प्रशांत महासागर का बढ़ता तापमान दुनिया के मौसम के लिए बड़ी चुनौती बनता दिख रहा है. मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, मजबूत हो रहा अल-नीनो अगले साल फरवरी तक सक्रिय रह सकता है. ऐसे में अगले कई महीनों तक तापमान और बारिश का मिजाज सामान्य रहने की संभावना कम हो सकती है. कुछ इलाकों में असामान्य गर्मी, जबकि अन्य जगहों पर अचानक तेज बारिश, बाढ़ और मौसम की दूसरी घटनाएं देखने को मिल सकती हैं.
1950 के बाद सबसे ताकतवर अल-नीनो का खतरा
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार, प्रशांत महासागर के नीनो-3.4 क्षेत्र में मई से जुलाई के बीच समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से औसतन 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा. जुलाई में यह अंतर करीब 2 डिग्री तक पहुंच गया, जबकि अगस्त के मध्य में कुछ हफ्तों के दौरान तापमान सामान्य से 2.2 से 2.6 डिग्री तक ज्यादा दर्ज किया गया. समुद्र की गहराई में भी कई हिस्सों में पानी सामान्य से करीब 8 डिग्री अधिक गर्म पाया गया है. इससे अल-नीनो के और मजबूत होने की आशंका बढ़ गई है.
दुनिया के कई हिस्सों में बढ़ेगी गर्मी
WMO ने सितंबर से नवंबर के बीच दुनिया के अधिकांश भू-भागों में सामान्य से अधिक तापमान रहने की आशंका जताई है. पहले से गर्म हो रही धरती पर मजबूत अल-नीनो का असर तापमान को और ऊपर ले जा सकता है. इसके साथ ही बारिश के पैटर्न में बदलाव, सूखे और बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा भी बढ़ सकता है. यानी आने वाले महीनों में मौसम का मिजाज कई क्षेत्रों में असामान्य रह सकता है.
भारत में मानसून पर भी पड़ सकता है असर
प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ने से हवाओं के दबाव और दिशा में बदलाव आता है, जिसका असर भारत जैसे दूर स्थित देशों के मौसम पर भी पड़ सकता है. अल-नीनो को आमतौर पर भारत में कमजोर मानसून से जोड़कर देखा जाता है. इस साल अगस्त में देश में सामान्य से करीब 16 फीसदी कम बारिश हुई और यह 1901 के बाद सबसे गर्म अगस्त रहा. सितंबर में भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान है, जिससे मानसून के अंतिम चरण में बारिश का वितरण असमान रह सकता है.
कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ का खतरा
अल-नीनो के मजबूत होने पर भारत के अलग-अलग हिस्सों में बारिश का असर एक जैसा नहीं रहेगा. कुछ क्षेत्रों में बारिश कम होने से सूखे जैसी स्थिति बन सकती है, जबकि कुछ जगहों पर कम समय में अत्यधिक बारिश होने से बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है. मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, अल-नीनो का प्रभाव सिर्फ मानसून तक सीमित नहीं रहेगा और इसका असर सर्दियों के तापमान पर भी देखने को मिल सकता है.
2027 बन सकता है सबसे गर्म साल
मौसम विज्ञानियों के मुताबिक, 2027 में वैश्विक औसत तापमान नए रिकॉर्ड बना सकता है और यह अब तक का सबसे गर्म साल भी बन सकता है. इससे पहले 2024 को रिकॉर्ड पर सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया था, जिसमें मजबूत अल-नीनो ने भी अहम भूमिका निभाई थी. हालांकि, सर्दियों की स्थिति सिर्फ अल-नीनो से तय नहीं होगी. पश्चिमी विक्षोभ, हिमालय में बर्फबारी और हिंद महासागर की परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी.
क्या है अल-नीनो?
अल-नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ी एक प्राकृतिक मौसमी घटना है, जिसमें समुद्र की सतह का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. इस बढ़े हुए तापमान का असर हवाओं, बारिश और दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ता है. यह घटना आमतौर पर 2 से 7 साल के अंतराल में दिखाई देती है और कई महीनों तक इसका प्रभाव बना रह सकता है. इस बार अगर प्रशांत महासागर का तापमान और बढ़ता रहा, तो आने वाले महीनों में दुनिया को मौसम के असामान्य रूप का सामना करना पड़ सकता है.