नई दिल्ली: कृष्ण जन्मभूमि न्यास की बैठक के बाद आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव एवं श्रीकृष्ण जन्मभूमि न्यास के उपाध्यक्ष परम पूज्य गोविंद देव गिरी जी महाराज ने वरिष्ठ पत्रकार एवं आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज के अंतरराष्ट्रीय मीडिया प्रभारी शांतनु शुक्ल को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया.
गोविंद देव गिरी जी महाराज ने शांतनु शुक्ल के सनातन धर्म और संत समाज के प्रति समर्पण की सराहना करते हुए कहा, “आज आपके कारण पत्रकार वर्ग भी सनातन के साथ जुड़ रहा है और साधु-संतों के साथ जुड़ रहा है.”
शांतनु शुक्ल की पत्रकारिता यात्रा में संत समाज के साथ उनका जुड़ाव महत्वपूर्ण रहा है. आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज के अंतरराष्ट्रीय मीडिया प्रभारी के रूप में उन्होंने धार्मिक आयोजनों, संतों के संदेश और सनातन से जुड़े विषयों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाई है.
उनकी कोशिश रही है कि संतों की बात केवल आश्रमों और मंदिरों तक सीमित न रहे, बल्कि समाचार कक्षों के जरिए देश-दुनिया के करोड़ों लोगों तक पहुंचे. गोविंद देव गिरी जी महाराज का सम्मान इसी प्रयास की सार्वजनिक स्वीकृति जैसा रहा.
एक ही मंच पर दो पीढ़ियों का विश्वास
इसी कार्यक्रम में ‘हनुमान अंश’ फिल्म की निर्माता अनुप्रिया नागर को भी गोविंद देव गिरी जी महाराज ने “देश की बेटी” कहकर सम्मानित किया. अनुप्रिया नागर ने इस अवसर पर शांतनु शुक्ल के योगदान को याद करते हुए फिल्म के निर्माण और उसके संदेश को आगे बढ़ाने में उनके सहयोग की सराहना की.
कार्यक्रम में एक तरफ संत परंपरा के वरिष्ठ संत का आशीर्वाद था, तो दूसरी ओर नई पीढ़ी की एक फिल्म निर्माता का विश्वास. इस दौरान शांतनु शुक्ल की वह भूमिका भी सामने आई, जिसमें सनातन की परंपरा और आधुनिक मीडिया की दुनिया के बीच संवाद कायम करने का प्रयास लगातार जारी है.
शॉल का सम्मान, वर्षों के समर्पण की पहचान
कंधों पर डाली गई शॉल कुछ क्षणों का दृश्य थी, लेकिन उसके पीछे वर्षों का विश्वास, रिश्ते और समर्पण था. संत के हाथों मिला सम्मान किसी भी पत्रकार के लिए इसलिए विशेष होता है क्योंकि पत्रकारिता का सबसे बड़ा पुरस्कार केवल प्रसिद्धि नहीं, बल्कि यह विश्वास है कि आपकी कलम किसी बड़े उद्देश्य की सेवा कर रही है.
गोविंद देव गिरी जी महाराज का आशीर्वाद शांतनु शुक्ल के लिए उसी विश्वास की तरह था. यह कहानी केवल एक सम्मान की नहीं है, बल्कि उस विचार की है जिसमें पत्रकारिता खबर से आगे बढ़कर संस्कृति की सेवा बन जाती है, शब्द साधना बन जाते हैं और मीडिया सनातन की आवाज को समाज तक पहुंचाने का माध्यम बनता है.
संत ने केवल शॉल नहीं ओढ़ाई, बल्कि वर्षों के समर्पण को अपना आशीर्वाद दिया.