Hangor-Class Submarine: पाकिस्तान ने चीन के साथ 5 अरब डॉलर (लगभग 41,500 करोड़ रुपये) की एक अहम सैन्य डील की है, जिसके तहत वह अपनी नौसेना में पहली चीनी डिजाइन की पनडुब्बी शामिल करने जा रहा है. पाकिस्तान के चीफ ऑफ नेवल स्टाफ, एडमिरल नवीद अशरफ ने इस बात की पुष्टि की कि यह नई पनडुब्बी 2026 में कमीशन की जाएगी. इस कदम को पाकिस्तान की नौसैनिक ताकत को बढ़ाने और उत्तर अरब सागर व हिंद महासागर में निगरानी और प्रभाव बढ़ाने के उद्देश्य से अहम माना जा रहा है.
इस डील के तहत पाकिस्तान को 2028 तक कुल आठ हैंगर-क्लास पनडुब्बियां प्राप्त होंगी. इन आठ पनडुब्बियों में से पहली चार चीन में तैयार की जाएंगी, जबकि बाकी चार पाकिस्तान में असेंबल की जाएंगी. विशेषज्ञों के अनुसार, इससे न केवल पाकिस्तान की नौसैनिक शक्ति बढ़ेगी, बल्कि उसकी तकनीकी और नौसैनिक निर्माण क्षमता में भी इजाफा होगा. चीन के हुबेई प्रांत स्थित यांग्त्जे नदी के शिपयार्ड में पहले ही तीन पनडुब्बियां लॉन्च की जा चुकी हैं.
चीन: पाकिस्तान का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता
पाकिस्तान लंबे समय से चीन का सबसे बड़ा हथियार खरीदार रहा है. 2020 से 2024 के बीच पाकिस्तान ने चीन से हथियार निर्यात का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खरीदा. हथियारों के अलावा, चीन ने पाकिस्तान में भारी निवेश भी किया है. इनमें सबसे महत्वपूर्ण परियोजना चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) है, जो लगभग 3,000 किलोमीटर लंबा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कॉरिडोर चीन को मध्य पूर्व से ऊर्जा आपूर्ति सीधे प्राप्त करने और मलक्का जलडमरूमध्य को बायपास करने में मदद करता है. साथ ही, यह परियोजना चीन को अफगानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया तक अपने रणनीतिक और आर्थिक प्रभाव को बढ़ाने में सक्षम बनाती है. इससे भारत के लिए रणनीतिक चुनौती भी बढ़ती है, क्योंकि CPEC के माध्यम से पाकिस्तान और चीन भारत के चारों ओर अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं.
भारत की नौसेना: पाकिस्तान से कई गुना मजबूत
हालांकि पाकिस्तान 2026 तक नई पनडुब्बी तैनात करेगा और अपने समुद्री प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश करेगा, लेकिन भारत की नौसेना इस क्षेत्र में कई गुना अधिक सक्षम और मजबूत है. भारत के पास लगभग 293 पोत हैं, जिनमें दो विमान वाहक, 13 विध्वंसक (डिस्ट्रॉयर्स) और 18 पनडुब्बियां शामिल हैं. इसके विपरीत, पाकिस्तान की नौसेना के पास कुल 121 पोत हैं, जिनमें कोई विमान वाहक या विध्वंसक जहाज शामिल नहीं है, और पनडुब्बियों की संख्या केवल आठ है.
इसके अलावा, भारत वर्तमान में तीन न्यूक्लियर पनडुब्बियां संचालित करता है, साथ ही कई डीजल-इलेक्ट्रिक हमले वाली पनडुब्बियां हैं, जिन्हें फ्रांस, जर्मनी और रूस से खरीदा गया है. इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारतीय नौसेना की ताकत और क्षमताएं पाकिस्तान की तुलना में कहीं अधिक हैं.
रणनीतिक महत्व और सुरक्षा दृष्टिकोण
विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान की नई पनडुब्बी डील का मुख्य उद्देश्य समुद्री सीमा पर निगरानी बढ़ाना, हिंद महासागर में अपनी पकड़ मजबूत करना और चीन के साथ सामरिक संबंधों को और गहरा करना है. हालांकि, इस कदम से भारत के लिए सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है. भारतीय नौसेना की क्षमता के कारण फिलहाल क्षेत्रीय संतुलन भारत के पक्ष में है, लेकिन पाकिस्तान और चीन के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग की निगरानी जरूरी है.
इस डील से साफ है कि पाकिस्तान अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ाने के साथ-साथ चीन के साथ रणनीतिक संबंधों को और मजबूत करना चाहता है. हालांकि, क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और सुरक्षा दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारतीय नौसेना की व्यापक और उन्नत क्षमताओं के कारण पाकिस्तान को सीमित लाभ ही मिल सकता है.
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