नौसैनिक प्रतिरोधक क्षमता संकट शुरू होने के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले काम करती है. किसी समुद्री व्यापार मार्ग पर पहले से गश्त कर रहा एक विध्वंसक जहाज उसके आसपास काम करने वाले सभी पक्षों के फैसलों को प्रभावित करता है. इसके विपरीत, संकट शुरू होने के बाद भेजा गया विध्वंसक उस स्थिति को संभालने पहुंचता है, जिसे पहले से तैनाती के जरिए टाला जा सकता था. भारतीय नौसेना के अधिकारियों का मानना है कि यही अंतर बताता है कि बेड़े का आकार और तैनाती का चक्र किसी एक बड़े और प्रमुख युद्धपोत जितना ही महत्वपूर्ण है.
इस पूरी बहस के केंद्र में अचानक बड़ी संख्या में जहाज तैनात करने की क्षमता और स्थायी मौजूदगी के बीच का अंतर है. अचानक तैनाती की क्षमता का मतलब है कि आदेश मिलने पर नौसेना कम समय में बड़ी संख्या में बल तैयार कर सकती है. वहीं स्थायी मौजूदगी का मतलब है कि संकट की सबसे ज्यादा आशंका वाले समुद्री इलाकों में जहाज पहले से ही लगातार तैनात रहें. भारतीय नौसेना ने अपनी अचानक तैनाती की क्षमता दिखाई है. उसने अदन की खाड़ी में समुद्री डकैती रोधी गश्त के लिए फ्रिगेट जहाजों को लगातार तैनात किया है और सहयोगी नौसेनाओं के साथ बड़े स्तर के अभ्यासों के लिए विध्वंसक जहाज भी भेजे हैं. हालांकि, भारतीय थिंक टैंक की ओर से प्रकाशित रक्षा बजट के विश्लेषण के अनुसार, भारत के लिए चुनौती यह है कि वह भारतीय व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण सभी समुद्री मार्गों पर एक साथ चौबीसों घंटे मौजूदगी बनाए नहीं रख पाया है.
इस चुनौती के पीछे बेड़े का आकार सबसे बड़ी बाधा है. भारतीय नौसेना की दीर्घकालिक योजनाओं में 2035 तक करीब 175 से 200 जहाजों का बेड़ा बनाने का लक्ष्य रखा गया है. इसमें विध्वंसक, फ्रिगेट, कॉर्वेट, पनडुब्बियां और सहायता तथा ईंधन आपूर्ति करने वाले जहाज शामिल हैं. लेकिन नौसेना अभी इस लक्ष्य तक नहीं पहुंची है और उसके पास फिलहाल करीब 140 से 150 जहाज हैं. जब कोई जहाज तय मरम्मत या लंबे समय के रखरखाव के लिए जाता है तो वह सक्रिय तैनाती से बाहर हो जाता है. इसका मतलब है कि किसी भी दिन वास्तविक रूप से काम कर रहे जहाजों की संख्या कागज पर मौजूद कुल जहाजों से काफी कम होती है. अगर किसी नौसेना के पास पर्याप्त विध्वंसक नहीं हैं तो वह केवल विमानवाहक पोतों को उनकी जगह तैनात नहीं कर सकती, क्योंकि बिना सुरक्षा देने वाले जहाजों के विमानवाहक पोत खुद एक आसान लक्ष्य बन सकते हैं, न कि एक मजबूत नौसैनिक युद्ध समूह.
यही वजह है कि नौसैनिक योजनाकार बड़े और चर्चित युद्धपोतों तथा उन्हें समर्थन देने वाले पूरे बेड़े के बीच अंतर करते हैं. एक विमानवाहक पोत को हवाई हमलों से सुरक्षा के लिए विध्वंसक जहाजों की जरूरत होती है. पनडुब्बियों के खिलाफ सुरक्षा के लिए फ्रिगेट जहाज जरूरी होते हैं. इसके अलावा, देश से दूर लंबे समय तक तैनाती के दौरान ईंधन और दूसरी जरूरी चीजों की आपूर्ति बनाए रखने के लिए आपूर्ति और ईंधन भरने वाले जहाज भी जरूरी होते हैं. भारत का तीसरा विमानवाहक पोत आईएसी-2 बनाने का प्रयास भी इस बात पर निर्भर करता है कि नौसेना उसी समय विध्वंसक और फ्रिगेट जहाजों का निर्माण भी बढ़ाए, ताकि उसे पर्याप्त सुरक्षा देने वाले जहाज मिल सकें. अगर ऐसा नहीं होता है तो अपनी तमाम क्षमताओं के बावजूद विमानवाहक पोत की रणनीतिक उपयोगिता सीमित हो सकती है.
तैनाती के चक्र की समस्या इस गणना को और मुश्किल बना देती है. छह महीने की तैनाती पर गए एक जहाज को उसकी जगह लेने के लिए आमतौर पर दूसरे जहाज की तैयारी की जरूरत होती है, जबकि तीसरा जहाज तैनाती के बाद की मरम्मत से गुजर रहा होता है. इसका मतलब है कि हिंद महासागर में एक जहाज को लगातार एक जगह तैनात रखने के लिए कुल दो से तीन जहाजों को बारी-बारी से इस्तेमाल करना पड़ सकता है. अगर भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सभी समुद्री मार्गों को देखा जाए, जिसमें अदन की खाड़ी, मलक्का जलडमरूमध्य और अंडमान सागर के पास मौजूद भारत के द्वीपीय क्षेत्र शामिल हैं, तो हर जगह लगातार मौजूदगी बनाए रखने के लिए जितने बड़े बेड़े की जरूरत होगी, वह भारत के मौजूदा बेड़े से काफी ज्यादा है.
मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स जैसे भारतीय शिपयार्डों ने हाल के वर्षों में विध्वंसक और फ्रिगेट जहाजों के निर्माण को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है. प्रोजेक्ट 15बी के चार विध्वंसक जहाज 2024 में पूरे किए गए थे. अब नौसेना प्रोजेक्ट 17ए पर काम कर रही है, जिसके तहत दोनों शिपयार्ड मिलकर कुल सात स्टील्थ फ्रिगेट बनाएंगे. इसके साथ ही आगे के विध्वंसक जहाजों के निर्माण की योजना पर भी शुरुआती काम चल रहा है.
नौसेना की योजना से जुड़े अधिकारियों ने भारतीय रक्षा प्रकाशनों से कहा है कि विमानवाहक पोतों को लेकर होने वाली बड़ी बहस से ज्यादा महत्वपूर्ण जहाजों के निर्माण की गति होगी. यही तय करेगा कि भारतीय नौसेना अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए जरूरी लगातार समुद्री मौजूदगी बनाए रख पाएगी या फिर उसे संकट शुरू होने के बाद जहाजों को तेजी से तैनात करने पर निर्भर रहना पड़ेगा, जबकि बेहतर और पहले से की गई तैनाती ऐसे संकटों को शुरुआत में ही रोक सकती थी.
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