'अपने पंगे में हमें मत घसीटो', न्यूक्लियर पर ट्रंप को ड्रैगन ने सुनाई खरी-खरी; कहा- रूस के साथ करो ये सब

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वैश्विक मंच पर सिर्फ आर्थिक मामलों में ही मुखर नहीं हैं, बल्कि सुरक्षा और परमाणु शक्ति से जुड़े मुद्दों पर भी खुलकर दखल दे रहे हैं. हाल ही में उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियार नियंत्रण को लेकर बातचीत फिर से शुरू हो सकती है.

China replies to america over nuclear talks
'अपने पंगे में हमें मत घसीटो', न्यूक्लियर पर ट्रंप को ड्रैगन ने सुनाई खरी-खरी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वैश्विक मंच पर सिर्फ आर्थिक मामलों में ही मुखर नहीं हैं, बल्कि सुरक्षा और परमाणु शक्ति से जुड़े मुद्दों पर भी खुलकर दखल दे रहे हैं. हाल ही में उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियार नियंत्रण को लेकर बातचीत फिर से शुरू हो सकती है, और इसमें वे चीन को भी शामिल करना चाहते हैं. हालांकि चीन ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है.

चीनी विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा है कि मौजूदा हालात में इस तरह की त्रिपक्षीय बातचीत संभव नहीं है. प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि चीन और अमेरिका-रूस के परमाणु ताकत की तुलना करना ही गैरवाजिब है. उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि जिन देशों के पास परमाणु हथियारों का बड़ा ज़खीरा है, पहले उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए.

परमाणु शक्ति में असमान संतुलन

दुनिया में अगर सबसे ज्यादा परमाणु हथियार किसी के पास हैं, तो वे दो देश हैं—रूस और अमेरिका. अनुमान है कि 2025 तक रूस के पास लगभग 5459, जबकि अमेरिका के पास 5277 से ज्यादा परमाणु हथियार मौजूद हैं. वहीं, चीन के पास लगभग 600 वॉरहेड्स बताए जा रहे हैं.हालांकि इन आंकड़ों के आधार पर चीन यह कहता रहा है कि उसकी परमाणु नीति "न्यूनतम प्रतिरोध क्षमता" (Minimum Deterrence) पर आधारित है. मगर कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें बताती हैं कि बीते वर्षों में चीन अपने परमाणु भंडार को तेजी से बढ़ा रहा है.

चीन की आपत्ति का क्या कारण है?

चीन का कहना है कि वह बातचीत के खिलाफ नहीं है, लेकिन उसे "बराबरी के आधार" पर होना चाहिए. बीजिंग का तर्क है कि अमेरिका और रूस के पास परमाणु हथियारों की संख्या चीन से कहीं अधिक है, और ऐसे में इस मुद्दे पर त्रिपक्षीय बातचीत का औचित्य ही नहीं बनता.चीन को यह भी आशंका है कि इस प्रक्रिया के माध्यम से उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की कोशिश की जाएगी. यही कारण है कि उसने इस चर्चा से खुद को अलग रखने का निर्णय लिया है.

रूस की बदली रणनीति

गौरतलब है कि 2023 में रूस ने अमेरिका के साथ चल रहे New START (Strategic Arms Reduction Treaty) समझौते से खुद को अलग कर लिया था. लेकिन अब संकेत मिल रहे हैं कि रूस फिर से हथियार नियंत्रण पर बातचीत के लिए तैयार है.इस बदले रुख के पीछे कई रणनीतिक कारण हो सकते हैं—यूक्रेन संकट, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, और पश्चिमी देशों के साथ तनाव की स्थितियां रूस को बातचीत की मेज़ पर लाने के लिए प्रेरित कर रही हैं.

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