बढ़ते प्रदूषण, सूखे और जल संकट के इस दौर में अब इंसान आसमान से भी मदद मांगने के बजाय खुद समाधान खोजने लगा है. इसी खोज का नतीजा है क्लाउड सीडिंग — एक ऐसी वैज्ञानिक तकनीक, जो बादलों में रासायनिक तत्व डालकर कृत्रिम बारिश करवाती है. भारत में अब यह प्रयोग सिर्फ वैज्ञानिक शोध नहीं रहा, बल्कि दिल्ली जैसे शहरों में इसे प्रदूषण से राहत के नए उपाय के तौर पर देखा जा रहा है.
क्लाउड सीडिंग को सरल शब्दों में समझें तो यह बादलों को ‘बीज’ देने की प्रक्रिया है. जब किसी क्षेत्र में पर्याप्त नमी तो होती है, लेकिन बादल बारिश नहीं देते, तब वैज्ञानिक हवाई जहाज, ड्रोन या जमीन से मशीनों के ज़रिए बादलों में सूक्ष्म रासायनिक कण छोड़ते हैं. ये कण बादलों में पानी की बूंदें या बर्फ के क्रिस्टल बनने में मदद करते हैं. जैसे ही ये कण भारी होते हैं, बादल बरसने लगते हैं. यह पूरी प्रक्रिया पूरी तरह नियंत्रित और वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित मानी जाती है.
भारत में क्लाउड सीडिंग की ज़रूरत
भारत जैसे देश में जहां एक ओर कुछ राज्य सूखे से जूझते हैं और दूसरी ओर कहीं-कहीं बाढ़ का संकट होता है, वहां क्लाउड सीडिंग एक संतुलन का जरिया बन सकती है. दिल्ली में हर साल सर्दियों के दौरान जब प्रदूषण अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है, तब कृत्रिम बारिश के ज़रिए धूल और जहरीले कणों को धोने की योजना बनाई जाती है. 2025 में दिल्ली सरकार पहली बार बड़े पैमाने पर क्लाउड सीडिंग ट्रायल करने जा रही है, ताकि हवा को कुछ दिनों के लिए साफ किया जा सके.
कितनी आती है लागत
क्लाउड सीडिंग के खर्च में बहुत अंतर होता है, यह क्षेत्र, तकनीक और मौसम पर निर्भर करता है. भारत में औसतन एक छोटे स्तर का प्रयोग लगभग 12 से 40 लाख रुपये के बीच होता है, जबकि बड़े स्तर पर सालाना खर्च करोड़ों में पहुंच जाता है. दिल्ली सरकार के प्रस्तावित ट्रायल की कुल लागत करीब 3.21 करोड़ रुपये है. इसमें पांच ट्रायल किए जाएंगे और प्रत्येक ट्रायल का खर्च 55 लाख से लेकर डेढ़ करोड़ रुपये के बीच होगा.
तकनीक कैसे काम करती है
हर बादल में नमी मौजूद रहती है, लेकिन हर बादल बरस नहीं पाता. यही वह जगह है, जहां क्लाउड सीडिंग काम आता है. वैज्ञानिक बादलों में सिल्वर आयोडाइड या नमक जैसे कण छोड़ते हैं, जो नमी को आकर्षित कर बड़ी-बड़ी बूंदों में बदल देते हैं. ठंडे बादलों में यह कण बर्फ क्रिस्टल का रूप लेते हैं, जो बाद में पिघलकर बारिश के रूप में गिरते हैं. गर्म बादलों में नमक डालने से नमी और तेजी से एकत्रित होती है और बारिश की संभावना बढ़ जाती है.
कौन-से रसायन उपयोग होते हैं
क्लाउड सीडिंग में इस्तेमाल होने वाले रसायनों में सबसे आम है सिल्वर आयोडाइड (AgI). इसके अलावा पोटैशियम आयोडाइड, ड्राई आइस (ठोस कार्बन डाइऑक्साइड) और लिक्विड प्रोपेन का भी प्रयोग किया जाता है. ये सभी रसायन नियंत्रित मात्रा में इस्तेमाल किए जाने पर सुरक्षित हैं, लेकिन किसी भी प्रयोग से पहले पर्यावरणीय निगरानी ज़रूरी होती है.
भारत में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकें
भारत में अब तक कई प्रोजेक्ट्स पर क्लाउड सीडिंग की कोशिशें की जा चुकी हैं. IIT कानपुर और CAIPEEX प्रोजेक्ट के तहत इस्तेमाल किए गए फ्लेयर्स में कैल्शियम क्लोराइड और मैग्नीशियम का प्रयोग किया गया था. वहीं, दिल्ली में 2025 के ट्रायल में नमक (सोडियम क्लोराइड) और सिल्वर आयोडाइड दोनों का प्रयोग किया जाएगा. बारिश कराने के लिए हवाई जहाज, रॉकेट और ड्रोन — सभी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है.
क्लाउड सीडिंग के फायदे
क्लाउड सीडिंग के कई सामाजिक और पर्यावरणीय लाभ हैं. यह सूखे इलाकों में फसलों को बचाने में मदद करती है, प्रदूषण घटाती है और हवा को साफ बनाती है. साथ ही, यह जल संरक्षण और बाढ़ नियंत्रण में भी उपयोगी साबित हो सकती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में यह तकनीक जलवायु परिवर्तन से निपटने का एक बड़ा हथियार बन सकती है.
जोखिम और सावधानियां
जहां एक ओर यह तकनीक उम्मीद जगाती है, वहीं इसके कुछ खतरे भी हैं. रासायनिक तत्वों की अधिक मात्रा मिट्टी और जल स्रोतों को प्रभावित कर सकती है. सिल्वर आयोडाइड से कुछ लोगों को एलर्जी की शिकायत भी हो सकती है. इसलिए हर ट्रायल के साथ सख्त निगरानी और वैज्ञानिक मॉनिटरिंग जरूरी है. भारत में IIT कानपुर जैसे संस्थान इन प्रयोगों को पर्यावरण सुरक्षा मानकों के तहत संचालित कर रहे हैं.
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