर्शी अंतरराष्ट्रीय निविदा प्रक्रिया (टेंडर) के जरिए दिया जाना चाहिए.

CPEC मॉडल पर फिर उठे सवाल

आलोचकों का कहना है कि CPEC परियोजनाओं में पहले भी पारदर्शिता की कमी देखी गई है. कई मामलों में चीनी निवेश को पर्याप्त जांच-पड़ताल का विकल्प मान लिया गया, जबकि सार्वजनिक जवाबदेही को नजरअंदाज किया गया. यदि ग्वादर नेवल बेस भी उसी मॉडल पर आगे बढ़ता है, तो पाकिस्तान अपनी सबसे महत्वपूर्ण सैन्य परियोजनाओं में से एक को ऐसे दस्तावेजों के आधार पर तैयार करेगा, जिनकी स्वतंत्र रूप से जांच तक नहीं की गई.

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