CBRN Reconnaissance Vehicles: भारत अपनी सैन्य ताकत को लगातार आधुनिक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. इसी कड़ी में रक्षा मंत्रालय की Defence Acquisition Council यानी DAC ने हाल ही में तीनों सेनाओं के लिए एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की रक्षा खरीद को मंजूरी दी है. इस बड़े रक्षा पैकेज में मिलिट्री व्हीकल्स, मिसाइल सिस्टम, फाइटर जेट अपग्रेड से लेकर आधुनिक निगरानी और सुरक्षा उपकरण तक शामिल हैं. खास बात यह है कि इस खरीद में भारतीय सेना के लिए CBRN रेकी व्हीकल्स को भी मंजूरी दी गई है, जो परमाणु, रासायनिक और जैविक हमलों जैसे बेहद गंभीर खतरों से निपटने में अहम भूमिका निभा सकते हैं.
क्या है DAC और AON की मंजूरी?
सेना के लिए किसी भी बड़े हथियार या सैन्य उपकरण की खरीद सीधे नहीं की जाती. इसके लिए रक्षा मंत्रालय की शीर्ष खरीद संस्था Defence Acquisition Council यानी DAC की मंजूरी जरूरी होती है. रक्षा मंत्री, रक्षा सचिव और तीनों सेनाओं के प्रमुख इस अहम कमेटी का हिस्सा होते हैं. DAC जब किसी सैन्य उपकरण की खरीद के लिए Acceptance of Necessity यानी AON को मंजूरी देता है, तो इसे खरीद प्रक्रिया की शुरुआती और महत्वपूर्ण स्टेज माना जाता है.
हाल की बैठक में DAC ने करीब 1.10 लाख करोड़ रुपये की रक्षा खरीद को मंजूरी दी. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय थलसेना के लिए विभिन्न तरह के सैन्य वाहनों का है. वहीं भारतीय वायुसेना के लिए मिसाइलों और सुखोई फाइटर जेट के अपग्रेड से जुड़ी खरीद को मंजूरी मिली है. नौसेना के लिए Arudhra रडार और मरीन गैस टर्बाइन के डिजाइन, विकास तथा आगे चलकर उनकी खरीद से जुड़े प्रस्तावों को हरी झंडी दी गई है.
सेना को मिलेंगे कई तरह के आधुनिक वाहन
थलसेना के लिए मंजूर किए गए प्रस्तावों में कई तरह के सैन्य वाहन शामिल हैं. इनमें High Mobility Vehicles यानी HMV, Self-Propelled Mechanical Mine Layers, Trawl Tanks और Sarvatra Bridge Systems जैसे उपकरण शामिल हैं. इसके अलावा स्वदेशी Advanced Light Helicopter यानी ALH Dhruv को भी इस खरीद प्रक्रिया में जगह मिली है.
इन सभी के बीच CBRN रेकी व्हीकल्स को खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है. CBRN का मतलब Chemical, Biological, Radiological and Nuclear है. आसान शब्दों में कहें तो ये ऐसे विशेष सैन्य वाहन हैं, जो किसी इलाके में रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल या परमाणु खतरे की पहचान करने और उसकी निगरानी करने में मदद करते हैं.
CBRN व्हीकल आखिर काम कैसे करता है?
किसी संभावित CBRN हमले के बाद सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना होती है कि खतरा किस तरह का है और उसका असर कितने इलाके तक फैला है. ऐसे समय में CBRN रेकी व्हीकल्स की भूमिका बेहद अहम हो सकती है. रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, ये वाहन CBRN एजेंट से दूषित क्षेत्रों का पता लगाने, उनकी पहचान करने, निगरानी करने और उन्हें चिह्नित करने में सक्षम होंगे.
इन वाहनों को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि खतरनाक वातावरण में भी इनके अंदर मौजूद सैनिक सुरक्षित रहकर अपना मिशन पूरा कर सकें. यानी जहां सामान्य सैन्य वाहन या सैनिकों के लिए रेडिएशन, जहरीले रसायन या जैविक एजेंट गंभीर खतरा बन सकते हैं, वहीं CBRN वाहन विशेष सुरक्षा और पहचान प्रणाली के जरिए ऑपरेशन में मदद करते हैं.
DRDO पहले ही तैयार कर चुका है ऐसे वाहन
भारत में CBRN सुरक्षा तकनीक पर लंबे समय से काम हो रहा है. वर्ष 2017 में DRDO ने भारतीय सेना को CBRN व्हीकल्स सौंपे थे. इनका डिजाइन देखने में भारतीय सेना के BMP जैसे बख्तरबंद वाहनों से मिलता-जुलता था और इनमें सैन्य हथियार भी लगाए गए थे.
इसके बाद वर्ष 2024 में महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा ने DRDO की मदद से तैयार किए गए एक CBRN व्हीकल की तस्वीरें और वीडियो भी साझा किए थे. यह वाहन अमेरिकी Stryker Infantry Combat Vehicle की तरह दिखाई देता था. सामने आए वीडियो में वाहन को तेज गति से सड़क पर चलते और पानी के भीतर ऑपरेट करते हुए देखा गया था.
