Akash Defense System: पिछले साल मई में पाकिस्तान के साथ हुए संघर्ष के बाद भारतीय ब्रह्मोस और आकाश मिसाइल सिस्टम को लेकर कई देशों की दिलचस्पी बढ़ी है. भारत सरकार ने पुष्टि की है कि मध्य एशिया के ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान ने आकाश एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा है. आकाश ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी क्षमता साबित की थी और अब यह युद्ध में इस्तेमाल हो चुका सिस्टम बन गया है. वहीं इंडोनेशिया ब्रह्मोस के लिए डील कर चुका है, फिलीपींस इसे खरीद चुका है और नए ऑर्डर की तैयारी में है. यूएई के साथ भी ब्रह्मोस सौदे को लेकर बातचीत अंतिम दौर में बताई जा रही है.
ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान की डील इसलिए खास है क्योंकि मध्य एशिया पहले रूस के हथियारों का बड़ा बाजार रहा है. पिछले कुछ सालों में चीन ने भी इस क्षेत्र में अपनी हथियार सप्लाई बढ़ाई है. ऐसे में इन दो देशों का भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम खरीदना भारत के लिए मध्य एशिया में अपनी रक्षा पहुंच बढ़ाने का मौका है. भारतीय रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने पिछले गुरुवार को दोनों देशों को आकाश की बिक्री की पुष्टि की. उन्होंने आकाश को भारत की सफल परियोजनाओं में से एक बताया और संकेत दिया कि कुछ अन्य देशों ने भी इसमें रुचि दिखाई है.
युद्ध में अपनी क्षमता साबित कर चुका आकाश
भारतीय रक्षा मंत्रालय के मुताबिक आकाश 100 मीटर से 20 किलोमीटर की ऊंचाई तक हवाई लक्ष्यों को निशाना बना सकता है. इसकी ऑपरेशनल रेंज 4.5 से 25 किलोमीटर है. 5.87 मीटर लंबी इस मिसाइल का वजन करीब 710 किलोग्राम है और यह लक्ष्य को लॉक करने के लिए कमांड गाइडेंस का इस्तेमाल करती है.
आकाश सिस्टम को आकाश प्राइम और आकाश-NG जैसे नए वर्जन के साथ लगातार अपडेट किया गया है. इनमें बेहतर सेंसर और दूसरी सुविधाएं शामिल हैं. आर्मेनिया पहले से ही आकाश का इस्तेमाल करता है.
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट में ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के फेलो अतुल कुमार ने कहा कि 2022 में आर्मेनिया आकाश का पहला विदेशी ग्राहक बना था. आर्मेनिया इसकी कम कीमत, रूस से हथियारों की कम होती सप्लाई और अजरबैजान के बढ़ते ड्रोन बेड़े की वजह से इसकी ओर आकर्षित हुआ था. उनके मुताबिक ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के लिए आकाश खरीदना रूस और चीन के अलावा दूसरे देशों से रक्षा उपकरण लेने का एक तरीका भी है.
अतुल कुमार ने कहा कि तुर्कमेनिस्तान पहले ही चीन से कई एयर डिफेंस सिस्टम खरीद चुका है. ऐसे में आकाश उसके एयर डिफेंस नेटवर्क में मिड-लेयर की भूमिका निभा सकता है. उनके मुताबिक रूस के लिए मध्य एशिया के रक्षा बाजार में भारत की मौजूदगी उस स्थिति से बेहतर है, जिसमें यह क्षेत्र नाटो या चीन के सैन्य मानकों के और करीब चला जाए.
चीन की सीमा के पास पहुंच रहा भारतीय हथियार
अतुल कुमार के मुताबिक चीन की पश्चिमी सीमा के पास भारतीय सैन्य उपकरणों की मौजूदगी बीजिंग के लिए चिंता का विषय हो सकती है. चीन खुद इस इलाके में एक प्रमुख हथियार सप्लायर बनने की कोशिश कर रहा है. उन्होंने कहा कि भारत अलग-अलग नीतियों, इंसेंटिव और डिफेंस कॉरिडोर के जरिए रक्षा निर्यात बढ़ा रहा है और इसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ रही है.
रूस पर निर्भरता घटा रहे मध्य एशियाई देश
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की हथियार सप्लाई करने की क्षमता पर असर पड़ा है. हालांकि SIPRI के आंकड़ों के मुताबिक रूस अभी भी मध्य एशिया में हथियारों का प्रमुख सप्लायर है, लेकिन ये देश अब दूसरे विकल्पों की ओर भी बढ़ रहे हैं. चीन भी खासकर उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान में अपनी हथियार सप्लाई बढ़ा रहा है.
SIPRI के अनुसार 2020 से 2024 के बीच रूस के कुल हथियार निर्यात का 11 प्रतिशत हिस्सा कजाकिस्तान ने खरीदा था. वहीं ताजिकिस्तान अभी भी रूसी सैन्य उपकरणों और मदद पर काफी निर्भर है. दूसरी ओर आर्मेनिया रूस पर अपनी हथियार निर्भरता घटाकर भारत और फ्रांस जैसे नए सप्लायर्स की ओर बढ़ रहा है.