मिसाइल लॉन्च पैड, रडार, गैरेज... पैंगोंग झील के पास चीन ने बनाया सैन्य किला, भारत के लिए बढ़ा खतरा!

भारत-चीन संबंधों के बीच फिर से तनाव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं.

China built a military fort near Pangong Lake
प्रतिकात्मक तस्वीर/ Sociel Media

बीजिंग/नई दिल्ली: भारत-चीन संबंधों के बीच फिर से तनाव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं. एक ओर चीन कूटनीतिक वार्ता और सहयोग की बात करता है, वहीं दूसरी ओर वह सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य और रणनीतिक ढांचों का तेज़ी से विस्तार कर रहा है. हाल ही में सैटेलाइट तस्वीरों और खुफिया सूचनाओं के हवाले से पता चला है कि चीन ने लद्दाख में पैंगोंग झील के पूर्वी किनारे पर एक बड़ा सैन्य कॉम्प्लेक्स लगभग तैयार कर लिया है.

सैन्य विश्लेषकों के मुताबिक, इस स्थान पर बने गहरे गैराज बख्तरबंद वाहनों और मिसाइल ट्रकों के लिए तैयार किए गए हैं. साथ ही यहां एक हाईवे जैसी संरचना विकसित की गई है, जो संभावित रूप से रडार या मिसाइल लॉन्च प्लेटफॉर्म के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें (SAM) तैनात की जा सकती हैं.

यह सैन्य आधार एक रडार स्टेशन के निकट है, जिससे इसकी रणनीतिक भूमिका और स्पष्ट हो जाती है. भारत के लिए यह इस दृष्टि से चिंता का विषय है कि यदि इस आधार से चीन हवाई गतिविधियों पर नजर रखने या जवाबी कार्रवाई की स्थिति तैयार करता है, तो भारतीय वायुसेना की गतिशीलता प्रभावित हो सकती है.

ब्रह्मपुत्र पर मेगा डैम की नींव

चीन की रणनीतिक योजनाएं सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं हैं. 19 जुलाई को चीनी प्रधानमंत्री ली क्यांग ने मेडोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की आधारशिला रखी, जो भविष्य में दुनिया के सबसे बड़े पनबिजली प्रोजेक्ट्स में शामिल होगा. यह डैम चीन की यारलुंग झांगबो नदी (भारत में ब्रह्मपुत्र) पर बन रहा है और इसके निर्माण में लगभग 167 अरब डॉलर की लागत आने की संभावना है.

यह डैम तीन गॉर्ज डैम की तुलना में तीन गुना अधिक बिजली उत्पादन की क्षमता रखेगा. भले ही चीन इस प्रोजेक्ट को अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं और क्षेत्रीय विकास के दृष्टिकोण से देख रहा हो, लेकिन भारत के रणनीतिक विशेषज्ञ इसे एक "जियोपॉलिटिकल टूल" के रूप में भी देख रहे हैं.

चिंता की बात यह है कि यह प्रोजेक्ट भारत की सीमाओं के बेहद करीब बनाया जा रहा है, और चीन ने अब तक ब्रह्मपुत्र के जलप्रवाह और बाढ़ संबंधी डेटा साझा करने वाले समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. इससे भारत के पूर्वोत्तर में बाढ़ की पूर्व चेतावनी प्रणाली प्रभावित हो सकती है.

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