हालांकि, रक्षा मंत्रालय ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि सेना सीधे DRDO से तैयार किए गए CBRN वाहन खरीदेगी या किसी निजी कंपनी के साथ मिलकर विकसित किए गए मॉडल को चुना जाएगा. माना जा रहा है कि खरीद से पहले सेना अलग-अलग CBRN वाहनों का मूल्यांकन करेगी और उनकी क्षमताओं को परखने के बाद अंतिम मॉडल का चयन किया जाएगा.
98 फीसदी रक्षा खरीद स्वदेशी होगी
इस पूरी रक्षा खरीद की एक और बड़ी खासियत इसका स्वदेशी पहलू है. रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि DAC से मंजूर किए गए करीब एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के रक्षा प्रस्तावों में लगभग 98 प्रतिशत खरीद स्वदेशी स्रोतों से की जाएगी. इसका मतलब है कि CBRN व्हीकल्स समेत बड़ी संख्या में सैन्य उपकरणों के लिए भारतीय कंपनियों और घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा.
यह फैसला आत्मनिर्भर भारत और रक्षा क्षेत्र में घरेलू निर्माण को मजबूत करने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है. खास तौर पर CBRN जैसे संवेदनशील सैन्य उपकरणों के लिए स्वदेशी क्षमता विकसित करना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है.
आखिर CBRN व्हीकल्स की जरूरत क्यों बढ़ी?
CBRN व्हीकल्स की खरीद को मंजूरी ऐसे समय में मिली है, जब भारत के सामने पारंपरिक युद्ध के साथ-साथ परमाणु, रासायनिक और जैविक खतरों की चुनौती भी बनी हुई है. भारत के दोनों प्रमुख पड़ोसी चीन और पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं. ऐसे में सेना को केवल पारंपरिक हथियारों से लैस करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि किसी भी असामान्य और बड़े पैमाने के खतरे से निपटने के लिए विशेष क्षमताएं विकसित करना भी जरूरी है.
मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के परमाणु प्रतिष्ठानों को लेकर भी काफी चर्चा हुई थी. उस समय पाकिस्तान की ओर से परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकियों का मुद्दा सामने आया था. बाद में पूर्व CDS जनरल अनिल चौहान ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में किराना हिल्स से जुड़े घटनाक्रम पर अलग जानकारी साझा की थी. उनके मुताबिक, भारतीय वायुसेना का लक्ष्य किराना हिल्स नहीं था, बल्कि सरगोधा एयरबेस के पास ड्रोन ऑपरेशन के दौरान वह क्षेत्र प्रभावित हुआ था.
चीन और पाकिस्तान के बीच दोहरी चुनौती
भारत की सुरक्षा रणनीति में पाकिस्तान के साथ-साथ चीन भी बड़ी चुनौती है. वर्ष 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाओं के बीच हुई हिंसक झड़प ने दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव को दुनिया के सामने ला दिया था. चीन और पाकिस्तान दोनों परमाणु क्षमता रखते हैं और ऐसे में भारतीय सेना के लिए परमाणु हमले के साथ-साथ रासायनिक और जैविक हमले जैसी परिस्थितियों से निपटने की तैयारी भी जरूरी हो जाती है.
CBRN रेकी व्हीकल्स इसी व्यापक सुरक्षा तैयारी का हिस्सा हैं. इनका उद्देश्य केवल हमले की स्थिति में सैनिकों को सुरक्षा देना नहीं है, बल्कि प्रभावित इलाके की पहचान करना, खतरे की प्रकृति समझना और आगे की सैन्य कार्रवाई के लिए जरूरी जानकारी उपलब्ध कराना भी है.
भारत की बदलती युद्ध तैयारी का संकेत
CBRN व्हीकल्स को मिली मंजूरी को भारत की बदलती सैन्य जरूरतों के संकेत के तौर पर देखा जा सकता है. आधुनिक युद्ध अब केवल टैंक, मिसाइल और फाइटर जेट तक सीमित नहीं है. परमाणु, रासायनिक, जैविक और रेडियोलॉजिकल खतरों से निपटने के लिए विशेष तकनीक और प्रशिक्षित सैन्य संसाधनों की जरूरत बढ़ रही है.
ऐसे में स्वदेशी CBRN वाहनों की अतिरिक्त खरीद भारतीय सेना की उस क्षमता को मजबूत कर सकती है, जिसके जरिए किसी संभावित CBRN खतरे की स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया, निगरानी और प्रभावित क्षेत्र की पहचान की जा सकेगी. यानी करीब 1.10 लाख करोड़ रुपये की इस बड़ी रक्षा खरीद में CBRN व्हीकल्स भले ही एक हिस्सा हों, लेकिन बदलते सुरक्षा माहौल में इनकी रणनीतिक अहमियत काफी ज्यादा है.
ये भी पढ़ें- PM मोदी-पुतिन के बीच होगी द्विपक्षीय बैठक, Su-57 जेट से न्यूक्लियर पावर प्लांट तक... इन मुद्दों पर होगी बातचीत