लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित रखना मनमाना और संविधान के खिलाफ: SC जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां

Justice Ujjal Bhuyan: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा है कि भारतीय नागरिक का वोट देने का अधिकार संविधान के मूल ढांचे का एक अहम हिस्सा है.जस्टिस भुइयां ने कहा कि कोई भी ऐसी प्रक्रिया जिससे बड़ी संख्या में नागरिक वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाएं, वह मनमानी होगी और संविधान के आर्टिकल 14 और 326 का उल्लंघन करेगी.

Depriving people of the right to vote is arbitrary unconstitutionalSC Judge Justice Ujjal Bhuyan
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Justice Ujjal Bhuyan: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा है कि भारतीय नागरिक का वोट देने का अधिकार संविधान के मूल ढांचे का एक अहम हिस्सा है.जस्टिस भुइयां ने कहा कि कोई भी ऐसी प्रक्रिया जिससे बड़ी संख्या में नागरिक वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाएं, वह मनमानी होगी और संविधान के आर्टिकल 14 और 326 का उल्लंघन करेगी. 19वीं NALSAR-जस्टिस बीआर साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता 2026 के समापन समारोह में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि वोट देने का अधिकार सिर्फ़ एक कानूनी अधिकार नहीं है, बल्कि आर्टिकल 326 से मिलने वाला एक संवैधानिक अधिकार है. यह आर्टिकल वयस्क मताधिकार के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव की गारंटी देता है.

जस्टिस भुइयां ने आगे कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों के दो वर्गों की कल्पना नहीं करता – एक जिनके पास वोट देने का अधिकार है और दूसरे जिनके पास नहीं है. जस्टिस भुइयां ने कहा कि कोई भी ऐसी प्रक्रिया जिससे लाखों भारतीय नागरिक वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाएं और असल में अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाएं, वह संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन होगी, हालांकि जस्टिस भुइयां ने SIR का साफ़ तौर पर ज़िक्र नहीं किया, लेकिन जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी SIR प्रक्रिया को लेकर चल रहे विवाद के बीच आई है. इस प्रक्रिया को लेकर योग्य मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने को लेकर काफ़ी चिंताएं जताई गई हैं. जस्टिस भुइयां ने ज़ोर देकर कहा कि वोट देने का अधिकार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए बहुत ज़रूरी है और इसे संविधान की एक बुनियादी विशेषता माना गया है.

जस्टिस भुइयां ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कोई भी अदालत ऐसी प्रक्रिया को मंज़ूरी नहीं दे सकती जो वयस्क मताधिकार की संवैधानिक गारंटी को कमज़ोर करती हो. जस्टिस भुइयां ने माना कि सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में यह कहा है कि वोट देने का अधिकार कोई मौलिक अधिकार नहीं है, हालांकि जस्टिस भुइयां ने इस बात पर ज़ोर दिया कि 'पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ बनाम भारत संघ' मामले में हुए फैसले के अनुसार वोट देने का अधिकार निश्चित रूप से एक संवैधानिक अधिकार है और यह अनुच्छेद 326 से मिलता है. जस्टिस भुइयां ने कहा कि भले ही कानून इस अधिकार के इस्तेमाल को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन ऐसा कोई भी कानून अनुच्छेद 325 और 326 के दायरे में ही होना चाहिए. अनुच्छेद 326 के तहत 18 साल या उससे ज़्यादा उम्र का कोई भी व्यक्ति लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वोट देने का हकदार है, बशर्ते वह संविधान के तहत अयोग्य न ठहराया गया हो. 

जस्टिस भुइयां ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार देश की आज़ादी की लड़ाई की एक मुख्य विशेषता और संविधान का एक बुनियादी सिद्धांत था. जस्टिस भुइयां ने कहा कि अनुच्छेद 326 संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के सिद्धांत को अर्थ और आधार देता है. वोट देने का अधिकार यह पक्का करता है कि आर्थिक और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग लोगों की देश के शासन में बराबर की भागीदारी हो. जस्टिस भुइयां ने 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' के तहत वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए ज़रूरी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों पर भी ज़ोर दिया.

जस्टिस भुइयां ने कहा कि कोर्ट ने वोटरों के नाम हटाने के लिए गाइडलाइंस तय की हैं, जिनमें प्रभावित वोटर को नोटिस देना और सुनवाई का मौका देना शामिल है. जस्टिस भुइयां ने 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि किसी नागरिक के वोट देने के अधिकार को अनुच्छेद 326 से अलग नहीं किया जा सकता और वोटर बनने और वोट देने का अधिकार ही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की नींव है. जस्टिस भुइयां ने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी नागरिक के वोट देने या वोटर लिस्ट में शामिल होने के अधिकार को उसके नागरिक होने के दर्जे से अलग नहीं किया जा सकता.

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